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गृहणी होना बेहतर है, या कामकाजी महिला? || आचार्य प्रशांत (2023)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। सर आपने पीछे एक एक्टिविटी दी थी कि आपकी किसी बात से हम सहमत नहीं हैं तो बताइए। तो मेरी इस बात पर सहमति नहीं बनी — जैसे, मैं गृहिणी हूँ। पर मैं अपना जीवन सत्य के साथ जीती हूँ अधिकतर। तो मज़बूत महसूस करती हूँ अपनेआप को। पर मैं जो बाहर जगत में वर्किंग लेडीज़ (कामकाजी महिलाओं) को देखती हूँ। उन लोगों को भी देखती हूँ कि बहुत दबी हुई ज़िन्दगी या डर-डरकर के, समझौता करके जीते हैं। तो आप कहते हैं कि हर महिला को काम करना चाहिए।

पर मैं कहती हूँ, ‘जो काम करने वाली महिला को देख रही हूँ। मैं अपने से नीचे पाती हूँ उन लोगों को। तो मैं तो नॉन वर्किंग होते हुए भी सत्य के साथ अच्छा जीवन जी रही हूँ। तो मेरी सहमति आपसे इस बात पर नहीं बनी कि हर महिला को जैसे तो मेरा कहना है कि सत्य के साथ अगर आप जी रहे हो, तो इसमें वर्किंग और नॉन वर्किंग का शायद कोई फ़र्क न पड़े।

आचार्य प्रशांत: वर्किंग नहीं होता स्वावलम्बन होता है, स्वावलम्बन। घरवाली भी हो सकता है काम करती हो। वर्किंग माने कामकाजी तो वो भी है। स्वावलम्बन। रही बात काम करने पर भी दबे होने की, तो वो जो बाहर काम करती हैं अगर वो दबी हुई हैं, तो उनसे ज़्यादा तो मैं दबा हुआ हूँ। मैं भी खूब दबा हुआ रहता हूँ, खूब तनाव में रहता हूँ। तो इससे ये थोड़े ही सिद्ध हो जाता है कि जो लोग घर में रहते हैं वो मुझसे श्रेष्ठ हो गयें।

सत्य अर्जित करना पड़ता है। वर्किंग और नॉन वर्किंग की बात नहीं है। स्वावलम्बन समझती है न? बाक़ी आपको ख़ुद देखना है। मैं इसमें क्या बताऊँ। अपने जीवन के जो तथ्य हैं, वो आपको स्वयं ही समझने पड़ेंगे अच्छे से। गृहिणियों का सम्मान है। मैं उसमें बहुत ज़्यादा कुछ बोलूँगा नहीं लेकिन गृहिणी होने का तथ्य क्या है, ये तो आपको ख़ुद ही देखना पड़ेगा अपने जीवन में।

जो शरीर है न, ये शरीर भौतिक है और इसको चलाने के लिए भौतिक संसाधन चाहिए होते हैं। रोटी मेटाफिज़िकल तो नहीं होती न? या होती है? आज तक किसी ने अलौकिक, पराभौतिक रोटी देखी है क्या? रोटी, रोटी। रोटी कैसी होती है? फिज़िकल। और हर फिज़िकल चीज़ पैसे से आती है। अगर शरीर ही चलाने के लिए वो जो पैसा है, वो अपना नहीं है तो काहे की मुक्ति, कौनसी मुक्ति!

जब मैं वर्किंग बोलता हूँ तो ये नहीं आशय होता कि करियर बनाओ और करोड़ों कमाओ। मैंने बार-बार बोला है कि कम-से-कम इतना तो कमाओ कि अपनी रोटी ख़ुद खाओ। और मुझे बहुत अभी ये बोलते हुए संभलकर कहना पड़ रहा है क्योंकि मैं बोलूँगा, तो गृहिणियाँ आहत जल्दी हो जाती हैं। आपको नहीं कह रहा हूँ। सामान्यतया। तो कहेंगी, ‘हम भी जो घर का काम करते हैं उससे भी तो हम भी तो कमाते ही हैं। उस काम की भी तो वर्थ है न, वैल्यू है।’

