प्रश्नकर्ता : ऐसा, मतलब जैसे की न इस चीज़ को हम याद रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन हमेशा नहीं याद होता है हम नश्वर हैं। मतलब हमेशा नहीं याद रहता है कि दिन में हर पल याद रहता है, ऐसा नहीं है, लेकिन दो-तीन बार हम याद करने की क़ोशिश करते हैं मतलब ख़ुद से नहीं याद होता है। ख़ास करके जब सारा दिन बीत जाता है तो एक बार तो हम एक पल के लिए कोशिश करते हैं, कि सुबह से मतलब रात तक जो किया क्या सार्थक कुछ किया?
अगर आज ही साँस ख़तम हो जाए, कल सुबह ही न देख पायें तो क्या कुछ और बाकी है? मतलब जीवन में कुछ पल देखतें हैं न कि कुछ बहुत चाहत नहीं है, फिर भी एक डर सा लगता है, लगता है कि ठीक है अभी और पाँच साल बाद भी हो सकता है, अभी छोड़ दो, अभी क्या करना है? ऐसा होता है।
आचार्य प्रशांत: वो इसलिए होता है क्योंकि नश्वरता तुमको कभी-कभी ही दिखाई दे रही है, लगातार नहीं। दिन में एक-आध बार ही विचार करना पड़ रहा है। नश्वरता विचार करके नहीं पता चलती। ज़िंदगी को अगर देख रहे हो ग़ौर से, तो नश्वरता के अलावा और दिखाई क्या पड़ेगा भाई? एक बच्चा होता है छोटा, देखो कितनी तेज़ी से बदलता है, महीने भर का होता है तो कैसा था? और छः महीने का होते ही कैसा हो जाता है।
उसका भी एक व्यक्तित्व बनने लगता है, तुम्हे नश्वरता नहीं दिख रही, सब बदल गया। तुम कह रही हो की दिन भर के बाद रात को मैं नश्वरता का विचार करती हूँ, तो दिन कहाँ गया? मिट गया न, लौटेगा? तो विचार क्या करना है? नश्वरता तो सामने ही है। संसार ही समूचा नश्वर है, जहाँ देखोगे, वहाँ कुछ मिटता हुआ ही पाओगे, यही तो नश्वरता है न। क्या दिख नहीं रहीं हैं चीज़ें बदलती हुई, समझना जिसको ये दिख गया कि संसार बदल रहा है उसको ये भी दिख जाएगा कि वो भी प्रतिपल बदल ही रहा है। इसके बाद वो अहंकार नहीं रख सकता। अहंकार ये मानकर चलता है कि तुम्हारी सत्ता में कुछ शाश्वतता है।
जहाँ तुम्हे दिखाई दिया कि संसार बदल रहा है और संसार के साथ साथ तुम भी बदल जाते हो, वैसे ही तुम्हे अपने ऊपर अभिमान रखना बड़ा मुश्किल हो जाएगा। तुमको दिख जाएगा कि तुम तो कुछ हो ही नहीं, समय की कठपुतली मात्र हो, अब अभिमान करोगे कैसे, बताओ? प्रकृति की विकासधारा ने तुमको जैसा बना दिया तुम बन गए, उसके बाद तुम्हारे बचपन ने तुमको जैसा बना दिया तुम बन गए।




