न किसी काम में दिल लगता, न कोई काम पूरा होता (युवा हूँ, क्या करूँ?) || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा रेगुलर वर्क (नियमित कार्य) ही नहीं ख़त्म हो पाता है। मैं अपना काम समय से पूरा नहीं कर पाती हूँ। आप कहते हैं कि गीता सत्र सुनो पर वो भी नहीं सुन पाती हूँ, नियमित काम ही चलता रहता है। मैं न स्पोर्ट्स जा पाती हूँ न जिम, यहाँ तक कि शॉपिंग के लिए भी मेरे पास वक़्त नहीं होता है।
आचार्य प्रशांत: महाभारत को प्रमाण मानना कोई अनुचित नहीं होगा, क्योंकि गीता तो महाभारत का ही हिस्सा है। अगर हम गीता की बात कर रहे हैं, तो थोड़ा महाभारत की भी करी जा सकती है। आप कल्पना कर सकते हो जब अर्जुन की बात करते हैं तो अर्जुन को बोलते हैं 'महाबाहो’। कृष्ण अर्जुन को सम्बोधित कैसे करते हैं?
श्रोता: महाबाहो।
आचार्य: महाबाहो माने क्या? अरे वाह! क्या बाइसेप्स (बाज़ुओं की माँसपेशियाँ) रहे होंगे, महाबाहो। यही अर्जुन क्या बने हुए थे अभी दो-ही-चार साल पहले?
श्रोता: बृहन्नला।
आचार्य: हाँ, बृहन्नला। ये क्या करते थे? नाचते थे। क्या बनकर? स्त्री बनकर, किन्नर बनकर। और आमतौर पर आप नर्तक के बाहों को कैसे सोचते होंगे — वो भी अगर स्त्री हो क्योंकि वो तो स्त्री रूप रखे थे — कैसी होंगी? ये महाबाहो एक नर्तक है और पुरुष नर्तक नहीं, स्त्री नर्तक है। ये होती है पूर्णता की अभिव्यक्ति कि जो सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर है, वो वहाँ पर एक उत्कृष्ट नर्तक भी बना हुआ था और नाच भी रहा है, सिखा भी रहा है। और ये नहीं कि बस ऊपर-ऊपर स्वाँग कर दिया, ऐसा नाच सिखाना है कि कोई पकड़ भी न पाये। कोई नहीं पकड़ पाया था, अज्ञातवास था भाई! किसी को पता ही नहीं चला ये कौन है।









