जीवन अवसर मात्र है, जितना भी जियो, पूरा जियो। वर्षों की लंबाई मायने नहीं रखती। जीवन में गहराई हो, तभी बात बनती है। भगत सिंह - इक्कीस साल। जीज़स, विवेकानंद, जॉन ऑफ़ आर्क - इनमें से कौन लंबा जिया था? मृत्यु को सदा याद रखो, क्योंकि वो लगातार घटित हो रही है, सामने है तुम्हारे; और जो सामने है, उसका डर कैसा? जीने का एक ही उद्देश्य है - शरीर मरे, इससे पहले मरने का डर मर जाए।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हमारा नाम शैलेन्द्र है, हम आपकी वीडियोज़ देखते हैं, आज फ़ेसबुक डाउनलोड करके सत्संग से जुड़े हैं। हम बत्तीस साल के हैं और हमको मधुमेह हो गया है, क्या ये डरने की बात है? डर से सम्बन्धित आपके सभी वीडियोज़ देख लिए हैं, बहुत फ़ायदा हुआ है, पर डर फिर भी आ ही जाता है, पूरा ही दूर कर दें।
आचार्य प्रशांत: तुम्हें जिस बात का डर है वो बात तो होकर रहेगी, तो तुम शंका से पूरी तरह मुक्त हो जाओ; निशंक होने का इससे बढ़िया तरीका और मौका नहीं है।
अगर तुम्हें ये शंका है कि ये रोग तुम्हें ले जाएगा, तो इसमें शंका की कोई बात ही नहीं, ये तो होना है, पक्का! मौत आ रही है, और उसको पूरी तरह स्वीकार कर लो। ये रोग यूँही थोड़े ही आया है, ये तुम्हें ले ही जाने के लिए आया है; मधुमेह कभी किसी का ठीक होता सुना है? ये उठाके ही ले जाएगा, बात ख़त्म, डर किस बात का है?
डर में तो सदा ये सम्भावना होती है, ये ख़याल होता है कि कुछ बुरा घटित हो सकता है भविष्य में। भविष्य में क्या घटित होगा बुरा, जो होना था वो तो उसी क्षण घटित हो गया जिस क्षण तुम गर्भ से पैदा हुए थे। मृत्युधर्मा हो तुम, मतलब समझते हो मृत्युधर्मा होने का? मृत्युधर्मा होने का अर्थ होता है कि इस शरीर की एक ही दिशा है, ये मृत्योन्मुखी है, और इस जीवन का भी एक ही सार्थक उपयोग है कि ये सदा मृत्यु की ओर अग्रसर रहे।



