प्रश्नकर्ता: योग का अर्थ क्या है?
आचार्य प्रशांत: योग का अर्थ इतना ही है कि जो दो हिस्से मैंने कर रखे होते हैं–अच्छा और बुरा, ये दोनों एक हो गए, इनका योग हो गया क्योंकि योग होने के लिए और कोई दो होते नहीं हैं। योग तो तभी होगा न जब दो हिस्से होंगे। ये दोनों मिलकर एक हो गए, मिलकर एक कैसे हो गए?
कि इन दोनों का जो एक मूलतत्व है, वो उजागर हो गया। मूलतत्व दोनों का एक है ये बात समझ में आ गई, यही योग है।
योग के लिए कुछ पाना नहीं है, जिस ‘एक’ पर आप बैठे थे उसके साथ-साथ ‘दूसरे’ को भी देख लेना है। योग का अर्थ समझिए, योग का अर्थ है–आप पुण्य पर बैठे हो, तो आप योगी नहीं हो सकते, क्यों? क्योंकि पाप वहाँ दूर बैठा है और वो आपकी दुनिया से निष्कासित है।
आप योगी नहीं हो सकते, योगी होने का अर्थ है–मैं पुण्य पर बैठा हूँ और एक काबिलियत है मुझमें कि मैं पाप पर भी चला जाऊँ, बिलकुल करीब चला जाऊँ उसके, बिलकुल, बिलकुल करीब। इतना करीब कि पापी कहला ही जाऊँ और वहाँ जा करके साफ़-साफ़ मैं ये देख लूँ कि पाप का तत्व भी वही है जो पुण्य का तत्व है–ये योग है। रंग अलग-अलग हैं दोनों के, पर तत्व एक है। यही योग है, अब दोनों एक हैं, समझ में आ रही है बात?
तो हम में से जो लोग किसी भी द्वैत के एक सिरे पर बैठे हों उनको दूसरे सिरे के करीब जाना पड़ेगा अगर उन्हें योग में प्रतिष्ठापित होना है। जिन चीज़ों को आज तक आपने महत्वपूर्ण बोला है, ये द्वैत का एक सिरा है, कि ये महत्वपूर्ण है। और द्वैत का दूसरा सिरा क्या होता है?