तो मैं कहता हूँ, ‘अच्छा! एक बात बताओ, आप जो लाइफ़स्टाइल मेनटेन (जीवन शैली अपनाना) कर रहे हो, वो कितने की है?’ तो वो निकलकर आता है, वो महीने के डेढ़ लाख की है कम-से-कम। सारे जितने ख़र्चे हैं मिला लो। जिस घर में रह रहे हो, उस घर में रहने का किराया ही न जाने कितने हज़ार है। तो फिर मैं पूछता हूँ, ‘अच्छा, आप जो फिर घर में काम करते हो उसकी क्या वैल्यू है?’ तो उसका ईमानदारी से जब आकलन, असेसमेंट होता है, तो पता चलता है वही काम अगर किसी और से कराएँ तो पाँच-दस-पन्द्रह हज़ार में हो जाएगा। तो ये मामला बराबरी का तो नहीं बैठा न। मुझे माफ़ करिए, बुरा लग रहा हो।

आप जो लाइफ़स्टाइल एंजॉय कर रहे हो, वो महीने के लाख-डेढ़-लाख से नीचे की नहीं है। आप घर में जो काम कर रहे हो, वो पाँच-दस-पन्द्रह हज़ार का है और उसका प्रमाण ये है कि लगा लो किसी बाहर वाले को उतने में वो काम कर देगा। तो फिर ये बात असम हो गयी न, विषम हो गयी, बराबरी की नहीं बैठी। मुक्ति थोड़ा पेचीदा मसला हो जाता है। कि नहीं हो जाता? और ऐसा नहीं कि वो जो बैलेंस है, उसका आप भुगतान करते नहीं। भुगतान तो सबको करना ही पड़ता है, पर दूसरे खाते से होता है फिर भुगतान।

अगर महीने के एक लाख की आपकी लाइफ़स्टाइल है और जो आप काम करते हो, वो मुश्किल से दस-एक हज़ार का है। तो वो जो नब्बे हज़ार है, उसका भी भुगतान तो आप कर रहे हो, पर दूसरे खाते से कर रहे हो। मैं नहीं चाहता उस दूसरे खाते से भुगतान करो। मैं चाहता हूँ मामला सब नम्बर एक के लेन-देन का हो। जब नम्बर एक में नहीं लेन-देन होता तो किस खाते से होता है? नम्बर दो वाले खाते से। ये काला धन अच्छी बात नहीं होती न। ज़्यादा बेहतर ये है कि सबकुछ नम्बर एक में ही लेन-देन हो। यही कह रहा हूँ मैं।

एक लाख का अगर आपका भोग है, तो एक लाख चुकाओगे तो है ही। ब्लैक मनी में क्यों चुका रहे हो? वाइट में चुकाओ न सब। आप समझदार हैं, आप समझ रहे हैं मैं क्या बोल रहा हूँ? वाइट में क्यों नहीं भुगतान करते इज़्ज़त के साथ। ब्लैक में करोगे तो छुपा-छुपाकर करना पड़ता है। मानना भी नहीं पड़ता समाज के सामने कि ऐसे भुगतान किया है। जो ब्लैक में आपने पैसा दिया किसी को बता सकते हो? खुल्ले में करो जो है फिर।

आहत कर रहा हूँ तो क्षमा करिएगा। मेरा कोई इरादा नहीं और हो सकता है मैं पूरी तरह ग़लत हूँ। मैं ग़लत हूँ तो स्वीकार करने में मुझे कोई शर्म नहीं है, मैं ग़लत हूँ। क्योंकि आपकी बात है। आपका दिल ही जानता है सच्चाई क्या है उसकी। मैं गृहिणी नहीं हूँ तो मैं कितना भी कह लूँ बाहर बैठकर के, कहीं-न-कहीं थोड़ा-बहुत तो अनुमान ही लगा रहा होऊँगा। भले ही मैंने कितना भी देखा हो। फिर भी मैंने उस बात को जिया तो है नहीं। तो हो सकता है मैं ग़लत हूँ। मैं ग़लत हूँ तो मुझे क्षमा कर दीजिएगा, पर मुझे जो लगता है वो मैंने बता दिया।

