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मानवता बड़ी कि धर्म? || आचार्य प्रशांत (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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आचार्य प्रशांत: सर नमस्ते, लोग बोलते हैं कि बड़े-से-बड़ा जीवन मूल्य, लाइफ वैल्यू इंसानियत है, ह्यूमनिटी या ह्यूमनिज्म। वो कहते हैं कि किसी भी धर्म से ऊँची है इंसानियत और कहते हैं कि हमें एक अच्छा इंसान बनने के लिए किसी धर्म की ज़रूरत नहीं है इंसानियत ही काफ़ी है।’

यहाँ तक कि आज एक प्रमुख समाचार-पत्र की वेबसाइट के होम पेज पर ही एक कहानी है, जिसका शीर्षक ही यही है कि ह्यूमनिटी इज़ बिगर देन ऐनी रिलिज़न , इंसानियत किसी भी धर्म से बड़ी है। सर, इस पर कुछ बोलिए।

क्या बोलूँ, निहायत ही नादानी की बात है। ये लोग जो कहते हैं कि इंसानियत या मानवता या ह्यूमनिटी किसी भी धर्म से बढ़कर है। ये वास्तव में न तो धर्म को समझते हैं और न ही मानवता को।

चलो मानवता से शुरु करते हैं। मानवता माने क्या? बहुत लोगों को तो यह सवाल ही अच्छा नहीं लगेगा। वो कहेंगे कि भई, मानवता मानवता होती है। हम मानव हैं और हमारे भीतर दूसरों के लिए कुछ अच्छे विचार, कुछ भली भावनाएँ होती हैं, इसी को मानवता कहते हैं। इसको वो यूनीवर्सल ह्युमन वैल्यूज़ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। वैश्विक मानव मूल्य।

लेकिन ये क्या हैं, कहाँ से आते हैं, कुछ हैं भी या नहीं। इस बात पर गहरा विचार वो शायद कम ही करते हैं।

चलिए थोड़ा इस पर विचारकर देखते हैं। मानव क्या है, उसके पास मूल्य कहाँ से आएँगे, उसे कैसे पता कि किस चीज़ को कितनी क़ीमत देनी है। मानव को अगर शिक्षित-दीक्षित न करो तो वो वास्तव में एक बुद्धि सम्पन्न जानवर ही है।

ये बात में बहुत बार पहले बोल चुका हूँ। फिर बोलता हूँ, ‘आदमी को अगर तुम नैतिक आध्यात्मिक शिक्षा न दो तो मानव की मानवता जैसी कोई चीज़ होती नहीं है। एक बुद्धि सम्पन्न पशुता ज़रूर हो सकती है, मानवता नहीं।‘

पशुओं के पास, क्या हम कहते हैं मानवता है, हम कहते हैं पशुओं के पास पशुता है और मनुष्य भी बस एक बुद्धि रखने वाला पशु ही है।

मस्तिष्क हमारा अलग है पशुओं से बस। इस मस्तिष्क में बुद्धि की सम्भावना ज़्यादा है और वो भी इसलिए क्योंकि हमारे मस्तिष्क की संरचना पशुओं से अलग है।

हमारी बुद्धि भी क्यों ज़्यादा है, ये बात भी बड़े वैज्ञानिक तरीके से समझी जा सकती है। मस्तिष्क के किन केंद्रों का उत्पाद होती है बुद्धि या इंटेलेक्ट हम भली-भाँति जानते हैं।

आदमी के मस्तिष्क के उन्हीं केंद्रों पर थोड़ा झटका लग जाए या चोट लग जाए तो उसका पूरा शरीर चलता रहेगा पशु की तरह, उसकी बुद्धि थोड़ा कम हो जाएगी या मिट जाएगी।

तो मानव के पास वास्तव में मानवता अपनेआप आ ही नहीं सकती। उसके पास एक पाश्विक बुद्धिमत्ता ज़रूर आ सकती है। पशु के पास क्या होती है, पशुता। और मानव के पास क्या रहेगी, बुद्धि सम्पन्न पशुता।

अब पशुता अपनेआप में कोई बहुत ऊँची चीज़ तो है नहीं। बिलकुल प्राकृतिक है।

पशुता का मतलब है खाओ-पियो, मौज करो, जियो; शिकार करो, संतान करो और एक दिन यही खेलते-कूदते जंगल में खाने-पीने का इंतज़ाम करते, मर जाओ। ये पशुता है।

