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प्रेम और मृत्यु बहुत भिन्न नहीं || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप कह रहे हैं कि व्यक्ति में ख़ुद के प्रति प्रेम होना चाहिए। आपके अनुसार हमें अपने आन्तरिक कष्ट से मुक्ति की कोशिश करनी चाहिए। एक तरीक़े से यह स्वार्थ तो गहन अहंकार हुआ।

आचार्य प्रशांत: हाँ, तो वो गहन अहंकार चाहिए। गहन माने गहरा। गहरा अहंकार है जहाँ, वहाँ तो आत्मा है।

अहंकार यह कह ही दे कि मुझे बाहर आना है तकलीफ़ से, बिलकुल एक बार प्रण करके, तो काम हो जाएगा। वो यह नहीं कहता न। कहता है, ’मलहम लगा दो, पट्टी बाँध दो, सुला दो, नशा दे दो, बढ़िया खाना मिल जाए थोड़ा।‘ वो यह थोड़े ही कहता है कि, ’नाश हो जाए, अन्त हो जाए इस पीड़ा का।’ यह वो कहता कहाँ है? ख़ुद को ही बुद्धू बना लेता है बस।

प्र: यही प्रेम है। जब पीड़ा इतनी गहरी हो तब शायद मुक्ति के प्रति प्रेम भी इतना गहरा आएगा।

आचार्य: इसीलिए प्रेम और मृत्यु बिलकुल साथ-साथ चलते हैं।

जो जीवन है हमारा यह अप्रेम का है। जिस दिन प्रेम आएगा उस दिन मृत्यु शुरू हो जाएगी।

किस मृत्यु की बात कर रहा हूँ समझ रहे हो न, शारीरिक नहीं। तो इसीलिए फिर इतना तो सन्तों ने गाया है कि “इश्क और मौत साथ-साथ नहीं चले, तो इश्क कैसा?”

प्रेम जो तुम्हें तुम्हारे जैसा छोड़ दे, वो प्रेम तो है ही नहीं।

प्रेम का मतलब ही है कि आ गया तुम्हारे मौत का फ़रमान। और मौत का फ़रमान नहीं है, वो ज़िन्दगी का सामान है: आधा किलो धनिया, चार किलो लौकी। इससे ज़िन्दगी चलती रहेगी। कुर्सी, बिस्तर, चौकी। तो फिर यह प्रेम नहीं है, यह तो ऐसे ही है।

प्रेम बहुत क़ातिल चीज़ होती है। जो स्वयं से प्रेम करेगा, स्वयं के प्रति संवेदना रखेगा, वो स्वयं को अन्त की तरफ़ ले जाएगा। और जो अपने ही प्रति सहानुभूति नहीं रखता, वो अपनेआप को जैसा है वैसा बचाए रखेगा। अधिक-से-अधिक ऊपर-ऊपर कुछ लीपा-पोती कर लेगा, कि जैसे किसी को हड्डी का कैंसर हो और वो अपनी खाल पर तेल मले, कि जैसे किसी की दाँत की जड़ सड़ गयी हो और वो बार-बार माउथवाश करे। यह हमारा कांसेप्ट (अवधारणा) है प्रेम का।

समझ में आ रही है बात?

जल रही है तुम्हारी खाल क्योंकि तुमको त्वचा का कैंसर हो गया है, तो तुम्हारा प्रेमी आकर क्या कर रहा है? ऊपर-ऊपर कोई लोशन मल दिया, कुछ तेल मल दिया कि आराम आ जाएगा, सो जाएगा।

तुम इसीलिए कह सकते हो, कहने का एक तरीक़ा हो सकता है कि यह दुनिया अप्रेम से चल रही है। जब तक अप्रेम है तब तक संसार है। द वर्ल्ड इस लवलेसनेस (संसार ही अप्रेम है।)

संसार वो बीमारी है जो प्रेम की कमी से पैदा होती है। और कुछ मूर्ख कहते हैं कि प्यार से बच्चे पैदा होते हैं। नहीं, उल्टा है। संसार ही पूरा किससे आता है? अप्रेम से। क्योंकि प्रेम जब आ गया तो अहम् मिटेगा। अहम् मिटा तो क्या मिटेगा साथ में?

प्र: संसार।

आचार्य: संसार मिटेगा। संसार जैसे तुम्हें प्रतीत होता है, जैसा चल रहा है, वैसा वो है ही प्रेम की कमी की वजह से। प्रेम आया नहीं, कि सब साफ़।

प्र: थोड़ा-सा एक कंट्राडिक्शन (विरोधाभास) प्रतीत हो रहा है कि जैसे अगर प्रेम है तो संसार चला जाएगा पर साथ में अगर कोई तकलीफ़ में है, कोई दूसरा दुख में है, तो वो संसार में ही है। तो क्या वो दुखी प्राणी जो हैं संसार में, वो भी दिखने बंद हो जाएँगे?

