प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या मरने के बाद ही मृत्यु को जाना जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: मर नहीं रहे हो क्या प्रतिपल? मरने का मतलब मिटना ही तो होता है। तुम्हारे शरीर में एक भी कोशिका बची है वो जो जन्म के वक्त थी? जन्म के वक्त तुम्हारे शरीर में जितनी कोशिकाएँ थीं उसमें से एक भी बची है? तो कहाँ है वो जिसने जन्म लिया था? मर ही नहीं गया क्या वो?
अरे बाबा! इसमें (हाथ में मग पकड़े हुए) जितने अणु-परमाणु हैं वो सब बिखर जाएँ, एक भी न बचे तो क्या ये बचेगा? तुमने भी जब जन्म लिया था तो तुम्हारे शरीर में जितनी सेल्स थीं, कोशिकाएँ थीं उसमें से, मैं पूछ रहा हूँ एक भी बची है? एक बता दो, एक। एक भी बची है? अगर नहीं बची है तो तुम तो कब के मर चुके। तुम हो कहाँ! तुम तो प्रतिपल मर रहे हो। ये क्या हो गया! ये तो गड़बड़ हो गई।
शरीर नहीं आगे बढ़ रहा, अहम् है जो आगे बढ़ता जा रहा है। अतीत के साथ अतीत ख़त्म हो जाता है पर तुम अतीत से जुड़े रह जाते हो, तुम्हारा नाम है अहंकार। कल बीत गया पर तुम कल से अभी भी जुड़े हुए हो। पुरानी कोशिकाएँ कब की झड़ गईं, तुम अभी भी अपनेआप को वही मानते हो जो जन्मा था, इसका नाम है अहंकार।
मर तो रहे ही हो, मरने का मतलब होता है जो है अब वो नहीं रहा और जो अभी है वो आगे नहीं रहेगा। समय का अर्थ ही है मृत्यु! मृत्यु तो हो ही रही है।
तुम जब दसवीं में थे तो धनुकलाल से तुमको बहुत प्रेम था, था कि नहीं? तुम्हारे साथ पढ़ता था धनुकलाल। देखो! तुम्हें अब उसका नाम भी नहीं याद है। मुझे याद है क्योंकि अभी बाहर मैं घूम रहा था तो आकर बता गया कि ‘ये बड़े बेवफ़ा निकले, दसवीं में हमारा ही टिफिन खाते थे। हमने ही नकल करवा-करवाकर इनको पास करवाया और हमें भूल ही गए, बिलकुल।’ पूछो, अभी धनुकलाल याद है? पूछो। धनुकलाल नहीं याद तो धनुकलाल का क्या हुआ? मर गया न?




