
गुरु लोग और बड़े-बड़े पदाधिकारी भारत में और दुनिया भर से योग दिवस को अपना समर्थन दर्शाते हैं। लोग शारीरिक मुद्राओं में अपनी तस्वीरें डालते हैं — एक योगा मैट होता है, उसपर योगा करते हुए कहते हैं, "Celebrating Yoga Day!" लेकिन योग का संबंध व्यायाम और कसरत से नहीं, बल्कि मन से है। योग मन की बात है — क्योंकि मन परेशान है। और योग वास्तव में क्या है — यह जानना है, तो भगवद्गीता की ओर जाना ही पड़ेगा।





प्रश्नकर्ता: सर, मैं आपके साथ एकदम खुलकर बात करना चाहता हूँ। मैं आपको सुनने के साथ-साथ कई ऐसे व्यक्तियों को भी यूट्यूब पर बहुत सुनता हूँ जिनकी आप आलोचना करते हैं। मैं उनसे बहुत प्रभावित हूँ और वो मुझे बहुत




प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, मेरा मन हमेशा के लिए किसी एकांत जगह पर जाकर ध्यान साधना और भक्ति में डूबने को करता है लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। कृपया मार्गदर्शन करें।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान और योग से मिलने वाले सुखद अनुभवों से मुक्त कैसे हों?



विस्मयो योगभूमिका:


