आचार्य प्रशांत: यहाँ पास में ही एक कॉलेज है। वहाँ के छात्रों को अक्सर मैं यहाँ लाता रहा हूँ, दसों बार। ये अपनेआप में एक मूक सत्र रहता है कि बस देखो, मुझे बहुत ज़्यादा बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ती। आप लोगों ने तो फिर भी यहाँ कम समय बिताया, उनको यहाँ मैं ले आता हूँ, छोड़ दिया करता हूँ कि देखते रहो। दो-दो घंटे अपना बैठे हैं, तीन-तीन घंटे बैठे हैं, लिख रहे हैं। आप लोग मोबाइल में लिखते हैं, वो लोग अपना नोटबुक में लिखते थे।
जहाँ कुछ नहीं होता, वहाँ आने से लाभ ये होता है कि वो बहुत कुछ जो ज़िन्दगी को पकड़े रहता है, मन को भरे रहता है, उसकी व्यर्थता बड़ी चोट के साथ ढह जाती है। यहाँ बहुत कम है समाज, हमारे खेल-खिलौने, रिश्ते-नाते, ज़िम्मेदारियाँ। यहाँ श्मशान घाट है, यहाँ वो सब नहीं हैं। यहाँ चिताएँ हैं, गंगा हैं, ये है बूढ़ा वृक्ष (बगल के एक पुराने वृक्ष की ओर इशारा करते हुए), ये मन्दिर है उतना ही बूढ़ा और इस जगह का खालीपन।
यहाँ जो पूरी रिक्तता है वो झंझोड़ करके कहती है, 'अगर मामला ऐसा है तो तुम वैसे क्यों जी रहे हो?' अगर खेल वाक़ई ऐसा है कि पेड़, नदी, मन्दिर, एक लाश और लाश को जलाने वाले लोग, कुल यही है, तो तुम वैसे क्यों जी रहे हो? और उसमें भी जो बात अचानक से मन को मसल जाती है, एक तरह का ख़ौफ़ सा दे जाती है, वह यह है कि ये जो है रिक्तता, खालीपन जिसमें हमने कहा, खेल-खिलौने, मान-मर्यादा, रिश्ते-नाते, ज़िम्मेदारियाँ कुछ भी मौजूद नहीं हैं, ये रिक्तता बुरी नहीं लग रही। और अगर ये बुरी नहीं है, तो फिर वो सब क्या है (बस्ती की ओर इशारा करते हुए )?
यहाँ कौन बैठा है जिसे ये सब बुरा लग रहा हो? है कोई जिसे ये सब बुरा लग रहा हो? बल्कि कुछ है यहाँ जो पकड़ लेता है। बाहर से सुनें या बाहर किसी को बतायें कि मरघट गये थे, वो कहेगा, 'भक! मरघट कोई पर्यटन की जगह है, क्या करने गये थे?'
पर कितनी दफ़े हुआ है कि मैंने लोगों से पूछा है कि बात मरघट पर करनी है या मन्दिर में, तो लोगों ने कहा है कि मरघट पर कर लेते हैं। वहाँ कुछ बुरा लग ही नहीं रहा। एक नंगी सच्चाई है, सामने खड़ी है, बुरा क्या है उसमें? उसका बुरा लगना तो छोड़िए, अजीब बात है कि वहाँ शान्ति मिलती है। अब ये बात बुद्धि की पकड़ से बाहर की है, तर्क की पकड़ से बाहर की है। सामने आप देख रहे हैं एक शरीर को जलता हुआ, एक ज़िन्दगी को ख़त्म होते हुए लेकिन फिर भी कुछ बुरा सा नहीं लग रहा।




