आचार्य प्रशांत: भारत भी ऐसे ही थोड़ी है, अंग्रेजों से आज़ादी मिले भी सत्तर से ऊपर बरस हो गए और हम कहते हैं कि भारत विविधताओं का देश है। इतनी विविधताऍं होते हुए भी क्या है जो सब लोगों को एक सूत्र में पिरोकर रखता है? ज़रूर कोई शेयर्ड आइडियल (साझा आदर्श) है, ज़रूर कुछ साझी मान्यताऍं हैं, कुछ साझे मूल्य हैं। बात समझ में आ रही है? और वो ऊँचे-से-ऊँचे मूल्य होते हैं—या होने चाहिए कम-से-कम। किसी राष्ट्र की बुनियाद में अगर ऊँचें मूल्य नहीं होंगे, तो वो राष्ट्र बहुत दिन फिर चलेगा भी नहीं, विखंडित हो जाएगा, कुछ और हो जाएगा उसके साथ। समझ रहे हो बात को?
भारत के बारे में कहते हैं ना कि कुछ बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। वो क्या बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी? राजनैतिक स्तर पर तो भारत ना जाने कितनी बार टूटा-फूटा। तो देश तो यहाँ पर कोई एक स्थायी रह ही नहीं पाया, रह पाया क्या? भारत का नक्शा लगातार बदलता रहा है, हर पचास साल में बदलता रहा है, बदलता रहा है कि नहीं राजनैतिक नक्शा? लेकिन एक राष्ट्र के तौर पर भारत लगभग अक्षुण्ण रहा है, अखण्ड रहा है। उसकी वजह है। यहाँ के सब लोगों के निश्चित रूप से कुछ साझे और ऊँचे मूल्य हैं।
ये दोनों शर्तें पूरी होनी चाहिए: मूल्य साझे होने चाहिए और मूल्य ऊँचे होने चाहिए। वो जो साझे और ऊँचे मूल्य हैं, जो भारत को एक राष्ट्र के तौर पर एक रखते हैं, वो मूल्य वास्तव में आध्यात्मिक हैं, ठीक है? तो जो ये भारत देश है, फिर मुझे बताओ कि ये क्या है? ये उन आध्यात्मिक मूल्यों की राजनैतिक अभिव्यक्ति है। भारत राष्ट्र है और उसके केंद्र में क्या है? आध्यात्मिक मूल्य।
आध्यात्मिक मूल्य हैं तभी तो वो चले आ रहे हैं पिछली बीस शताब्दियों से। नहीं तो मैं कह रहा हूँ कि भारत कब का अपने मूल्य खो चुका होता, पर भारतीयों की एक अलग पहचान है। वो बात भारतीयों को भले ही कम समझ में आती है किंतु विदेशियों से पूछोगे तो वो बता देंगे। वो जानते हैं कि राष्ट्र के तौर पर, कंट्री (देश) नहीं, नेशन (राष्ट्र) के तौर पर भारत की क्या पहचान है। वो जानते हैं कि भारत की जो केंद्रीय पहचान है, उसमें बोध आता है, उसमें गहराई आती है, उसमें सत्य आता है, उसमें करुणा आती है, मतलब कि उसमें अध्यात्म आता है।