चुपै चुप ना होवई जे लाइ रहा लिव तार

अहं अगनि हिरदै जरै, गुरू सों चाहै मान। तिनका जम न्यौता दिया, हो हमरे मिहमान॥














प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, साक्षीभाव से साधना के विषय में कहा जाता है कि किसी एक विशेष चीज़ पर आपका ध्यान लगा होना चाहिए, जैसे विपश्यना ध्यान जिसमें अपनी आती-जाती साँसों के प्रति होश पूर्ण रहा जाता है, लेकिन आप हमें जिस चीज़ के प्रति सचेत रहने को कहते हैं वो…
आचार्य प्रशांत: कर्मसंन्यास और कर्मयोग क्या हैं? दोनों में अन्तर क्या है? आमतौर पर हम जिसे कर्म कहते हैं; वो कैसे होता है? वो ऐसे होता है कि जैविक रूप से और सामाजिक रूप से मन संस्कारित रहता है। फ़िज़िकल, सोशल दोनों तरह के संस्कार। तो मन में पहले…
अयति: श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानस:। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।६.३७।।
अर्जुन बोले — हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम सारे योग के विद्यार्थी हैं और योग का दुनिया में बोल-बाला है। योग के विद्यार्थियों के लिए आपका क्या मार्गदर्शन है? वास्तविकता में योग क्या है?
आचार्य प्रशांत: खंडित मन दुख है और केन्द्र से विस्थापित मन दुख है, दोनो बातें समझनी होंगी।
आमतौर पर मन…
आचार्य प्रशांत: योग की दृष्टि से मन और शरीर दोनों न सिर्फ़ अन्तर्सम्बन्धित हैं बल्कि दोनों एक-दूसरे से परस्पर कार्य-कारण का सम्बन्ध भी रखते हैं। माने अगर मन पर काम करोगे तो उसका प्रभाव तन पर दिखाई देगा और तन पर काम करोगे तो उसका प्रभाव मन पर दिखाई देगा।…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप ही के साथ रहकर पिछले कुछ समय से मुख्य उपनिषदों को पढ़ने का मौक़ा मिला। जब मुख्य उपनिषदों का पाठ कर रहा था तो मैंने एक बात उसमें देखी, जो बड़ी अजीब लगी। कि आज के समय में अध्यात्म का जो प्रचलित मतलब है, वो चक्रों…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमस्ते, आज योग दिवस है तो देश-दुनिया के जितने भी समाचार है हर जगह पर योग को लेकर ही चर्चा हो रही है। तो मैं काफ़ी चीज़ें पढ़ रहा था तो वहाँ पर एक चीज़ मुझे बार-बार पढ़ने को मिल रही थी जहाँ पर लोग कह रहे…
बड़ी गर्मी पड़ रही हो। तपती गर्मी, लू, जेठ माह की। मान…
प्रश्नकर्ता: योग तो कालातीत है, पर उसके सामने समकालीन चुनौतियाँ क्या हैं?
आचार्य प्रशांत:
योग के सामने कोई चुनौतियाँ नहीं होती। योग तो मन की सहायता हेतु है। मन चुनौतियों से घिरा हुआ है, मन की सहायता के लिए योग है।
आपने कहा, “समकालीन चुनौतियाँ”, काल ही मन के लिए…
आचार्य प्रशांत: पतंजलि कहते हैं, “वृत्तियों से मुक्ति के लिए अभ्यास और वैराग्य।” अभ्यास और वैराग्य – समझेंगे दोनों को।
दोनों युक्तियाँ हैं। पहले तो ये जाने दोनों विधियाँ हैं, दोनों ही मन के तल पर विधियाँ हैं – अभ्यास और वैराग्य। पर दोनों में थोड़ा अन्तर है। क्या…
वक्ता: विस्मय, अचरज, कौतुक – योग की पृष्ठभूमि है। विस्मय, वो आरम्भ है जिसका अंत योग में होता है। योग क्या? योग वो, जो हम सबको चाहिए। योग वो, जो हम सबकी मांग है। किसी और नाम से…
प्रश्नकर्ता: योग का अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: योग का अर्थ इतना ही है कि जो दो हिस्से मैंने कर रखे होते हैं–अच्छा और बुरा, ये दोनों एक हो गए, इनका योग हो गया क्योंकि योग होने के लिए और कोई दो होते नहीं हैं। योग तो तभी होगा न…
अनुवाद: मौन धारण करने से मन चुप नहीं होता और ना ही प्रभु से मिलाप होता है , चाहे मन लगातार ध्यान में लगा रहे!
वक्ता: चुपै चुप ना होवई, इसमें हमें कोई समस्या नहीं हैं| बात…
वक्ता :गुरु और शिष्य की कहानी है। उनके संबंधों के विषय में है। अहं की आग सीने में धकधक जल रही है। अहं कहता है, “मुझे मान्यता मिले, स्वीकृति मिले, प्रशंसा मिले”।…
सोमवारी और काँवड़ यात्रा का बाहरी आयोजन तभी सार्थक है जब उसका संबंध शिवत्व और सत्य से हो। केवल भीड़, दिखावे, मांसाहार छोड़ने की औपचारिकता या पुत्र की कामना को धर्म मान लेना वास्तविक धर्म नहीं है। काँवड़ियों को दोष देने के बजाय उस सामूहिक मानसिकता को देखना चाहिए जो ऐसे कर्मों को जन्म देती है। धर्म का उद्देश्य लोकधर्म की रूढ़ियों को बढ़ाना नहीं, बल्कि विवेक और समझ के द्वारा उनसे मुक्त करना है।
युवाओं में बढ़ते नशे की समस्या का मूल कारण केवल ड्रग्स नहीं, बल्कि दिशाहीन और अशांत जीवन है। जब व्यक्ति अपने अस्तित्व, उद्देश्य और भीतर की बेचैनी का सामना नहीं कर पाता, तो वह किसी-न-किसी नशे में शरण खोजता है—चाहे वह शराब हो, सोशल मीडिया, मनोरंजन, भोजन या प्रसिद्धि। स्थायी समाधान बाहरी रोकथाम नहीं, बल्कि आत्म-शिक्षा, जीवन की सही दिशा और स्वयं को समझने वाली शिक्षा है, जिससे ऊर्जा सार्थक कार्यों में लगे और नशे की आवश्यकता ही समाप्त हो जाए।