आचार्य: नहीं, दिखने नहीं बंद हो जाएँगे। देखिए, एक आदमी दुखी है तो उसके संसार का क्या नाम है? दुख। संसार चला जाएगा, माने क्या चला जाएगा?

प्र: दुख।

आचार्य: आप थोड़ा सा अच्छे से याद करिए, जब आप बहुत, बहुत बीमार थे तब यह दीवार भी कैसी थी? यह आपके दुख का हिस्सा थी। एकदम उस जगह पर पहुँच जाइए जब आप बहुत बीमार पड़े हैं। जब आप बहुत बीमार पड़े हैं तो आपका यह बिस्तर, यह दीवारें, यह रोशनियाँ, पंखे, आसपास के लोगों की शक्लें, सब हिस्सा होती हैं आपके दुख का। पूरा संसार ही क्या होता है फिर आपके लिए? दुख मात्र। तो संसार के जाने का मतलब दुख चला गया।

आप कहेंगे, ’दीवार तो वही है।‘ देखिए, बात आपके अनुभव की है। वैज्ञानिक प्रयोग की नहीं है कि आप कहेंगे कि देखो दीवार में अभी भी वही केमिकल हैं और वही पेंट है। उस दीवार का आपका जो पूरा अनुभव था वो पहले दुख का था और आपका वो अनुभव बिलकुल बदल गया। और आपकी सारी परेशानी क्या है, ऑब्जेक्टिव (वस्तुनिष्ठ) या सब्जेक्टिव (व्यक्तिनिष्ठ)?

प्र: सब्जेक्टिव।

आचार्य: आपके अनुभव में आपकी परेशानी है न? आपकी परेशानी यह है कि आपको दुख अनुभव हो रहा है। वो अनुभव बदल जाएगा तो संसार गया न फिर। दीवार भले ही वही हो पर उस दीवार का आपको जो अनुभव होता था वो पूरी तरह बदल गया, तो क्या हमें यह कहना शोभा देता है कि दीवार वही है।

प्र: तो अगर मैं इंटरप्रेट (समझ पाना) कर रहा हूँ कि कोई इंसान दुखी है। मतलब मेरे आसपास जो कोई इंसान दुखी है तो वो मेरा इंटरप्रेटेशन (व्याख्या) है। वो उसके बाद वो बदल जाएगा मतलब जब संसार चला जाएगा तो।

आचार्य: नहीं, आपमें है वो तकलीफ़ या उसमें है, उस दुखी व्यक्ति में है?

प्र: दूसरे दुखी व्यक्ति में तकलीफ़ है।

आचार्य: जब उसकी तकलीफ़ हट जाएगी तो वो आपको जैसे देखता है वो चीज़ बदल जाएगी। जब उसकी तकलीफ़ हट जाएगी तो वो आपको जैसे देखता है वो दृष्टि बदल जाएगी। क्योंकि एक दुखी व्यक्ति के सब सम्बन्ध भी क्या हैं? उसके दुख का ही रूप हैं। जब उस दुखी व्यक्ति का जो दुखी अंतस है वो मिटेगा, तो उसके सम्बन्धों में भी जो दुख का आधार है वो भी हटेगा, तो उसके सारे सम्बन्ध बदल जाएँगे। उसका पूरा संसार बदल जाएगा।

प्र: पर उसका मेरे से अगर सम्बन्ध है कोई और डायरेक्टली (सीधे तौर) मैं कुछ कर नहीं पाता उसके लिये तो फिर क्या तरीक़ा है उसे अपने दुख से राहत दिलाने का, और सच उसी रास्ते पर चलकर मिलेगा?

आचार्य: मौके तलाशते रहने होंगे, मौके तलाशते रहने होंगे। सब्र और बेसब्री एक साथ चाहिए।

जैसे कोई अच्छा खिलाड़ी होता है न, वो बहुत सब्र से खड़ा होता है कि कब एक मौका मिले जब वो अपनी बेसब्री को पूरी अभिव्यक्ति दे सके। छक्का मारना है आपको, पर अपनी बेसब्री को आप दबाकर रखते हो सब्र के नीचे, और सब्र करते रहते हो, करते रहते हो, और अचानक मौका मिला नहीं कि अपनी बेसब्री का विस्फोट कर देते हो। वो गेंद गयी सीधे नब्बे मीटर। तो सब्र रखिए, सब्र रखिए और मौका मिलते ही छक्का मार दीजिए। लेकिन जहाँ मौका नहीं मिल रहा है वहाँ बल्ला मत घुमाइएगा।

