आचार्य प्रशांत: सर नमस्ते, लोग बोलते हैं कि बड़े-से-बड़ा जीवन मूल्य, लाइफ वैल्यू इंसानियत है, ह्यूमनिटी या ह्यूमनिज्म। वो कहते हैं कि किसी भी धर्म से ऊँची है इंसानियत और कहते हैं कि हमें एक अच्छा इंसान बनने के लिए किसी धर्म की ज़रूरत नहीं है इंसानियत ही काफ़ी है।’
यहाँ तक कि आज एक प्रमुख समाचार-पत्र की वेबसाइट के होम पेज पर ही एक कहानी है, जिसका शीर्षक ही यही है कि ह्यूमनिटी इज़ बिगर देन ऐनी रिलिज़न, इंसानियत किसी भी धर्म से बड़ी है। सर, इस पर कुछ बोलिए।
क्या बोलूँ, निहायत ही नादानी की बात है। ये लोग जो कहते हैं कि इंसानियत या मानवता या ह्यूमनिटी किसी भी धर्म से बढ़कर है। ये वास्तव में न तो धर्म को समझते हैं और न ही मानवता को।
चलो मानवता से शुरु करते हैं। मानवता माने क्या? बहुत लोगों को तो यह सवाल ही अच्छा नहीं लगेगा। वो कहेंगे कि भई, मानवता मानवता होती है। हम मानव हैं और हमारे भीतर दूसरों के लिए कुछ अच्छे विचार, कुछ भली भावनाएँ होती हैं, इसी को मानवता कहते हैं। इसको वो यूनीवर्सल ह्युमन वैल्यूज़ के नाम से भी सम्बोधित करते हैं। वैश्विक मानव मूल्य।
लेकिन ये क्या हैं, कहाँ से आते हैं, कुछ हैं भी या नहीं। इस बात पर गहरा विचार वो शायद कम ही करते हैं।
चलिए थोड़ा इस पर विचारकर देखते हैं। मानव क्या है, उसके पास मूल्य कहाँ से आएँगे, उसे कैसे पता कि किस चीज़ को कितनी क़ीमत देनी है। मानव को अगर शिक्षित-दीक्षित न करो तो वो वास्तव में एक बुद्धि सम्पन्न जानवर ही है।