धर्म का अर्थ अंधविश्वास या मान्यताओं को मान लेना नहीं, बल्कि निर्भीक जिज्ञासा और सत्य की खोज है। बच्चों पर धार्मिक नियम थोपने के बजाय उन्हें प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। भय, शर्म और अपराधबोध पर आधारित धार्मिक संस्कार व्यक्ति को सत्य से दूर और देह-केंद्रित बना देते हैं। सच्चा धर्म हर मान्यता की निष्पक्ष जाँच, तथ्य के प्रति ईमानदारी और आंतरिक स्वतंत्रता का नाम है। प्रश्नचिह्न ही धार्मिकता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
क्या सभी गुरु और ग्रंथ व्यर्थ हैं, या यह भी अहंकार का एक नया रूप है? इस संवाद में आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सत्य का कोई निश्चित मार्ग नहीं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गुरु और शास्त्रों का महत्व समाप्त हो जाता है। वे मौलिकता, कृतज्ञता और बौद्धिक ईमानदारी पर ज़ोर देते हुए समझाते हैं कि जिसने जहाँ से सीखा है, उसका स्वीकार आवश्यक है। साथ ही चेतावनी देते हैं कि "मैं स्वयं ही पर्याप्त हूँ" का विचार भी अहंकार का सूक्ष्म खेल बन सकता है।
बार-बार लक्ष्य छोड़ देने का कारण इच्छाशक्ति की कमी नहीं, बल्कि गलत और उधार लिए हुए लक्ष्य हैं। जिन उद्देश्यों का जन्म प्रेम, समझ और आत्मबोध से नहीं होता, वे बोझ बन जाते हैं। सही लक्ष्य भीतर की स्पष्टता से निकलता है और वही व्यक्ति को स्वाभाविक समर्पण देता है। इसलिए प्रेरणा खोजने से पहले स्वयं को जानना, आत्म-अवलोकन करना और यह समझना ज़रूरी है कि वास्तव में हमारे लिए क्या मूल्यवान है।
काम का मूल्य जीत, पुरस्कार या दूसरों से आगे निकलने में नहीं, बल्कि उसके प्रति प्रेम और समझ में है। जब कोई कार्य केवल प्रतियोगिता या प्रशंसा के लिए किया जाता है, तो वह बोझ बन जाता है। सच्चा आनंद उसी काम में है जिसे व्यक्ति स्वाभाविक रूप से करना चाहता है। इसी तरह डर कोई समस्या नहीं है; समस्या तब है जब डर हमें सही काम करने से रोक दे। जो सही और आवश्यक है, उसे डर, असफलता या संकोच के बावजूद करते रहना चाहिए।
उच्च शिक्षा संस्थानों में विद्यार्थियों का तनाव केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि इतिहास, सामाजिक भय, आर्थिक असुरक्षा और प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था का परिणाम है। परिवार, कोचिंग संस्कृति और सफलता की संकीर्ण परिभाषाएँ छात्रों पर भारी दबाव डालती हैं। समाधान केवल काउंसलिंग नहीं, बल्कि ऐसी समग्र शिक्षा है जो रचनात्मकता, खेल, कला, दर्शन, आत्मबोध और स्वतंत्र चुनाव को महत्व दे, ताकि विद्यार्थी केवल करियर नहीं, बल्कि संतुलित और सार्थक जीवन भी जी सकें।
प्रार्थना का अर्थ किसी बाहरी शक्ति से इच्छाएँ माँगना नहीं, बल्कि स्वयं को उसके सामने पूर्णतः समर्पित कर देना है। जब तक अहंकार और व्यक्तिगत कर्तापन बना रहता है, प्रार्थना अधूरी रहती है। सच्ची प्रार्थना में व्यक्ति का सीमित “मैं” मिटता है और उसके कर्म बोध तथा सत्य से संचालित होने लगते हैं। तब जीवन में सही निर्णय स्वाभाविक रूप से होते हैं और बाहरी समस्याओं का समाधान भी उसी जागरूकता से निकलता है।
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।
मुक्त कर्म वही है जिसमें आनंद किसी भविष्य के परिणाम में नहीं, बल्कि कर्म करने में ही होता है। बच्चा खेलते समय किसी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता; खेल ही उसका सुख है। इसके विपरीत, बंधन और लालच से किए गए कर्म हमेशा हिसाब, मुआवज़े और भविष्य की आशा से भरे होते हैं। निष्काम कर्म वही है जहाँ कर्म स्वयं ही अपना पुरस्कार बन जाता है, और जीवन गणना नहीं बल्कि सहज उल्लास में बदल जाता है।
बंगाल चुनाव सिर्फ़ सत्ता का संघर्ष नहीं, एक विचारधारा की थकान का भी संकेत हैं। मार्क्सवाद ने मनुष्य को वर्गों में बाँटकर यह मान लिया कि उसकी चेतना जन्म और परिस्थितियों से तय होती है। लेकिन इतिहास बार-बार दिखाता है कि इंसान कठपुतली नहीं है। अगर चेतना सिर्फ़ वर्ग से तय होती, तो स्वयं मार्क्स, विवेकानंद, कबीर या राजा राममोहन राय जैसे लोग अपने ही वर्ग के विरुद्ध खड़े कैसे होते?
आप आस्था खोज रहे हैं, पर क्या आस्था कभी ज़बरदस्ती पैदा होती है? आस्था फूल है, जो सही बीज, सही मिट्टी और सही संगति मिलने पर अपने आप खिलती है। शुरुआत श्रद्धा से नहीं, जिज्ञासा से होती है। सम्मान से नहीं, संदेह से होती है। परखिए, पूछिए, प्रयोग करिए। जहाँ वास्तविक लाभ होगा, वहाँ आस्था अपने आप जन्म लेगी, बनावटी नहीं।
आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
आस्था और ज़िम्मेदारी अलग नहीं हैं; सच्ची आस्था खुद ज़िम्मेदारी बन जाती है। धर्म के नाम पर प्रकृति का नुकसान और अंधविश्वास, धर्म नहीं बल्कि अज्ञान है। वास्तविक धर्म समझ और सत्य पर आधारित है, न कि परंपराओं की अंधी नकल पर। अंधविश्वास पर प्रश्न उठाना धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उसे बचाने का काम है।