देखिए, ये बहुत बार पहले भी बोला है फिर बोले देता हूँ। “देअर आर नो फ़्री लंचेज़” इस जगत में कोई बहुत स्वार्थी हो सकता है, कोई कम स्वार्थी हो सकता है, पर सब रिश्ते स्वार्थ के होते हैं। ये नियम है। तो कोई आपको बैठाकर के एक लाख की लाइफ़स्टाइल मुफ़्त में नहीं देगा। आप भुगतान तो कर ही रहे हो। ये आपने जो अपने लिए एक स्वार्थवश कल्पना महल बना रखा है न कि वो तो मुझसे सब इतना प्रेम करते हैं कि मुझे फ़्री में सारी लग्जरीज़ दे रहे हैं या जो भी मुझे दे रहे हैं। कोई किसी से प्रेम के नाते कुछ नहीं देता।

प्रेम तो सिर्फ़ ये जानते हैं या तो सन्त या तो ज्ञानी। पति-पत्नी कहाँ से प्रेमी हो जाते हैं भई! पति-पत्नी में तो रिश्ते की शुरुआत ही स्वार्थ से होती है। आप जब लड़की देखने आते हो, तो ये देखने आते हो इसका कल्याण कर दूँ? शुरुआत ही स्वार्थ से होती है कि दिखने में कौनसी बढ़िया है, भोगने में कौनसी बढ़िया है। लड़की तो विशेषकर ऐसे ही देखी जाती है कि भोगने में मस्त रहेगी कि नहीं रहेगी। शुरुआत ही स्वार्थ से है। लड़की भी यही देखती है, कमाता है कि नहीं कमाता। आप किसी निठल्ले, बेरोज़गार से शादी करोगी क्या? करोगी? (श्रोता ‘न’ में सिर हिलाती हैं) एकदम ऐसे घूम रहा है, वो कुछ नहीं न अता न कमाने का न कहीं कुछ बसने का। करोगी? आप भी स्वार्थ देखकर के ही विवाह करती हो।

जब शुरुआत ही स्वार्थ से हो रही है, तो आगे भी स्वार्थ ही चलता होगा न। तो कोई आपको घर बैठाकर के मुफ़्त क्यों खिला रहा होगा पागल? कि खिला सकता है कोई किसी को घर बैठाकर? पर सबको यही मानना है। ‘नहीं तो, मुझसे तो इतना प्यार करते हैं कि मुझे फ़्री में सब दे देते हैं।’ हाय रे! फ़्री लंच क्या, फ़्री डिनर भी मत लो।

ये जो डेट वगैरह पर जाते हो। अब ये बात आपसे नहीं तो बाक़ी कम उम्र की महिलाएँ हैं, उनसे बोल रहा हूँ। लड़कियाँ। मिलने-जुलने भी जाओ साधारण तो वहाँ भी अपना पैसा ख़ुद चुकाओ। किसी से एक रुपया मत लो, देने की क्षमता रखो बल्कि। अपना भी दूँगी और तुम्हारा भी दे दूँगी, ले लो। एक रुपया नहीं लेना है किसी से — न पति से, न प्रेमी से, न पिता से। किसी से नहीं लेना एक रूपया, पर ये बड़ी बुरी आदत पाल ली है ख़ासकर भारत में हमने। दुनियाभर में है, भारत में थोड़ी ज़्यादा है कि लड़की माने ले लेगी, ले लेगी। कोई तुम्हें काहे को देगा कुछ मुफ़्त में?

