हम अपनी हस्ती को अपने संबंधों से जानते हैं। 'मैं' की अपेक्षा 'मेरा' के माध्यम से जानते हैं। किसी अपने के गुज़र जाने पर ऐसा लगता है कि आंशिक मृत्यु हमारी भी हो गई हो। जिन संबंधों के साथ हम रहते हैं, वहीं अधिकतम संभावना होती है कि हम उन्हें प्रेम की गहराई और बोध की ऊँचाई दे सकें। रिश्ते में अगर यह गहराई हो, तो शारीरिक मृत्यु दुखदाई नहीं होती क्योंकि संबंध अपनी पूर्णता हासिल कर चुका होता है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने परिजनों की मृत्यु के साथ पीड़ा क्यों आती है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं मोटी-मोटी। पहली बात तो ये है कि जो कुछ भी अपना है वो अपनी हस्ती का, अपनी अस्मिता का अंग बन जाता है तो वो जब छिनता है तो ऐसा लगता है कि जैसे अपना ही कोई हिस्सा हमसे टूट गया हो, चीर गया हो, फट कर अलग हो गया हो। जैसे किसी अपने के गुज़र जाने से आंशिक मृत्यु हमारी भी हो गई हो। हम और होते क्या हैं? विशुद्ध होने को तो हम आमतौर पर जानते नहीं, 'मैं' को।
हम अपनी हस्ती को 'मैं' की अपेक्षा 'मेरा' के माध्यम से जानते हैं। हम अपनी हस्ती को अपने संबंधों से जानते हैं। आपसे कहा जाए, 'अपने बारे में कुछ बताइए,' तो आप गौर करिएगा कि आप उन सब वस्तुओं, व्यक्तियों, विचारों के बारे में बताएंगे जिनका आपसे संबंध है। आपसे कहा जाए, 'नहीं, किसी व्यक्ति का नाम लिए बिना, किसी वस्तु का उपयोग किए बिना अपने बारे में कुछ बताइए,' तो बहुत कठिनाई हो जाएगी।
आप शुरू करेंगे, आप कहेंगे, 'मैं वहाँ का रहने वाला हूँ।' टोक दिया जाएगा कि, 'नहीं, किसी जगह का नाम लिए बिना अपने बारे में बताइए।' तो फिर आप कहेंगे, 'ये जो दिख रहा है ये मेरा घर है।'