आप सपनों से परेशान होकर जागते हैं, फिर भी उन्हें पूरे दिन ढोते रहते हैं। अगर गड़बड़ी सपने में थी, तो उसे जागृत जीवन में क्यों लाना? वर्तमान जीवन अपने आप में पूर्ण है, पर आप उससे बचने के लिए बीते भ्रमों को पकड़े रहते हैं। सपने कामनाओं से जन्म लेते हैं; जितना उन्हें पकड़ोगे, उतना वे आपको पकड़ेंगे। छोड़ दो, तभी स्पष्टता आएगी।

आचार्य प्रशांत कलिंग में युवाओं से संवाद करते हैं। वे कहते हैं कि दर्शन सत्य की खोज है, जो आत्म-अनुसंधान से शुरू होती है। परंपरा सदा से चली आ रही है, बस रूप बदल गया है। विकृत धर्म बाजार बन गया है। युवाओं को अपनी बीमारी पहचानी चाहिए। सोशल मीडिया एल्गोरिदम मन को नियंत्रित कर रहा है। सच्चा शिक्षक वह है जो आपकी झूठी धारणाओं को चुनौती दे।

जिसको जितना होता है, उतना पूरा नहीं लग रहा। हर आदमी अपनी चादर थोड़ा और फैलाना चाहता है, बस यही बात है। साधारण-सी चीज़ है कामना, कामना पूरी करने के लिए अगर इधर-उधर के तरीकों का इस्तेमाल करना पड़े, तो आदमी कर लेता है। उसमें दो चीज़ें होती हैं, एक तो जो आपकी व्यवस्था है या तो वो इतनी साफ़, सही और सख़्त हो कि वो गुंजाइश ही न छोड़े अवैध या अनैतिक तरीकों की, तो भी भ्रष्टाचार नहीं होगा।

भारत कोई ज़मीन का टुकड़ा तो है नहीं। जैसे भारतवासी आज के हैं, आज का भारत भी वैसा ही होगा। यहाँ हवा गंदी है, क्योंकि भीतर से हम गंदे हैं। सड़कों पर गड्ढे हैं, क्योंकि हम गड्ढे हैं। बाहर जो कुछ होता है, वो आपके भीतरी जगत का प्रतिबिंब होता है, एक अर्थ में। इंसान जगेगा, तो ये नज़ारा बदलेगा। जो तुम्हारी वास्तविक हालत है, उसको आँखें खोल करके देखो। उसको देख लोगे, तो फिर उससे आगे निकलने का रास्ता मिल जाएगा।

समसामयिक हिन्दू धर्म पुराणों, स्मृति ग्रंथ और स्थानीय क़िस्म की परंपराओं पर चल रहा है। वो हिन्दू धर्म है ही नहीं। हिन्दू धर्म से अगर हमारा आशय है वेदों के दर्शन पर आधारित धर्म, तो हिन्दू धर्म न अगड़ा है, न पिछड़ा है; हिन्दू धर्म एकमात्र धर्म है। धर्म तो एक ही है, ये जो दुख में बैठा हुआ है, इसका दुख दूर करना। बाक़ी सब कुछ किसी धर्म, पंथ, मज़हब में हो रहा हो, वो सब अंधविश्वास है। हिन्दू धर्म कहता है, “वो है कौन जो दुःखी है? प्रश्न करो, और प्रश्न का जवाब परंपरा नहीं, प्रयोग देगा।”