अभी एक का आया बन्दे का, लड़के का, वो बोला, ‘आप इतना ज़्यादा इनका स्त्रियों का पक्ष लेते हैं। आपको पता है मेरे घर में क्या चल रहा है?’ मैंने कहा, ‘क्या?’ बोल रहा है, ‘आप ऐसे बोलते हो जैसे लड़के दहेज के लोभी होते हैं। मेरी बहन का ब्याह हो रहा है और वो लगी हुई है कि ज़्यादा-से-ज़्यादा दहेज दो।’ बोले, ‘आप हर बार ऐसे दिखाते हो जैसे लड़के ही बिलकुल कुत्ते होते हैं और उनको दहेज चाहिए लेकिन मामला उल्टा है। मेरी बहन की शादी हो रही है और मेरी बहन ने अभी घर में क्लेश कर रखा है कि ज़्यादा-से-ज़्यादा दहेज दो।’ मैंने कहा, ‘क्यों?’

बोलती है, वो कहती है, ‘ऐसे ही तो मेरी इज़्ज़त बढ़ेगी ससुराल में।’ मैंने कहा, ‘वो भी नहीं समझ रही है “देअर आर नो फ़्री लंचेज़।” यहाँ पर ले लेगी बहुत सारा दहेज। नतीजा बस ये होगा कि पिता की सम्पत्ति में से हिस्सा नहीं पाएगी।’ और ये खूब होता है। दहेज दे दिया, अब तुझे सम्पत्ति में हिस्सा क्यों चाहिए? तो ले-देकर मुफ़्त तो आपको कुछ भी नहीं मिला न। आपको ही पिता की सम्पत्ति में कानूनन जो हिस्सा मिलना चाहिए था, वो हिस्सा आपने गँवा दिया। जब आप वो हिस्सा माँगोगे तो भाई लोग कहेंगे, ‘ये जो हिस्सा है ये सारा तो तू पहले ही ले जा चुकी है अपने दहेज में। अब काहे को माँगने आयी है?’

मुफ़्त तो कुछ भी नहीं मिलता इस दुनिया में। ये भ्रम आपने क्यों पाल लिया कि कोई भी आपको मुफ़्त में कुछ दे देगा? बहुत खुश हो जाते हो लेकिन — ’गिफ़्ट मिल गया मुफ़्त का!’ अरे, मत लो! और अगर ले रहे हो तो उतने का ही फिर वापस भी दे दो। तूने इतने का दिया, इतने का वापस भी ले ले और ये तो करो ही मत कि न नौकरी है, न चाकरी है, ब्याह करके बैठ गये। मैं करियरबाज़ी करने को नहीं बोल रहा हूँ। मेरी बात सूक्ष्म है थोड़ा समझिएगा।

मैं नहीं कह रहा हूँ कि आप जाकर के किसी बैंक में वाइस प्रेसिडेंट (उपाध्यक्ष) बने ज़रूरी है। मैं उस होड़ में पड़ने को नहीं कह रहा हूँ। स्वावलम्बन दूसरी बात होती है न। ‘फाइनेंशियल इंडिपेंडेंस’, मैं उसकी बात कर रहा हूँ और उसके लिए बहुत नहीं कमाना होता। उसके लिए बस इतना कमाना होता है कि अपने साधारण ख़र्चों के लिए मैं किसी पर आश्रित न रहूँ। ये दो चीज़ें हैं जो जुड़ी हुई हैं एक-दूसरे से और दोनों को ख़त्म होना चाहिए। एक ‘डाओरी’ (दहेज) और एक ‘एलीमनी’ (निर्वाह निधि)। और दोनों बहुत ही घटिया चीज़ें हैं और दोनों में ही स्त्रियों का ही पतन है।

दहेज में भी स्त्री ही गिर रही है और अब पति से नाता तोड़ दिया फिर भी पति के ही टुकड़ों पर जी रही हो। ये भी कितनी घटिया बात है न ‘एलीमनी’? जिससे रिश्ता तोड़ दिया, अब उससे पैसे भी क्यों लेने हैं, क्यों लेने? ‘रिश्ता था फिर तब भी कुछ स्वीकार कर सकते थे। अब तो एकदम ही तुमसे कुछ नहीं ले सकते। एक रुपया भी नहीं ले सकते। अब रिश्ता नहीं है भाई!’ अपनी ख़ुद्दारी की कुछ बात होती है कि नहीं होती है? लेकिन आदत लग गयी है लेने की और मैं कह रहा हूँ, ‘ले आप सकते नहीं, दुनिया में कुछ भी मुफ़्त मिलता नहीं। बस आपको पता भी नहीं होता, आप भुगतान कहाँ से कर रहे हो।‘

