प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम! मैं पच्चीस वर्ष का हूँ। मार्केटिंग का कार्य करता हूँ जिसमें लोगों के मन में लालच पैदा करना मेरे लिए अनिवार्य है। यह काम करते-करते आदत ऐसी पड़ गयी है कि अब मेरा स्किल स्किल सेट (कौशल) ही यही हो गया है कि कैसे दूसरे लोगों में लालच पैदा कर सकता हूँ। तो मेरे जीवन का एक भाग यह है, दूसरा भाग वह है जो अभी यहाँ पर बैठा हुआ है। इन दोनों में सामंजस्य कैसे पैदा करूँ?
आचार्य प्रशांत: क्या बताऊँ मैं इसमें? माने (आपको) काम वही करना है जो कर रहे हैं?
प्र: जी, क्या इस प्रकार का कार्य ग़लत है?
आचार्य: अब तुम जानो न कि अगर अपनेआप से थोड़ा-सा दूर होकर के अपनेआप को देखते हो तो क्या दिखाई पड़ता है? ठीक है? मान लो जिसे देख रहे हो (वो) तुम नहीं हो, कोई और व्यक्ति है वो, ठीक है, उसकी शक़्ल भी कुछ और है। वो जिसको देख रहे हो वो तुम हो ही नहीं। और अब देखो कि वो जो व्यक्ति है कर क्या रहा है? उसकी पूरी दिनचर्या देखोगे (कि) वो क्या कर रहा है– वो किसी में डर पैदा कर रहा है, किसी को ललचा रहा है, ये सब कर के माल बेच दिया, जब माल बेचा भी तो मन में ख़याल यही आया कि सही बुद्धु बनाया।
फिर वो पैसा जेब में आया, पैसा जेब में आया भी तो भीतर से ज़रा सा तो अपराध भाव उठा ही, कि ये पैसा है तो गड़बड़ ही। फिर गये वो पैसा जिस भी चीज़ में खर्च-वर्च करना था कर आये। फिर अगले दिन गये फिर यही सब करा।
जिसको लालच दिखाकर चीज़ बेच रहे हो वो चीज़ उसके भी काम की होगी तो नहीं, नहीं तो इतना ललचाना क्यों पड़ता उसको? तो जिसको चीज़ बेच दी वो चीज़ लेकर घर पहुँचा, वो कुछ देर तक उसको देख रहा है, फिर चीज़ की हकीकत सामने आयी तो फिर वो भी तुम्हें बद्दुआ दे रहा है!




