प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मुझे मृत्यु से बहुत डर लगता है। स्वयं को मृत्यु के लिए कैसे तैयार करूँ?
आचार्य प्रशांत: मृत्यु का यही मतलब होता है न, कि कल नहीं आएगा? कल अब नहीं आएगा। मृत्यु का मतलब होता है भविष्य की मृत्यु; समय नहीं बचा न अब। जब और समय न बचे तो उसको कह देते हैं कि मृत्यु आ गई। ज़ाहिर सी बात है जो मौत से डर रहा है वो वास्तव में इस बात से डर रहा है कि समय नहीं बचेगा। तो वो तो ठीक भी है।
कोई चीज़ अगर चाहिए हो और ख़त्म हो जाए, तो बुरा लगना लाज़मी है। समय चाहिए और समय ख़त्म हो गया; बुरा तो लगेगा। प्यास लगी है, पानी पीना है, ख़त्म हो गया; बुरा तो लगेगा। तो ऐसा इंतज़ाम कर लो कि समय की ज़रूरत ख़त्म हो जाए।
समय चाहिए होता है किन्हीं कामों के लिए। समय की आवश्यकता होती है कुछ काम निपटाने के लिए। समय माने जानते हो न क्या होता है? बदलाव। घड़ी में भी तुम बदलते समय को तभी पकड़ पाते हो, जब काँटों की स्थिति बदलती है। और समय का तो अर्थ ही होता है कि जो चीज़ें पहले जैसी थीं, अब वैसी नहीं रहीं। एक पल भी अगर समय बीता तो एक पल पूर्व जैसी स्थिति थी एक पल पश्चात वो वैसी नहीं रहती; समय माने बदलाव।
तो जिसको अभी समय चाहिए, उसको अभी क्या चाहिए? बदलाव। है न? क्योंकि समय तो तुम्हें चाहिए ही तब जब अभी कुछ बदलने की ज़रूरत है। जब अभी कुछ ठीक नहीं है और उसे बदला जाना आवश्यक है। तो हमने ये दो-तीन बातें अभी तक देखी हैं।
हमने कहा कि मृत्यु का मतलब होता है भविष्य का छिन जाना; अब समय नहीं बचेगा। और समय हमें चाहिए होता है किसी काम के लिए। अन्यथा समय क्यों चाहिए? समय की चाहत का अर्थ ही है कि अभी कुछ बदला जाना शेष है। कुछ है ऐसा जो अभी वैसा नहीं है जैसा उसे होना चाहिए। और इसीलिए तुम डरते हो मौत से। क्योंकि अभी तुम वैसे नहीं हो जैसा तुम्हें होना चाहिए।




