
'धरनी' पलक परै नहीं, पिय की झलक सुहाय। पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय।।
~ संत धरनीदास
आचार्य प्रशांत: “पुनि-पुनि पीवत परमरस, तबहूँ प्यास न जाय” धरनीदास के वचन हैं, सवाल है कि 'प्यास बुझेगी क्यों नहीं, प्यास बुझती क्यों नहीं?' प्रेम अनंत है। अनंत का क्या अर्थ है?…

किसी के मुँह से सुनते ही कि उसे सच मिल गया है, हम उसके पीछे चल पड़ते हैं, जेब भी ढीली कर आते हैं। फिर हम जैसे दो-चार लोग मिलकर एक-दूसरे को दिलासा देते हैं कि हमें भी मिल गया। पर जो सबसे ऊँचा है, वह जेब में डालने की चीज़ नहीं। जो उसे छूने निकला है, वह अभी पूरा बचा हुआ है, और छूते ही उसे अपनी कहानी का पात्र, अपना औज़ार बना लेता है। जिसका सच से सचमुच नाता है, उसकी ज़बान तो नाम लेने में भी काँपती है। तो हम सच खोज रहे हैं, या अपने झूठ को देखने से बच रहे हैं?

जिस 'आदमी' की बात यहाँ गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कर रहे हैं, उनके लिए एक बार गांधी जी ने कहा था,
"विद्यासागर की उपाधि उन्हें उनके ज्ञान के लिए…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, साक्षीभाव से साधना के विषय में कहा जाता है कि किसी एक विशेष चीज़ पर आपका ध्यान लगा होना चाहिए, जैसे विपश्यना ध्यान जिसमें अपनी आती-जाती साँसों के प्रति होश पूर्ण रहा जाता है, लेकिन आप हमें जिस चीज़ के प्रति सचेत रहने को कहते हैं वो…

गुरु लोग और बड़े-बड़े पदाधिकारी भारत में और दुनिया भर से योग दिवस को अपना समर्थन दर्शाते हैं। लोग शारीरिक मुद्राओं में अपनी तस्वीरें डालते हैं — एक योगा मैट होता है, उसपर योगा करते हुए कहते हैं, "Celebrating Yoga Day!" लेकिन योग का संबंध व्यायाम और कसरत से नहीं, बल्कि मन से है। योग मन की बात है — क्योंकि मन परेशान है। और योग वास्तव में क्या है — यह जानना है, तो भगवद्गीता की ओर जाना ही पड़ेगा।

आचार्य प्रशांत: कर्मसंन्यास और कर्मयोग क्या हैं? दोनों में अन्तर क्या है? आमतौर पर हम जिसे कर्म कहते हैं; वो कैसे होता है? वो ऐसे होता है कि जैविक रूप से और सामाजिक रूप से मन संस्कारित रहता है। फ़िज़िकल, सोशल दोनों तरह के संस्कार। तो मन में पहले…