कृष्ण की 'हिंसा' बनाम गांधी की अहिंसा? || आचार्य प्रशांत (2024)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा क्वेश्चन आज के सत्र से है जिसमें आपने बोला कि हिंसा कमज़ोरी की निशानी और अहिंसा मज़बूती की है। लेकिन आजकल हिंसा को कई तरीकों से उचित ठहराया जा रहा है।
अभी तीस जनवरी को गाँधीजी की पुण्यतिथि आने वाली है, तो जितना हमें उस पल में शोक मनाना चाहिए था, अब लोग उसी का जश्न मना रहे हैं। उनके जो हत्यारे हैं, उनकी मूर्तियाँ बनायी जा रही हैं और मन्दिर उनके नाम पर बनाया जा रहा है। हिंसा के कई कारण दिये जा रहे हैं धर्म के नाम पर।
हमारे जो महापुरुष हैं उनका उदाहरण ले-लेकर हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। जैसे:- गुरु गोविन्द सिंह जी या फिर कई और भी लोग हो गये। और हिंसा करने वालों को जैसे हमारे इतिहास में बड़ा महान बताया गया, जिनके नाम के आगे ‘महान’ लग जाता है, जैसे अलेक्जेंडर द ग्रेट। इन्होंने इतना क्षेत्र जीता इनके नाम के आगे ‘महान’ लग गया। ऐसे ही 'अशोक महान' हो गये।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो सब करा जा रहा है क्योंकि आप सुनते हैं। कोई बना ले मन्दिर आपको जाने के लिए विवश थोड़े ही कर सकता है। यहाँ तो ये तक हुआ है कि फ़िल्मी सितारों के भी मन्दिर बना दिये लोगों ने। तो कोई कर कुछ भी सकता है भई, आज़ादी है। लेकिन कोई आपको मजबूर थोड़े ही कर सकता है, वो सब आप भी करें।
प्र: जी।
आचार्य: लोग तो श्रीकृष्ण को भी हिंसक बोलते हैं न। कहते हैं, ‘भारी हिंसा करवाई थी।’ हिंसा का जब अर्थ नहीं समझा जाता, तो यही सबकुछ होता है। उनके देखे श्रीकृष्ण हिंसक हैं, गुरु गोविन्द सिंह हिंसक हैं। और ये सब आप बोलोगे ही जब आप जानते ही नहीं कि हिंसा माने क्या।