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक है, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” कर्म पर ही अधिकार है, फल पर कतई नहीं है। एक सच्चे ईमानदार आदमी की स्थिति यह होती है, “सही काम चुनूँगा, और आगे जो कुछ होगा, उससे कोई लेना-देना नहीं। अच्छा हुआ तो अच्छी बात है, और बुरा हो गया तो भी हम पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।” सफलता तो संयोग होती है। एकदम दो कौड़ी के आदमी को भी आप पाएँगे कि सफलता मिल सकती है। महत्त्व प्रयास का होता है, सफलता का नहीं। सही काम चुनो, अधिकतम प्रयास करो।

शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

गीता की ब्रांडिंग एक लोकधार्मिक बुक के रूप में हो गई है। तो ये जो जेन-ज़ी है, जब लोकधर्म को ठुकराती है, तो लोकधर्म के साथ-साथ गीता को भी ठुकरा देती है। थ्रोइंग द बेबी अवे विद द बाथ-वॉटर। तो उनके लिए गीता, पुराण सब एक है। और जो चलती है, रावण संहिता उनके लिए वो सब एक है।

टोटल जीडीपी हमारा इसलिए हाई नहीं है कि भारत अमीर हो गया है। वह इसलिए हाई है क्योंकि यहाँ जनसंख्या बहुत है और मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पास अंधाधुंध दौलत है। पॉल्यूशन और पॉपुलेशन, इनका चोली-दामन का साथ है। तुम्हें बहुत कम जगह मिलेंगी जहाँ पॉपुलेशन नहीं है, पर पॉल्यूशन है। इतने लोग हो जाएँगे, कैसे उनको गरिमा की ज़िंदगी मिल सकती है? न हमें वह ग़रीबी चाहिए, जिसमें एक ऐसे 8×8 के क्षेत्र में चार लोग रह रहे हों। न वह अमीरी चाहिए कि एक आदमी कार में चल रहा है और दुनिया भर पर धुआँ छोड़ता हुआ चल रहा है। सस्टेनेबिलिटी चाहिए।

लोगों को लगता है, संविधान तो हमारा दुनिया के बाकी कॉन्स्टिट्यूशन से इंस्पायर्ड है; नहीं, तुम्हारा संविधान तुम्हारी मिट्टी से उठा है। जिस देश के केंद्र में आत्मा हो, वहाँ लिबर्टी, इक्वलिटी, फ्रेटरनिटी अपने आप आ जाती हैं। फ्रीडम, जो कि उच्चतम आध्यात्मिक बात होती है, देखिए आपका संविधान उसको कितना महत्व देता है। भारत इस अर्थ में थोड़ा-सा विशेष राष्ट्र है। भारत का संविधान उदार है, ऊँचा है। क्योंकि हम आध्यात्मिक लोग थे, इसलिए हम इतना उदार संविधान अपना पाए।

सुभाषचन्द्र बोस के जीवन में वेदान्त कितना केंद्रीय था, ये बात आमतौर पर सामने नहीं आती है। उनका मन सदा संघर्ष की ओर था। उपनिषद उनके जीवन में आए, और एकदम एक नई शुरुआत हो गई। वो भयानक विद्रोही हो गए थे, और संघर्ष से नीचे वो कोई चीज मानते नहीं थे। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा, ऐसे ही कोई ड्रेस पहन के खड़ा हो जाता है, नेताजी कहला जाता है, ऐसा नहीं होता। जान पर खेलना पड़ता है; किसी और से खून मांगने से पहले अपना खून बहाना पड़ता है। इसको साधना बोलते हैं। वेदान्त ये साधना सिखाता है।

“क्या राष्ट्रवाद एक बीमारी ही नहीं है?” उस सवाल को अब आप ज़रा दूसरे तरीके से रखिए। वो सवाल ये है, कि क्या आदमी और आदमी के संबंध बीमार नहीं हैं? तो होगा राष्ट्र दस करोड़ लोगों का, चाहे सौ करोड़ लोगों का, लेकिन उसके केंद्र में तो उसके एक-एक सदस्य की, व्यक्ति की आत्म-परिभाषा बैठी हुई है। जो आप अपने बारे में सोचते हैं, उसी आधार पर आप दूसरे संबंध बनाते हैं, और उसी आधार पर फिर आप व्यापक, विस्तृत तौर पर एक राष्ट्र खड़ा कर लेते हैं।