सब कुछ अपने ऊपर नहीं लेना चाहिए। सब कुछ अपने ऊपर ले लेने के बाद भी याद रखना चाहिए कि हमारी व्यक्तिगत सामर्थ्य बस इतनी सी ही है। बहुत दफ़े ऐसा होता है कि आपने अगर अपनी ओर से पूरा प्रयास किया है तो आपका वो प्रयास और कई बड़ी ताक़तों को सक्रिय कर देता है। आपसे ज़्यादा बड़ी ताकतों को। आप अपनी ओर से जो अधिकतम कर सकते हैं वो करिए, बाकी दूसरी बड़ी ताकतों पर छोड़ दीजिए।

प्र: जो हर्ट (आहत) का मोमेंटम (संवेग) होता है या फिर किसी भी मनोस्थिति का मोमेंटम (संवेग) होता है, उसको फैक्च्युअली जल्दी-से-जल्दी देखकर तोड़ देने का क्या तरीक़ा है? क्योंकि एक समय के बाद तो वो टूट जाती है।

आचार्य: जिस किसी ने तुमको बहुत ज़ोर-से झाड़ा, ‘बर्गर खा रहा है तू, दादी मर रही है वहाँ पर।’ उसने तुमको उस पल कुछ याद दिला दिया न? जो चीज़ याद दिलायी गयी, वो तुम्हारे लिए बहुत बड़ी होनी चाहिए। उसके आगे तुम्हारा जो व्यक्तिगत आहत होने का भाव है वो बहुत छोटा होना चाहिए।

जिसने तुम्हें डाँटा, उसने तुम्हें आहत करा, ठीक? लेकिन आहत करने से पहले भी उसने तुम्हें क्या याद दिला दिया? ‘दादी मर रही है, तू उसके लिए दवा लेने आया था। यह बात तुम्हारे लिए बहुत बड़ी होनी चाहिए। तुम्हारी अपनी चोट उसके सामने बहुत छोटी बात है। तुम तो उसकी डाँट पूरी होने का भी इंतज़ार नहीं कर सकते। वो अब तुम्हें डाँटता जा रहा है, तुम भाग दोगे क्योंकि तुम्हें याद आ गया, उसने याद दिला दिया। क्या? ’दादी मर रही है।‘ अब वो तुम्हें डाँटता जा रहा है पीछे से, तुम्हारे पास यह तो छोड़ो कि आहत होने का वक़्त है, तुम्हारे पास तो डाँट पूरी सुनने का भी वक्त नहीं है। तुम भाग दोगे।

देखो, उपचार तो एक ही है – प्रेम और समर्पण। प्रेम और समर्पण नहीं है तो चोट भी खाओगे और बौराओगे भी।

बाइक बन जाओ, बाइक। ‘किक पड़ेगी तो दौड़ लगा दूँगा।‘ किक पड़ना माने लात पड़ना ही तो होता है, बाइक यह थोड़ी कर सकती है कि ’किक मार दी, हाय! हाय! हाय! मुझे लात मार दी।‘ उसे किक मारते हो तो क्या करती है? वो दौड़ लगा देती है। ऐसे हो जाओ। किक तुम्हें इसलिए मारी गयी है कि तुम दौड़ लगाओ, इसलिए नहीं मारी गयी है कि वहीं खड़े होकर आँसू बहाने लगो। कुछ याद आ जाना चाहिए।

प्र: संसार तभी आता है जब अप्रेम होता है। तो मेरी अभी किसी से बात हो रही थी। वो एंटी-नाटलिस्म को सपोर्ट (समर्थन) करते हैं। तो वो मुझे बार-बार इस बात को कह रहे थे कि आध्यात्मिक होने की ज़रूरत क्या है?

