न कोई आदर्श न कोई आशा, युवा करे तो करे क्या? || आचार्य प्रशांत, गीता दीपोत्सव (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्कार, मेरा सवाल था कि एक समय था गाँव में जब शायद ही कोई नशे से ग्रस्त था लेकिन आज ऐसा चलन हो गया है कि कोई भी युवा शराब-कबाब से अछूता नहीं रहा। कॉलेजों में सभी स्टूडेंट्स के पास ड्रग्स मिलना आम बात हो गयी है तो सर, हमारे देश के युवाओं के साथ ऐसा क्यों हो रहा है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, जिसे हम साधारण होश कहते हैं न, वो साधारण होश बड़ा दुखदायी होता है। वो जो साधारण होश है उससे ख़ासतौर पर एक जवान आदमी के लिए, एक ज़िन्दा आदमी के लिए समझौता करना थोड़ा मुश्किल होता है। साधारण होश का क्या मतलब होता है? चेतना की साधारण अवस्था और उस साधारण अवस्था में दिखाई देने वाला जगत का साधारण रूप। जैसा हम अपनेआप को आमतौर पर समझते हैं वो और हमारे सामने क्या? जैसी दुनिया हमें आमतौर पर दिखाई देती है वो। उसमें ऐसा क्या है कि एक जवान आदमी किसी भी तरीक़े से सन्तुष्ट अनुभव करे, बताइए।
जिसको आप आम ज़िन्दगी बोलते हो, उसमें ऐसा क्या है कि कोई कहे कि बहुत बढ़िया चल रहा है ये? ये जो पिक्चर दिखाई है, वाह! वाह! वाह! यही चलाओ। और इसी के और संस्करण बनाओ। जगत एक, जगत दो, जगत तीन, जगत छः, जगत आठ बनाओ। कोई ये चाहता है क्या? कोई नहीं चाहता क्योंकि ये जो हमारी दुनिया है ये हमने बना ही रखी है। बहुत अजीब सी क्योंकि दुनिया हमारा ही तो अक्स है न आईने में एक। दुनिया हमारी ही तो छवि है। जैसे हम हैं, वैसी हमारी दुनिया है। हम भी आधे-अधूरे, विकृत से और वैसी आधी-अधूरी और विकृत माने कुरूप सी हमारी दुनिया है।
तो एक लड़का है या लड़की है वो अब, पहले बच्चा था, अब बड़ा हो रहा है चौदह का, सोलह, अठारह का। वो इस दुनिया को देखता है, वो कहता है, ‘ये कहाँ आ गया मैं। ये क्या कर रहा हूँ। इसी को बोलते हैं यथार्थ? इसी को रियलिटी बोलते हैं? इसी को बोलते हैं? पहले तो मैं क्या करता था? पहले तो मैं अपनेआप को स्कूल की किताबों में रख लेता था। कार्टून शो में मैं अपनेआप को किसी तरह से समा देता था। मैं किसी तरीक़े से अपने लिए वैकल्पिक एक दुनिया का निर्माण किये हुए था, उसमें रहता था। परी कथाओं वाली दुनिया, द फेंटेसी फ़ेयरी वर्ल्ड।’