आदमी के पास भी यही पशुता है पर साथ में उसके पास बुद्धि है, तो वो काम सारे पशुओं वाले ही करेगा पर ज़्यादा होशियारी से करेगा। करेगा वही सब कुछ जो पशु करते है।

खाने-पीने का प्रबन्ध करेगा, दूसरों पर किसी तरीक़े से आधिपत्य ज़माने का, धौंस ज़माने का प्रबन्ध करेगा। इन सब चीज़ों के लिए वो बुद्धि का सहारा लेगा। पशु भी अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहता है।

देखा है न, पशु भी अपना इलाक़ा जो है, बहुत सम्भालकर रखते हैं। उसकी बड़ी रक्षा करते हैं। इंसान भी वैसे ही अपना इलाक़ा बढ़ाना चाहता है, भौतिक रूप से भी, मानसिक रूप से भी, बस पशु के पास बहुत ज़्यादा ताक़त नहीं है अपने इलाक़े का विस्तार करने के लिए और उसकी रक्षा करने के लिए।

आदमी भी काम वही करेगा पशु वाले, पर अब उसके पास बुद्धि है। जिस बुद्धि से वो विज्ञान और तकनीक लेकर आएगा और अपने इलाक़े की पहरेदारी करने के लिए वो तरह-तरह के बुद्धिमान उपाय करेगा। बुद्धिमान उपाय करेगा, पर पशुओं की ही दिशा में करेगा।

अब बताओ मानवता कहाँ है, जिसको तुम मानवता बोल रहे हो वो चीज़ क्या है? मानवता यूँही नहीं आ जाती। इंसान बनने के लिए एक विशिष्ट किस्म की शिक्षा की ज़रूरत होती है। वो शिक्षा अगर तुम नहीं दोगे मानव को, तो वो पशु ही रहेगा।

मानवतावादियों का ख़याल है कि वो शिक्षा नहीं भी दो तो हमें यूँही पता चल जाएगा कि क्या अच्छा है, क्या बुरा है। उन्हें लगता है कि इंसान के मन में यूँही अच्छे-अच्छे मूल्य प्राकृतिक रूप से आ जाएँगे। नहीं आने वाले भाई।

दया, कारण, सद्भावना, सत्य, प्रेम, निष्ठा; अहिंसा, अस्तेय, अचौर्य, अपरिग्रह; ये प्राकृतिक मूल्य नहीं होते हैं। और अगर ये प्राकृतिक मूल्य होते हों, तो मुझे दिखा दो कि जंगल में ये मूल्य पाए जाते हैं।

मुझे दिखा दो जंगल में कहाँ है करुणा, मुझे दिखा दो जंगल में कहाँ है तपशर्या या साधना, मुझे दिखा दो कि जंगल में कहाँ है दया, आर्जव, सरलता? जंगल में ये सब नहीं पाए जाते न।

तो इसी तरीक़े से ये जो मूल्य हैं जिनको मानवतावादी समझते हैं कि ये तो हर बच्चे में ख़ुद-ब-ख़ुद आ जाएँगे। वो आएँगे ही नहीं ख़ुद-ब-ख़ुद। वो जो विशिष्ट शिक्षा है अगर तुमने उस बच्चे को नहीं दी तो वो एक बुद्धिमान जानवर बनकर रह जाएगा।

उसी विशिष्ट शिक्षा का ही तो नाम धर्म है। उसी ख़ास शिक्षा को धर्म कहते हैं, जो मानव में उच्चतर मूल्यों की स्थापना करती है। तो वास्तव में मानव को मानव बनाता ही धर्म है। मानव में मानवता लाता ही धर्म है। जब धर्म के बिना मानवता आ ही नहीं सकती तो मानवता धर्म से बड़ी कैसे हो गयी?

धर्म तो मानवता की माँ है, धर्म तो मानवता का मूल्य है। बिना धर्म के मानवता नहीं होगी, बिना धर्म के सिर्फ़ पशुता होगी।

आज भी अगर तुम देख रहे हो दुनिया में किसी किस्म की व्यवस्था है तो उसका कारण सिर्फ़ यह है कि दुनिया में ऐसे लोग हो गये, जिन्होंने हमारे भीतर धर्म गहराई से बैठा दिया है। इसी के कारण हम न्याय को बड़ा मूल्य देते हैं।

जंगल में न्याय होता है? जंगल में न्याय जैसी कोई चीज़ है? वहाँ तो जिसकी लाठी उसकी भैंस। इसी को तुम कहते हो न जंगलराज।

