विश्व के धर्मों का भविष्य क्या है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं एक आर्टिकल (लेख) पढ़ रहा था, उस आर्टिकल में एक सर्वे (सर्वेक्षण) के बारे में बताया गया था, तो उस सर्वे में बेसिकली (मूल रूप से) था कि जो अमेरिका की मेजोरिटी पॉपुलेशन (अधिकांश जनसंख्या) है वो क्रिस्चियनिटी (ईसाईयत) को छोड़कर एथीज़्म (नास्तिकता) को फ़ॉलो (अनुसरण) कर रहे हैं, क्योंकि रिलीजन (धर्म) उनकी जो समस्याऍं हैं, उनको सुलझा नहीं कर पा रहा — जैसे कि गन कंट्रोल (बन्दूक नियन्त्रण), रेशियल डिस्क्रिमिनेशन (नस्लवाद), जेंडर डिस्क्रिमिनेशन (लैंगिक भेदभाव) आदि। तो अनुमान लगाया जा रहा है कि सन् २०७० तक जो उनकी मेजोरिटी पॉपुलेशन है, उनका जो रिलीजन क्रिस्चियनिटी है वो माइनोरिटी में आ जाए। और देखा गया है कि भारत, अमेरिका का एक ट्रेंड (रुझान) फॉलो करता है, मतलब जो अमेरिका में चल रहा होता है वो भारत के युवा और यंगस्टर्स (युवा लोग) ये फॉलो करते हैं। तो हो सकता है कि भारत का जो मेजोरिटी रिलीजन हिन्दुइज़्म है, उसको छोड़कर वो एथीज़्म को फ़ॉलो करें आने वाले सालों में। तो मैं आपसे ये जानना चाहता हूँ कि ये पूरी चीज़ का कुल-मिलाकर प्रभाव क्या पड़ेगा भारत पर या विश्व पर या भारत के युवाओं पर?
आचार्य प्रशांत: देखो, ये जो ऑर्गेनाइज़्ड रिलीजन होता है न — संगठित, आयोजित धर्म — ये वास्तव में है ही ऐसा कि जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ेगा और लोगों के लिए सूचनाऍं पाना आसान होता जाएगा, वो ये पुराने तरीक़े के धर्मों को छोड़ते ही चलेंगे, तुम रोक नहीं सकते। तुम कह रहे हो, ‘ईसाईयत वहाँ अल्पमत में आ जाएगी, वो इसलिए अल्पमत में नहीं आ रही कि वहाँ पर दूसरे धर्म बढ़ रहे हैं, वो बस ये होगा कि — जिस सर्वे की बात कर रहे हो मैं जानता हूँ — कह रहे हैं कि सन् २०६० या ८० तक ईसाई वहाँ 46 प्रतिशत बचेंगे और 30-40 प्रतिशत हो जाऍंगे नास्तिक, एथीस्ट्स या एग्नोस्टिक्स