तुम ट्रेन पकड़ने जा रहे हो और तुम दौड़ रहे हो। बीच-बीच में रुक जाते हो और मोटिवेशनल वीडियो देखते हो? ऐसा होता है क्या? वहाँ तुम्हें मोटिवेशन नहीं चाहिए होता, वहाँ तुम्हें घड़ी चाहिए होती है। तथ्य काफ़ी है। मोटिवेशन उनको चाहिए, जो कोई काम बिल्कुल अंधे होकर कर रहे हैं। भीतर से कोई ललक है ही नहीं, लेकिन डर के मारे वो काम करना भी पड़ रहा है। मोटिवेट होकर भी क्या होगा? तुमने काम ही ग़लत उठा लिया है, क्योंकि काम अगर सही होता है, तो काम ही जान बन जाता है। फिर मोटिवेशन नहीं चाहिए होता।

तुम जिस भी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने जाते हो और कर लेते हो, उस उत्कृष्टता की दुनिया तुरंत बोली लगानी शुरू कर देती है। इसीलिए तो दुनिया के जितने भी कॉम्पिटेंट लोग हैं, वह शैतान की सेवा में लगे हुए हैं। वह बोली ऊँची लगाता है और ढंग के कामों के लिए कॉम्पिटेंट लोग मिलने बहुत मुश्किल है। सारा खेल ही इसी बात का है कि कर क्या रहे हो? कितनी कुशलता से कर रहे हो, ये पीछे की बात है। आदमी ऐसा चाहिए, अर्जुन जैसा, कॉम्पिटेंट भी हो और कृष्ण के साथ भी है। तब फिर गीता बरसती है। तब आता है मज़ा।

भाषा तो उतनी ही सशक्त हो पाएगी, जितने शक्तिशाली उसको बोलने वाले लोग हैं। हिंदी नहीं पीछे हट गई है; हिंदी बोलने वाले सब कायर हैं। इनको अपनी हस्ती पर ही शंका होनी शुरू हो जाती है, जब सामने कोई अंग्रेज़ी बोल देता है। विचार और चेतना के तल पर ऊँचे स्तर की सामग्री सब आपको अंग्रेज़ी में मिलेगी, और हिंदी हमने छोड़ दी है गाली-गलौज करने वालों और रोस्टर्स के हाथों में। ये बीमारी अब छोटे-छोटे कस्बों में, गाँवों में भी पहुँच रही है। अंग्रेज़ी सीखना एक बात है, अंग्रेज बन जाना बिल्कुल दूसरी बात है ना।

एक जगह धोखा खाया। अच्छा, वहाँ गए क्यों थे? धोखा खाने तो नहीं गए थे। वहाँ पर कुछ आशा थी, कुछ कामना थी, कुछ अच्छा-अच्छा सा लगा होगा। क्या फ़र्क़ पड़ता है कि सामने जलेबी आई या कचौड़ी आई; लार तो वही की वही थी न। ये सब लोकधर्म है कि आपका किसी ने बुरा करा है, तो उसका कार्मिक बैलेंस ख़राब हो जाएगा। बाहर जो कुछ हो रहा है, सब रैंडम है। आपके पास एक ही चीज़ है: चॉइस, जिसको आप कह सकते हो कि आपकी है। उसके अलावा मत सोचिए कि आसमानों पर कहानियाँ लिखी गई हैं; मिट्टी हैं हम, धूल हैं हम।

आम आदमी को भले ही कम चोट लगती हो, आप धार्मिक आदमी को कहोगे, उसे खट से चोट लगती है। अभी यहाँ कोई बैठा हो बहुत धार्मिक आदमी, वह भीतर से छलनी हुआ जा रहा होगा, “क्या बोल रहे हैं! महापाप!” तुमने अनंत को इतनी छोटी चीज़ क्यों बना दिया कि कोई उसको घाव दे सके, बताओ न। आकाश पर चोट लग सकती है? मारो गोली, आकाश को लगेगी चोट? थूको आकाश पर, आकाश गंदा हो जाएगा? सत्य तो आकाश है, जिसमें घुला जा सकता है उसमें लीन हुआ जा सकता है।