अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं राजस्थान से हूँ। राजस्थान भारत के उन राज्यों में से है जो लिंगानुपात की दृष्टि से पिछड़े हुए राज्य हैं। मेरा प्रश्न ये है कि आज के समाज में भी जब परिवार में बिटिया का जन्म होता है तो एक असंतोष का माहौल बनता है, निराशा छा जाती है, बड़े दुःख का माहौल रहता है, और जब बेटे का जन्म होता है तो सोशल मीडिया पर डालते हैं और बधाईयाँ देते हैं। ऐसे कई तरह के आशीर्वाद भी चले आ रहे हैं, जैसे दूधो नहाओ, पूतो फलो। क्या परिवार में बेटे का होना ज़रूरी है? क्या बेटियाँ इसकी पूर्ति नहीं कर सकतीं? आप इस पर कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: देखो, इसका सम्बन्ध संस्कृति से है। भारत की विडंबना ये रही है कि यहाँ अध्यात्म और संस्कृति के बीच बहुत कम सम्बन्ध रहा है, ग़ौर से समझिएगा, बहुत–बहुत कम सम्बन्ध रहा है। जिसको आप भारतीय धर्म कहते हैं, वो भारतीय अध्यात्म से काफ़ी दूरी रखता है, और जिसको आप भारतीय संस्कृति कहते हो, वो भारतीय धर्म से काफ़ी दूरी रखता है। अध्यात्म का स्तर अगर बहुत ऊँचा है – वो अध्यात्म जो आपको वेदान्त, उपनिषदों में, गीता में, ब्रहसूत्र में, अष्टावक्र गीता में, कबीर साहब की वाणी में सुनने को मिलता है – अध्यात्म का स्तर बहुत अगर ऊँचा है (हाथ को ऊँचा उठाते हुए) तो ये (हाथ को पहले से नीचे लाकर) भारतीय धर्म है जिसका हम सक्रिय अभ्यास करते हैं, जिसको हम जीते हैं अपने दैनिक जीवन में। वो भारतीय धर्म अध्यात्म से बहुत निचले स्तर का है।
हम दिनों–दिन जिस चीज़ को धर्म बोल करके कार्यान्वित करते हैं, उसका अध्यात्म से बहुत कम ताल्लुक है, वो अध्यात्म से बहुत नीचे का है। और फिर हम जिसको अपनी संस्कृति कहते हैं, वो धर्म से भी नीचे की है। उसका तो धर्म से भी कोई सम्बन्ध नहीं है। तो फिर बताइए अध्यात्म और संस्कृति में कोई सम्बन्ध है? अरे! पूरब–पश्चिम वाली बात हो गई, ज़मीन–आसमान वाली बात हो गई।
लेकिन अगर आपने कभी इस मुद्दे पर विचार नहीं करा है तो आप इन तीनों को एक ही साँस में बोल जाते हैं। आप कभी कह देते हैं ‘भारतीय अध्यात्म’, कभी कह देते हैं ‘भारतीय धर्म’, कभी कह देते हैं ‘भारतीय दर्शन’, कभी कह देते हैं ‘भारतीय संस्कृति’, और आपको लगता है आप एक ही चीज़ की तो बात कर रहे हो। ये बहुत अलग-अलग हैं, बहुत-बहुत अलग-अलग हैं। हम भारतीय संस्कृति जिसको बोलते हैं, उसमें बहुत सारे तत्व बहुत ज़्यादा दूषित हैं। भारतीय अध्यात्म सर्वश्रेष्ठ है, सर्वोपरि है। शायद उससे ऊँचा कभी कुछ ना हुआ है ना हो सकता है, लेकिन भारतीय संस्कृति बिलकुल रसातल में है और उसके बहुत सारे तत्व एकदम दूषित हैं, एकदम पतित हैं।