अच्छा और बिलकुल ऐसा बहुत बार होता है कि जो स्त्री थोड़ा बाहर निकलती है, कामकाजी बनती है, उसकी हालत बाहर-बाहर से ज़्यादा ख़राब नज़र आती है, मैं मानता हूँ बिलकुल ऐसा होता है। शुरुआत में ऐसा ही लगेगा क्योंकि वो बाहर का भी सम्भालती है, घर से भी वो ज़िम्मेदारियों से कोई मुक्त तो हो नहीं जाती, तो वो दूने दबाव में नज़र आती है। उसका चेहरा आप देखोगे, उजड़ा हुआ चेहरा होगा बिलकुल। दफ़्तर का भी दबाव, घर का भी दबाव और उसकी तुलना में आप गृहिणी का चेहरा देखोगे तो ज़्यादा शान्त लगेगा, ज़्यादा सन्तुष्ट लगेगा, ज़्यादा सुसज्जित भी लगेगा क्योंकि उसके पास समय है सज्जा वगैरह करने का।

जो कामकाजी महिला है, उसका तो आप उजड़ा चमन ही पाओगे। लेकिन इससे ये अर्थ नहीं हो गया कि जो घर में है गृहिणी, वो अनिवार्यतः बेहतर स्थिति में है। काश कि ऐसे निस्वार्थ पति होते, जो पत्नियों को निस्वार्थ भेंट दे रहे होते अगर ऐसे हों तो कोई बात नहीं। हो सकता है आप अपवाद हों। आपको ऐसा कोई देवतुल्य पति मिल गया हो, फिर तो मैं कुछ नहीं कहता। मैं कहता हूँ, ‘मिलें, सबको मिलें। सब देवों को देवियाँ मिलें, सब देवियों को देव मिलें।’ लेकिन ऐसा होता नहीं है न बाबा!

कोई किसी को मुफ़्त कुछ नहीं देने वाला। देता है कोई! फिर? बल्कि कोई आपको कुछ दे और पैसे बताकर दे तो गनीमत मानिए, ये सौदा ख़रा-ख़रा है जैसे दुकान में होता है। ‘ये रहा माल।’ ‘हाँ! जी, कितने का है जी।’ ‘साढ़े-पाँच-सौ रूपये।’ ठीक। यहाँ बेईमानी नहीं हो रही है। माल भी दिया और दाम भी बता दिया। बिलकुल चौकन्ने हो जाइए जब कोई कहे — ये ले लो और आप कहें दाम? तो कहे, ‘जी दाम की क्या ज़रूरत है?’ वो अब आपसे साढ़े-पाँच-सौ नहीं, पाँच-हज़ार वसूलेगा। उसको पता है दाम न बताकर के साढ़े-पाँच-सौ से ज़्यादा मिलेगा। इसलिए वो साढ़े-पाँच-सौ वाला दाम बता नहीं रहा है।

जो दाम न बताए उससे तो बहुत सतर्क हो जाना चाहिए। कोई दाम न बताए तो एकदम रख दीजिए, कहिए, ‘नहीं चाहिए, रख‌ अपने पास और अगर देना चाहते हो तो जो सही-सही दाम है, बता दो लिखित में, बिल काटो और नम्बर एक में उसका भुगतान दो।’

पहले, दस-एक साल पहले अद्वैत में एक काम करती थी, बड़ी हँसोड़ थी बंगाल से। तो एक दिन वो हँसते हुए बोलती है, ‘हाफ़ ऑफ़ माइ फ्रेंड्स हैव बीन लेड फ़ॉर अ मसाला डोसा, माने एक मुफ़्त का डोसा खिला दो और ये कमरे में चलने को तैयार हो जाती है। अतिशयोक्ति कर रही थी, हँसकर बोल रही थी। मज़ाक की बात थी।