आदमी में न्याय का मूल्य किसने स्थापित किया, क्या जंगल ने, क्या शरीर ने हमारे, नहीं। कुछ लोग हैं जिन्होंने सिखाया कि न्याय बड़ी बात है।

ये जो शिक्षा है जो कहती है कि न्याय बड़ी बात है, इसी को धर्म कहते हैं। ये जो शिक्षा है, जो बताती है कि तुम्हारे शरीर के सुख और सुरक्षा से आगे भी कुछ ज़्यादा महत्वपूर्ण है, इसी को धर्म कहते हैं।

न होता धर्म तो हमारे शहरों में, गाँवों में, हमारी सड़कों पर किसी तरह की कोई व्यवस्था हो नहीं सकती थी। कोई अपने वचन का पालन न कर रहा होता। कोई किसी तरह का नियम, कानून, बंदिश, पाबंदी न मान रहा होता।

तुम मुझे बताओ किसी बच्चे में ये मूल्य कहाँ से आएगा कि ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि बच्चे तो पैदा ही ईर्ष्यालु होते हैं। पशुओं में भी ईर्ष्या होती है। बच्चों में भी ईर्ष्या होती है।

लेकिन बड़े होते-होते सब बच्चों में कम-से-कम ऊपरी तौर पर ये बात आ जाती है कि ईर्ष्या करना बुरी चीज़ है। यहाँ तक कि जब वो ईर्ष्या कर भी रहे होते हैं और कोई कहे कि तुम ईर्ष्यालु हो रहे हो तो उनको शर्म आती है वो कहेंगे नहीं-नहीं हमें ईर्ष्या नहीं हो रही है।

ये सिखाया किसने इंसान को कि ईर्ष्या बुरी बात है, मानवता ने सिखाया। ये मानवता क्या चीज़ है। कहते हैं मानवता इंसान के दिल से निकलती है। ये दिल भी नहीं जानते।

दिल तो पहली बात कुछ होता नहीं। मन भर होता है और इंसान के मन से वही सब कुछ निकलेगा जो किसी पशु के मन से निकलता है, बस ज़्यादा बुद्धि सम्पन्न तरीक़े से। क्योंकि मन तो मस्तिष्क पर आश्रित होता है और मस्तिष्क प्राकृतिक है। जो भी कुछ प्राकृतिक है, उसका उद्देश्य बस अपनी सुरक्षा, अपना संवर्धन, अपना विस्तार है। और अगर अपनी सुरक्षा करने में, अपना विस्तार करने में ईर्ष्या काम आती है, तो प्रकृति में ईर्ष्या की बड़ी ख़ास ज़गह बनी रहेगी।

ईर्ष्या प्रकृति में यूँही नहीं पायी जाती, ईर्ष्या काम आती है, तो मनुष्य में ईर्ष्या बनी रहेगी।

जब तक कोई आता नहीं है, ये शिक्षा देने के लिए कि देखो ईर्ष्या अधिक-से-अधिक तुम्हें यही फ़ायदा देती है न कि तुम्हारी उम्र बचा देती है। तुम्हारे कुछ हितों की रक्षा कर देती है, तुम्हें थोड़ा सुरक्षित रख लेती है।

लेकिन देह की सुरक्षा से ज़्यादा, धन की सुरक्षा से ज़्यादा, अपने प्रभाव, अपने कुटुम्ब की सुरक्षा से ज़्यादा क़ीमती कुछ और भी होता है जीवन में। इस शिक्षा के बाद फिर ईर्ष्या में कमी आती है।

इसी शिक्षा का मैं कह रहा हूँ नाम धर्म है। धर्म न हो तो पूरी दुनिया में ईर्ष्या को स्वीकृति मिल जाएगी। धर्म न हो तो एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी से हार क्यों मानेगा, हार गया तो उसका गला क्यों नहीं दबा देगा।

धर्म न हो तो आपके न्यायालय कैसे चलेंगे, अपराधी न्यायाधीश की बात माने ही क्यों। बहस से क्यों मामले सुलटाए जाएँ कि दो वक़ील बहस कर रहे हैं और उस बहस के परिणाम से ही यह सिद्ध होगा कि किसी को माफ़ी मिलेगी या फ़ाँसी।

जंगल में तो ऐसे नहीं निपटाए जाते मामले। जंगल में कैसे निपटाए जाते हैं मामले, या तो तू बचेगा या मैं बचूँगा।

