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घर जल रहा हो, तो एकांत ध्यान करना पाप है
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, मेरा मन हमेशा के लिए किसी एकांत जगह पर जाकर ध्यान साधना और भक्ति में डूबने को करता है लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाता। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांतः देखो बेटा, अभी थोड़ी देर पहले ही मैं कह रहा था कि जब घर में आग लगी हो, तब एकांत में बैठकर ध्यान करना मूर्खता ही नहीं पाप है। और अभी घर में आग लगी हुई है। आज के युग में एक ही तरह का ध्यान संभव है और सम्यक् है और वो ध्यान है अनवरत, अथक, अगाध कर्म। जब समय तुमसे अथक कर्म की उम्मीद कर रहा हो, उस वक्त तुम कहो कि, "मैं एकांत में बैठकर के मौन ध्यान लगा रहा हूँ", तो मेरी नजर में ये गुनाह है। शांति यदि ध्येय है तो कर्म ध्यान है।

और जब अशांति दुनिया पर छा चुकी हो तब शांति को ध्येय बनाते हुए तुम्हें कर्म करना ही पड़ेगा। जीवन तुमसे माँग कर रहा है कि तुम रणक्षेत्र में कूद जाओ, जूझ जाओ, अर्जुन हो जाओ।

और अर्जुन कृष्ण से कहे कि, “नहीं योगीराज, लड़ने की जगह मैं योगासन करूँगा” तो ये मूर्खता है। इस समर में शांति सिर्फ युद्ध के बीचों-बीच ही संभव है। कमरा बंद करके और आँखें बंद करके नहीं। आँखें तुमने बहुत बंद कर ली अब खोल लो।

समझ में आ रही है बात?

पचास बंधनों में तो उलझे हुए हो। बेड़ियाँ पहन कर के बैठे हो। ये कौन-सा ध्यान है जो बेड़ियाँ भुलाने के लिए किया जा रहा है? बेड़ियाँ भुलाने से बेड़ियाँ कट नहीं जाएँगी। तुम्हें मौन नहीं चीत्कार चाहिए, श्रम चाहिए, पराक्रम चाहिए।

अभी अगर अचलता चाहिए तो तुम्हें चलायमान होना पड़ेगा। घर में घुसकर, चटाई बिछाकर ध्यान लगाने का वक्त नहीं है ये। बाहर निकलो और जूझ पड़ो। स्वधर्म को समझो, युग धर्म को समझो। धर्म समय निरपेक्ष थोड़े ही होता है।

आज के समय को देखो, फिर समझ में आएगा कि तुम्हारा धर्म क्या है। मैं तुम्हें बुलाऊँ, “आओ, बचाओ!” और तुम कहो, "नहीं, अभी तो हम मौन ध्यान में बैठे हैं और फलानी क्रिया कर रहे हैं।" तो झूठे हो तुम, कायर हो, और गुनहगार हो।

और इस वक्त धरती के करोड़ों प्राणी और पशु और नदियाँ और पहाड़ सब चीत्कार कर रहे हैं। सब तुम्हें बुला रहे हैं कि आओ हमें बचाओ। और तुम कहते हो, “नहीं, हमें तो जो खाली समय मिलता है, उसमें हम एकांत ध्यान करते हैं।“ तो ये ध्यान व्यर्थ ही नहीं अपराध है। ध्यान क्या है? अर्जुन के गांडीव से छूटता एक-एक बाण ध्यान है। पर ऐसा ध्यान तुम्हारे ज़हन में आता ही नहीं क्योंकि तुम्हारे मन में ध्यान की एक छवि बैठ गई है।

और वही ध्यान की छवि बाज़ारों में बिक रही है, बेचने वाले बेच रहे हैं और तुम खरीदे जा रहे हो। अर्जुन के गांडीव की टंकार योग है और ये योग तुम्हें समझ में आता ही नहीं क्योंकि तुम्हारे मन में तो योग की एक बाज़ारू छवि बैठ गई है।

कृष्ण योगीराज हैं? जो योगीराज हैं, वो योग ही सिखाएँगे न? तो अगर वो अर्जुन से कह रहे हैं कि अर्जुन गांडीव उठा और लड़, तो माने गांडीव का उठाना और लड़ जाना ही तो योग है न?

पर तुम बताते हो कि, “नहीं, मैं जवान आदमी हूँ जो दस दिनों के लिए मौन में चला जाता है। दुनिया-जहान को छोड़कर साँस को आता-जाता देखता है। ये मेरा ध्यान है” तो दो कौंड़ी का है ये ध्यान।

प्रः आचार्य जी, लेकिन ध्यान करने से तो अंदरूनी बल मिलेगा न?

आचार्य: लड़ाई कहाँ है?

इंटर्नल स्ट्रैन्थ (अंदरूनी बल) तो बहुत जमा कर रहे हो, लड़ाई कहाँ है?

कुरुक्षेत्र में अर्जुन मयूरासन में प्राणायाम कर रहा है।

(सब हँसने लगते हैं)

लड़ाई कहाँ है?

लड़ाई भी तो बता दो।

थोड़ा-सा प्रमाण तो दे दो कि योद्धा हो, लड़ाई दिखाओ, लड़ाई कहाँ है?

