प्रश्नकर्ता: उच्चतम स्थान किसका है? क्या सत्य और ईश्वर एक हैं? जो उच्चतम है, उसके प्रति प्रार्थना का क्या अर्थ है? और दूसरा मुद्दा, दूसरा प्रश्न — रक्षा माने क्या?
आचार्य प्रशांत: हम जैसे होते हैं, रक्षा शब्द का तात्पर्य हमारे लिए वैसा ही होता है। और हम जैसे होते हैं, उच्चतम भी हमारे स्थान का ही एक विस्तार होता है, या एक प्रतिबिम्ब होता है।
अहंकार चाहता है कि वो जैसा है वैसा ही बना रहे। और उसके ऐसा चाहने के पीछे बड़ा कारण है। वो जैसा है, वैसा वो बना रह नहीं सकता। इसीलिए उसकी विवशता है ये चाहना कि काश! मैं जैसा हूँ वैसा बना रह पाता। जिसके अस्तित्व में सत्यता है, उसे अपने अस्तित्व की रक्षा की परवाह तो करनी पड़ेगी नहीं। और अहंकार हमेशा यही माँगता रहता है, 'हे प्रभु! रक्षा करो।' इससे अहंकार की स्थिति के बारे में, और अहंकार की अपनी स्थिति के प्रति रवैये के बारे में, क्या पता चलता है? पता ये चलता है, पहली बात, अहंकार की स्थिति नाज़ुक है, डाँवाडोल है। और दूसरी बात, वो ये जानता है कि उसकी स्थिति नाज़ुक है, डाँवाडोल है। तो कोई ये न कहे कि वो पूर्णतया अज्ञानी है, या अपनी निस्सारता को, अपने अज्ञान को, अन्धकार को जानता नहीं था। हमें ये जो भीतर डर लगता है, भविष्य की और सुरक्षा की कुलबुलाहट रहती है; यही इस बात का प्रमाण है कि हम जानते हैं कि हम झूठ हैं।
सच मिट सकता नहीं, सच टल सकता नहीं, सच कट सकता नहीं तो सच अपनी रक्षा के लिए कोई प्रार्थना या प्रयत्न करेगा क्यों? हम तो प्रार्थना भी करते हैं, प्रयत्न भी करते हैं। माने हम जानते हैं कि हम सच तो हैं नहीं। और हम प्रार्थना करते हैं इसी भाव, इसी माँग के साथ कि हम बचे रहें। तो हम फिर बचे-बचे जैसे रह सकते हैं — जैसे हम फिलहाल हैं — हम उसी के अनुरूप एक ईश्वर बनाकर के, उससे फिर प्रार्थना करते हैं।
माने हमारी प्रार्थना एक झूठ से आ रही है, और हमारी प्रार्थना हमारे ही झूठ से उठती हुई एक छवि की ओर जा रही है। हमारी प्रार्थना एक झूठ से आ रही है, हमारी प्रार्थना हमारे झूठ से उठती हुई एक छवि की ओर जा रही है। और झूठ का ही जो पूरा कारोबार है, इसी को बचाये रखने के लिए प्रार्थना की जा रही है। ये बात समझ में आ रही है?