ये आपको किसने सिखाया कि अगर आपसी मन-मुटाव हो, बैर भी हो, तो भी उसको निपटाने के लिए बात करो। सच्चाई सामने लाओ। उस बातचीत का यही औचित्य होता है न, जो कोर्ट में होती है, क्या। कि सच्चाई सामने लायी जाए।

सच्चाई सामने लायी जाती है फिर फै़सला हो जाता है, एक नियम के आधार पर। सच्चाई के प्रति इतना प्रेम क्या जंगल में पाया जाता है? सच्चाई प्रेम की चीज़ है, ये बात जो तुम्हें सिखाए, वही धर्म है।

धर्म न हो तो तुम्हारे न्यायालय नहीं काम कर सकते, तुम्हारी सड़कों पर रोज़ ख़ून-खच्चर होगा। धर्म न हो तो तुम्हें कौन रोकता है किसी और घर में घुसकर उसकी संपत्ति उठा ले जाने से, उसकी पत्नी उठा ले जाने से, उसकी बेटी उठा ले जाने से, उसके घर में जो कुछ हो उस पर कब्ज़ा कर लेने से।

बोलो? तुम्हें कौन रोकता है, इंसानियत कहाँ से आ जाएगी। अब आप तर्क देंगे लेकिन लाखों लोग हैं जो किसी धर्म को नहीं मानते फिर भी वो बड़े अच्छे लोग हैं। तो उनमें अच्छाई कहाँ से आ गयी?

उनमें अच्छाई उनके पुरखों से आ गयी, उनमें अच्छाई हवाओं से आ गयी। अभी धर्म का इतना नाश नहीं हुआ है दुनिया में कि जो पूरा माहौल है वही धर्म से रिक्त हो गया हो।

और लोगों को पता हो चाहे न पता हो, लोग धार्मिक आज भी हैं। यहाँ तक कि जो अपनेआप को पक्का नास्तिक या अनिश्वरवादी या एथिस्ट बोलते हैं उनमें भी धर्म बैठा हुआ है।

भले ही वो मौखिक तौर पर धर्म की उपेक्षा कर देते हों, अवमानना कर देते हों, लेकिन धर्म के जो प्रभाव हैं वो पूरे तरीक़े से उनके चरित्र पर विद्यमान हैं।

भई, वो धर्म को नहीं मानते पर कुछ नैतिक उसूलों को तो मानते हैं न। ये जो मोरल प्रिंसिपल (नैतिक सिद्धान्त) हैं जिनमें वो विश्वास रखते हैं वो कहाँ से आये। नैतिकता धर्म के पेड़ का फल होती है। धर्म अगर पेड़ है तो उसका फल क्या है, नैतिकता।

अब जो लोग कहते हैं कि वो मोरेलिटी माने नैतिकता में विश्वास रखते हैं पर धर्म में विश्वास नहीं रखते, ये लोग बड़े ही चमत्कारिक और अद्भुत लोग हैं। ये वैसे लोग हैं जो कह रहे हैं कि साहब सेब तो होता है, पर सेब का पेड़ नहीं होता है।

ये वो लोग हैं जो सेब बढ़िया चबाते हुए कह रहे हैं कि सेब तो होता है, लेकिन सेब के पेड़ जैसी कोई चीज़ होती ही नहीं। साहब धर्म नहीं है अगर, तो नैतिकता यानी मोरेलिटी कहाँ से आयी आपमें, क्योंकि बिना धर्म के कोई नैतिकता हो नहीं सकती।

आप जिसको बोलते हो सेक्युलर मोरेलिटी (धर्म निरपेक्ष नैतिकता) वो अपनेआप में एक बड़ी विरोधाभाष, अंतर्विरोध से भरी हुई चीज़ है। एक पैराडॉक्स (विरोधाभाष) है वो।

बात समझ में आ रही है?