पर उस मज़ाक में भी एक सूक्ष्म तथ्य है। काहे को मुफ़्त का डोसा खाना रे? खिलाने की ताक़त पैदा करिए, ‘लो, ख़ुद भी खाएँगे, तीन जनों को और भी खिला देंगे।’ कहते हैं, ‘स्त्री अन्नपूर्णा होती है।‘ अन्नपूर्णा तो तब है न जब वो अन्न पहले स्वयं अर्जित करा हो। सच में अन्नपूर्णा बनिए न। मैंने कमाया, मैंने बनाया अब सबको खिलाया। तब हुई न आप अन्नपूर्णा।

और मैं बिलकुल तैयार हूँ कि मैंने एक-एक बात जो बोली है, वो ग़लत है तो बुरा मत मानिएगा। मैं ऐसा ही हूँ।

प्र१: सर, मेरा प्रश्न एक्टिविटी में भाग लेने का था।

आचार्य: और भी इसके पक्ष होते हैं न। कमाना सिर्फ़ कमाना नहीं होता। कमाने के लिए थोड़ा दुनियादारी समझनी पड़ती है। कमाने बाहर निकलो तो उसके साइड बेनिफिट्स भी होते हैं, उसके नुक़सान भी होते हैं, जानता हूँ।

दुनियादारी की चक्की में पड़ो तो आदमी पिसता भी है। समझता हूँ इस बात को। लेकिन अगर घर से बाहर निकलो तो उसके लाभ होते हैं। थोड़ा सड़क की धूल खाओ, थोड़ा आटे-दाल का भाव पता चले, थोड़ा देखो दुनिया कैसी कुटिल-कपटी है, देखो दुनिया में कैसी जोड़-तोड़ चलती है। ये सब जब जानोगे, रंग महल के तौर-तरीक़े, ढर्रे तभी तो दिखायी देगा न कि जाल कैसे बुना जाता है और कैसे फेंका जाता है। तभी तो बच पाओगे।

अगर घर से बाहर ही नहीं निकलोगे तो दुनिया का क्या पता चलेगा या चलेगा? तभी क़द्र ही कर पाओगे। घर में बैठे ही रहने से एक तरह की डंबनेस आ जाती है। वो भोलापन नहीं होता, वो डंबनेस होती है। कुछ न आता, न पता। बस घर में हैं और घर की दुनिया अपनी छोटा सा घोंसला और बहुत हुआ तो टीवी। दुनिया में थोड़ा संघर्ष करना चाहिए। कितना करना है वो आप तय करिए। मैं कोई नहीं होता बोलने वाला। पर मेरी विनम्र राय ये है कि थोड़ा सा दुनिया में जाकर के संघर्ष करिए।

प्र२: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी, मैं ठीक से मतलब अपनी बात को शायद नहीं बोल पाऊँगी। सर, मैं मतलब बहुत कभी कुछ सामने आयी नहीं, कभी कुछ बोला नहीं। हालाँकि मैं काम करती हूँ। गर्ल्स हॉस्टल है काफ़ी अच्छा। सब कर लेती हूँ, कमा लेती हूँ लेकिन घर में भी दब-दबकर रही, परिवार में भी, ससुराल में भी। तो हिम्मत ही नहीं होती है कुछ बोलने की। और वहाँ भी ऐसा कुछ लड़कियों के साथ रहना रहता है, तो कुछ ऐसा भी है नहीं कि किसी का कुछ सामना करना है, तो बहुत मैं बोल नहीं पाती हूँ।

आचार्य: थोड़ा सा हम पैदा होते हैं और बाक़ी बहुत सारा हम बनाये जाते हैं। आप थोड़े ही चुप रह जाती हैं। आपकी माताजी, उनकी माताजी, उनकी दादीजी, उनकी दादीजी, उनकी परदादीजी, उनकी भी पर-पर-पर-पर-पर, सब चुप रहे हैं और सब आपमें मौजूद हैं। आप इतनी सी हैं (दो उँगलियों से संकेत करते हुए) और बाक़ी सारा (दोनों हथेलियों से संकेत करते हुए) इतना क्या है? अतीत जो हमारे भीतर सर्जिकली इम्प्लांटेड (शल्य चिकित्सा द्वारा प्रत्यारोपित)।‌ उसको हम संस्कार बोलते हैं।