आचार्य: यह तो सवाल बहुत बाद का है। पहले सवाल होना चाहिए – अध्यात्म है क्या? फंडामेंटल्स फर्स्ट (मौलिक बातें पहले।)

असल में अध्यात्म का नाम इतना ख़राब हो गया है कि तुमने कहा नहीं कि 'अध्यात्,' कि उनके मन में छवि आ गयी होगी ' वाइब्रेशन ' (कंपन) और 'जंतर-मंतर', 'जादू-टोना', 'चमत्कार'। अध्यात्म का रिश्ता इन चीज़ों से जुड़ गया है न। और वो अपनी तरफ़ से बहुत सीधी-सादी बात कर रहे हैं कि क्या ज़रूरत है आबादी बढ़ाने की। तो कह रहे हैं, ‘इतनी सीधी-सी बात है मेरी, जो बिलकुल तार्किक है और सही है, कि भईया, बच्चे इतने न पैदा करो। तो उसमें बीच में यह ' वाइब्रेशन ' और ' फ्रीक्वेंसी ' (आवृत्ति) और ' एनर्जी ' (ऊर्जा) यह सब क्यों घुसेड़ रहे हो? तो यह दिक्क़त हो रही है बातचीत में।

अध्यात्म का नाम बहुत ख़राब कर दिया गया है। तुम इस माहौल में हो इसलिए तुम जानते हो कि अध्यात्म का मतलब है सच्चाई की खोज, ईमानदारी, अहंकार का विश्लेषण। यह बात हम समझते हैं न कि अध्यात्म बड़ी शुद्ध परिभाषा रखता है। पर बाहर की जनता से अगर तुम बोलोगे कि तुम स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक) हो तो तुरंत तुमसे पूछेगा कि ‘अच्छा! तो बताइए आपको किस-किस तरीक़े के दैवीय अनुभव हुए हैं?’ ‘अभी आपका कौनसा चक्र सक्रिय चल रहा है?’ ‘आपके कौनसे कान में घंटी बजती है?’ और ‘आपको कलर्स (रंग) सफ़ेद वाले दिखाई दे रहे हैं या गेरुए वाले?’ तो इन सब बेवकूफ़ियों के कारण अध्यात्म का नाम बहुत ख़राब हुआ है।

प्र: मैं उन्हें यही समझा रहा था कि बिना प्रेम और अध्यात्म के उनका मूवमेंट (आन्दोलन) भी ज़्यादा लंबा नहीं चल सकता क्योंकि तर्क के ऊपर इसको कितना लम्बा खींचेंगे।

आचार्य: हाँ, तो जब उनमें भी प्रेम आएगा अपने मूवमेंट के प्रति, तो उन्हें दिखाई देगा कि इस मूवमेंट को ही और चलाने के लिए उनको आध्यात्मिक होना पड़ेगा।

आप एक अच्छा काम करना चाहते हैं और वो अच्छा काम दूर तक जाए, उसकी शर्त ही यही है कि आप जीवन को गहराई से समझें; तो आप जीवन को गहराई से समझना चाहेंगे या नहीं, अपने अभियान की ही खातिर। आपका जो भी मिशन (अभियान) है अगर उसकी अनिवार्यता, उसकी रिक्वायरमेंट ही यही बन गयी है कि जीवन को समझो तभी तुम्हारा मिशन आगे बढ़ेगा, तो तुम्हें झक मारकर जीवन को समझना पड़ेगा न।

तो यही बात है अध्यात्म की, कि तुम ज़िन्दगी में अगर कोई भी काम बहुत आगे तक ले जाना चाहते हो, तुम्हें अपने काम से बहुत प्यार है, तो तुम पाओगे कि तुम्हें आध्यात्मिक होना ही पड़ेगा।

कोई भी काम, अच्छा काम, एक बिन्दु से आगे नहीं जा पाएगा अगर उसमें आध्यात्मिक स्पष्टता नहीं है। वो अटक जाएगा। चाहे वो वीगनिस्म हो, चाहे एंटी नाटलिस्म हो, चाहे वो एंटी क्रूएलिटी (क्रूरता-विरोधी) अभियान हो, चाहे इक्वैलिटी (समान-अधिकार) अभियान हो। जितने भी तथाकथित अच्छे काम हो रहे हैं दुनिया में। हाँ, चाहे क्लाइमेट एक्टिविज्म (जलवायु-परिवर्तन) हो, वो सब एक बिन्दु पर जाकर, कुछ प्रगति कर लेंगे; पर एक जगह पर जाकर वो रुक जाएँगे अगर उनके पास आध्यात्मिक आधार और आध्यात्मिक स्पष्टता नहीं है।

ऐसे बिन्दु पर क्या होगा? ऐसे बिन्दु पर यह होगा कि जो असली एक्टिविस्ट (कार्यकर्ता) होगा वो आध्यात्मिक हो जाएगा। उसे होना पड़ेगा। और जो नकली एक्टिविस्ट होगा वो कहेगा, ’नहीं साहब, भले ही मेरा मिशन आगे न बढ़ता हो पर अध्यात्म से मुझे तो डर लगता है।‘ वो फिर जहाँ तक पहुँच गया है वहाँ पहुँचने में अपनेआप को सन्तुष्ट कर लेगा।

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