तो धर्म बहुत ज़रूरी है। धर्म के बिना मानव मूल्य कहाँ से आएँगे, जब मानव ही नहीं रहेगा। धर्म के बिना आदमी जानवर है।

लेकिन ये बड़े फैशन की बात हो गयी है। लोग कहते हैं कि ह्यूमनिटी इज़ माई रिलिज़न (मानवता ही मेरा धर्म है)। इनसे ज़्यादा अनाड़ी कोई होगा नहीं जो इस तरह की बातें कर रहे हैं। और अक़्सर ये बात आपके अनाड़ीपन का या अज्ञान का ही द्योतक नहीं होती।

ये बात आपके गहरे अहंकार का प्रतिबिंब होती है, क्योंकि जब आप जाते हैं बोध ग्रंथों की तरफ़, आध्यात्मिक किताबों की तरफ़ तो वहाँ जो बातें बतायी जाती हैं, वो बड़ी कठोर होती हैं। वो आपको आईना दिखा देती हैं, वो आपको बता देती हैं कि आप ग़लत ज़िन्दगी जी रहे हैं, जिसमें आप अपने लिए ही कष्ट पैदा कर रहे हैं और दूसरों के लिए भी।

तो ज़्यादातर लोग जो अपनेआपको नास्तिक बोलते हैं, वो वास्तव में अपने झूठ को और अपने अहंकार को छिपाने के लिए आध्यात्मिक ग्रंथों की ओर नहीं जाते, उससे कहीं ज़्यादा उनको आसान लगता है कि दो-चार ऊपर-ऊपर के मूल्य पकड़ लो और कह दो कि नहीं मैं धर्म को मानता नहीं, लेकिन फिर भी मैं मानवतावादी या नैतिकतावादी हूँ।

न आप मानवीय हो सकते हैं, न आप नैतिक हो सकते हैं बिना आध्यात्म के और जब मैं धर्म कह रहा हूँ — यहाँ स्पष्ट करूँगा — मेरा आशय धर्म के बाहरी अंगों से नहीं है, मैं रीति-रिवाज़, पूजा-पाठ, सामुदायिकता और सांप्रदायिक मूल्यों की बात नहीं कर रहा हूँ। जब मैं कह रहा हूँ धर्म, तो मेरा आशय ठोस केंद्रीय अध्यात्म से है।

जब मैं कह रहा हूँ धर्म, तो मेरा आशय किसी पंथ, गुट, दल या मज़हब से नहीं है। मेरा आशय है आत्म-जिज्ञासा से।

धर्म का जो वास्तविक अर्थ है, मैं उस वास्तविक अर्थ की बात कर रहा हूँ — धर्म का वास्तविक अर्थ है ‘सच जानने की कोशिश करना’ क्योंकि झूठ मैं कोई चैन तो पाता नहीं।

धर्म का वास्तविक अर्थ है अपनी पीड़ा को स्वीकारना, अपने बन्धनों को देखना, मुक्ति की कोशिश करना, जीवनभर ईमानदारी से मुक्ति का प्रयत्न करते चलना। ये धर्म होता है।

मैं उस धर्म की बात नहीं कर रहा जिसमें तमाम तरह की वर्जनाएँ होती हैं और ये होता है और वो होता है। पूरी जो एक उसमें आचरण की किताब होती है। मैं उसकी बात नहीं कर रहा हूँ।

तो मैं जिस धर्म की बात कर रहा हूँ वास्तव में दुनिया के सारे आयोजित धर्मों का केन्द्र है। मैं निपट ठोस, केन्द्रिय , हार्दिक धर्म की बात कर रहा हूँ।

ये बात बिलकुल अपने मन से निकाल दो कि धर्म के बिना भी तुम एक अच्छे आदमी हो सकते हो। ये जो तथाकथित अच्छे आदमी दिखायी दे जाते हैं न, जो कहते हैं, ‘देखो, हम कितने अच्छे आदमी हैं, लेकिन हम किसी धर्म को मानते नहीं।‘ ये बस धर्म के पुराने मोमेंटम का, गतिवेग का, फ़ायदा उठा रहे हैं।

दो-चार पीढियाँ अगर बीत गयीं, धर्म से सम्पर्क के बिना, तो फिर देखना कितने अच्छे आदमी बचेंगे?

समझ में आ रही है बात?

दो-चार पीढियाँ अगर बीत जाएँ बिना किसी धार्मिक शिक्षा के, फिर देखना कितने अच्छे आदमी बचते हैं?

बचो इस मज़हब से जिसका नाम इंसानियत है। ये बहुत झूठा, खातरनाक और खोखला मज़हब है।

खेद की बात है कि ज़्यादातर अज्ञानियों को और अहंकारियों को यही मज़हब बहुत प्यारा हो गया है। मैं इंसानियत की खिलाफ़त नहीं कर रहा हूँ। मैं बस ये बता रहा हूँ कि इंसानियत हो ही नहीं सकती धर्म के बिना, ठीक वैसे जैसे सेब हो ही नहीं सकता सेब के पेड़ के बिना हूँ।

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