स्वामी विवेकानंद का दर्दनाक संघर्ष, अपनों के ही विरुद्ध || आचार्य प्रशांत (2024)

प्रश्नकर्ता: सर, नमस्कार। सर, बारह तारीख को स्वामी विवेकानन्द जी की अभी जयंती आने वाली है। तो बचपन से काफ़ी उनको पढ़ा है, उनकी जीवनी के बारे में। हमेशा काफ़ी अट्रैक्टिव(आकर्षक) रहा है उनको पढ़ना, उनको जानना। हालाँकि जितना मैंने उनकी जीवनी पढ़ी तो उनके बारे में पता लगा कि कैसे वो रामकृष्ण से मिले, फिर आगे बात बढ़ी। और फिर कैसे मिशन उन्होंने चलाया, रामकृष्ण मिशन। तो सर, आपसे जानना चाहेंगे कुछ ऐसी बातें, स्वामी जी के बारे में, जो हमें पता न हों और जिससे हम बहुत सीख ले सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, उनके बारे में जितनी बातें हैं, मैं अभी बताऊँगा, वो सब सार्वजनिक ही हैं। वो सब पब्लिक रिसोर्सेज़ हैं, वहीं से बातें आएँगी, कहीं कोई गुप्त दस्तावेज़ तो है नहीं। तो अगर हमें उनके जीवन के किसी बहुत महत्वपूर्ण पक्ष के बारे में नहीं पता हो, तो उसकी वजह ये नहीं होती है कि वो सूचना उपलब्ध नहीं थी। उसकी वजह ये होती है कि महापुरुषों के जीवन के कुछ ऐसे पहलू होते हैं जिनकी ओर देखने में हमें असुविधा होती है, तो हम उनको देखना नहीं चाहते।
वरना उनका पूरा जीवन एक खुली किताब जैसा ही था, लगभग सबकुछ ही अंकित किया जा चुका है और बहुत सारी बातों के तो विस्तृत और विविध भी विवरण मिलते हैं। तो वो सब आप पता कर सकते थे। तो आपके प्रश्न पर आते हुए, उनके जीवन के जिस पक्ष की ओर आमतौर पर उतना नहीं देखा जाता, और न देखने में हमारा बड़ा स्वार्थ है। क्योंकि देखेंगे तो हमें दिक्क़त हो जाएगी — वो है उनका संघर्ष, उसकी ओर हम नहीं देखते।
तो जैसा कि हम अपने सभी महापुरुषों के साथ करते हैं, हम उनकी दिव्यता पर ज़्यादा ध्यान दे लेते हैं और हम कुछ इस प्रकार दर्शाते हैं, जैसे कि वो मनुष्य पैदा ही हुआ था कोई महान काम करने के लिए और उसके पास जन्म से ही जैसे कुछ अलौकिक शक्तियाँ थीं या सिद्धियाँ थीं या न जाने क्या था, हम इस तरह से बताते हैं।
और इसमें जो उस इंसान की पूरी संघर्ष यात्रा का मानवीय पक्ष है, वो बिलकुल दबकर रह जाता है — दबकर रह नहीं जाता, हम उसे दबाते हैं, जानबूझ कर दबाते हैं। क्योंकि अगर हम ये स्वीकार कर लेंगे कि उस व्यक्ति ने संघर्ष कितना करा है, तो वो बात हमारे मुँह पर चाँटे जैसी होगी।