लड़ाई से तो कतराए घूम रहे हो और बता रहे हो कि एकांत ध्यान से लड़ाई की ताकत मिलती है कि जैसे कोई दिन-रात खाए कि कुश्ती लड़ेंगे और इतना (दोंनो हाथ फैला कर दिखाते हुए) मोटा गया है खा- खाकर, अब मैं पूछ रहा हूँ, कुश्ती कहाँ हैं? खा तो इतना लिया, “नहीं कुश्ती कहीं नहीं है!"

कुश्ती के नाम पर मोटाए भर जा रहे हो।

प्रः आचार्य जी, अर्जुन बनने के लिए हमें क्या करना होगा?

आचार्यः कृष्ण की संगत कर लो, अर्जुन हो जाओगे। अर्जुन की परिभाषा ही यही है; जो कृष्ण की संगत कर ले, सो अर्जुन!

प्रः आचार्य जी, आज के समय में, यह कैसे पता चलेगा कि हमारा धर्म क्या है?

आचार्यः अपने आप को कृष्ण के सुपुर्द कर दो, वो तुमको परम धर्म भी बता देंगे और काल धर्म भी बता देंगे। गीता में कृष्ण ने अर्जुन को दोनों बातें बताई हैं न? ये भी बताया है कि प्रकृति क्या है और आत्मा क्या है और सांख्य योग क्या है।

इन बातों का समय से कोई लेना-देना नहीं है। ये बातें समय निरपेक्ष हैं। और गीता में ही अर्जुन को श्री कृष्ण ये भी बताते हैं कि, “बेटा, तुझे ठीक अभी क्या करना है? इस समय क्या करना है?” कहते हैं, “लड़ जा!"

गुरु तुमको दोनों बातें बता देता है - शाश्वत सत्य भी और समय का तक़ाजा भी। वो ये भी बता देता है कि अनंत सत्य क्या है जो आज भी ठीक था, कल भी ठीक रहेगा, समय खत्म हो जाने के बाद भी सत्य रहेगा। और गुरु तुमको यह भी बता देता है कि समय के इस पड़ाव पर, आज के, अभी के समय में तुम्हें क्या करना चाहिए?

गीता में कृष्ण अर्जुन को दोनों बातें बता रहे हैं। अलग-अलग बता रहे हैं और साफ-साफ बता रहे हैं। तो दोनों बातें पता चल जाएँगी। जैसा अर्जुन का रिश्ता था कृष्ण से, पहले वैसा बनाओ।

प्रः आचार्य जी, क्या कोई बीच की अवस्था नहीं होती?

आचार्यः बीच की अवस्था को दुर्योधन कहते हैं।

(सब हँसने लगते हैं।)

कि कृष्ण के निकट तो है, पर बहुत निकट भी नहीं। दुर्योधन भी कृष्ण के सामने ही तो था मैदान में, निकट तो है, पर बहुत निकट भी नहीं।

प्रः आचार्य जी, ज्ञान और ध्यान मार्ग में आप कौन–सा मार्ग सुझाते हो?

आचार्यः इरादा वही है! बता दो किस रास्ते आ रहे हो, हम वो रास्ता ही बंद कर दें (हँसते हुए)।

बेटा, जितने रास्ते हो सकते हैं तुम तक पहुँचने के, मैं सब पर ही चल लेता हूँ। खिड़कियाँ याद हैं न? आचार्य जी कौन-सी खिड़की खुलवाते हैं? जो तुम खोल सको। आचार्य जी की पसंदीदा खिड़की कौन–सी है?

प्रः जो मेरे करीब हो।

आचार्यः उनकी (आचार्य जी की) पसंदीदा कोई भी नहीं है। जो खिड़की तुम्हारे काम आ जाए, उसको वो खुलवा देते हैं। तुम्हारे व्यक्तित्व के काम अगर प्रेम की खिड़की आ जाए, तो उसको खुलवा देंगे। तुम्हारा व्यक्तित्व ऐसा है कि उसके काम ज्ञान वाली खिड़की आएगी, तो उसको खुलवा देंगे।

प्रः आचार्य जी, ये कैसे पता करूँ कि मेरे लिए कौन-सी खिड़की उचित है?

आचार्यः तुम्हारे लिए कौन-सी खिड़की उचित है, ये जानना है तो देख लो कि तुम्हारा कौन-सा दुख सबसे बड़ा है?

अगर तुम्हारा दुःख ये है कि तुम दुनिया से कटे-कटे जी रहे हो तो तुम्हारी खिड़की का नाम है - संसार की निःस्वार्थ सेवा।

तुम किससे कटे–कटे जी रहे थे? “संसार से।”

तो तुम्हारे काम कौन-सी खिड़की आएगी? वो जो संसार की निःस्वार्थ सेवा की तरफ खुलती हो।

वो खिड़की मैं तुम्हें सुझा चुका हूँ। क्या करेगा तुम्हारे लिए उचित खिड़की का निर्धारण? तुम्हारा दुःख। देख लो कि तुम्हारा दुःख क्या है। उसी से जान जाओगे कि खिड़की कौन-सी चलेगी।

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