आप अमेरिका में रहते होती तो आप ऐसे थोड़े ही होतीं और अगर आप अफगानिस्तान में होती तो ये सवाल पूछने के लिए भी यहाँ नहीं बैठी होतीं (हँसते हुए)। स्त्री की स्थिति के मामले में भारत, अमेरिका और अफगानिस्तान दोनों के बीच में कहीं पर है। पुरानी चीज़ें एक रास्ते से आपके भीतर आयी हैं। उन्हीं रास्तों से दूसरी चीज़ों को भीतर प्रवेश कराइए। ठीक है?

कड़ाही पर चीज़ें चिपक गयी होती हैं, तो उनको हटाने के लिए भी कड़ाही में कुछ और डालना ही पड़ता है। पहले कुछ डाला था वो चिपक गया। अब कुछ डालेंगे जिससे चिपकी हुई चीज़ हट जाएगी। यही करते हो न?

प्र२: जी सर। बहुत हिम्मत आयी है, आपको सुन रही हूँ एक साल से लगभग। तो बहुत और चार शिविरों में भी जा चुकी हूँ। ऋषिकेश, एक बार गोवा और ये दिल्ली में तीसरा है। बहुत-बहुत आत्मबल बढ़ रहा है।

आचार्य: आत्मबल बढ़े और जितना हो सके दूसरों की मदद करिए।

प्र२: जी सर।

आचार्य: आप अकेली नहीं हैं। और न जाने कितने हैं न?

प्र२: जी।

आचार्य: उन तक, सब तक हाथ पहुँचाइए। जितने भी तरीक़े से हो सके। सीमित तरीक़े से हो सके तो सीमित तरीक़े से ही सही।

प्र२: जी।

आचार्य: ठीक है? प्रयास करिए कि सब तक बात पहुँचे, समझ आए। बाक़ी जो होगा सो हमें क्या पता क्या होगा? पौराणिक काल से पहले भारत में स्त्रियों की स्थिति बहुत अलग होती थी। जिसको आप आज की सांस्कृतिक स्त्री कहते हो न, ये वैदिक स्त्री नहीं है। ये सबकुछ शुरू हुआ है भारत में चौथी-पाँचवी शताब्दी के बाद से जब से पौराणिक काल शुरू हुआ है। पहले पौराणिक काल शुरू हुआ, फिर पश्चिम की दिशा से सब आक्रान्ता आने लग गयें। इन सबने मिलकर वो खड़ी कर दी है, जिसको आप आज की ‘भारतीय संस्कृति’ बोलते हो।

जो अगर आप धर्म की ही बात करोगे तो जो भारत की वैदिक महिला है, वो बहुत अलग है आज की महिला से। रुख़-रवैये में, चाल-ढाल में, वेशभूषा में, ज्ञान में। बहुत खुला हुआ देश था भारत। बहुत-बहुत खुला हुआ देश था भारत। ये सब चीज़ें कि स्त्री बोल नहीं सकती, जान नहीं सकती, काम नहीं कर सकती, ताक़त नहीं रख सकती, अधिकार नहीं माँग सकती। ये सब तो तीन जगहों से आया है। भीतर से देखो तो पुराणों से, जिसको आप स्मृति शास्त्र बोलते हो पूरा।

हमने एक बार इस पर विस्तार में बात करी थी कि श्रुति और स्मृति याद है। तो ये आया है स्मृति शास्त्र से जो कि वेदों के बहुत-बहुत बाद का है। ये भी नहीं कि सौ-दो-सौ साल बाद। बहुत हज़ार साल, हज़ारों साल बाद का है।

ये आया है स्मृति शास्त्र से जिसमें ये सब आपकी स्मृतियाँ आती हैं और पुराण आते हैं। वहाँ से आया है भीतरी तौर पर और बाहरी तौर पर आया है आक्रान्ताओं से। जो अफगानिस्तान की दिशा से, तुर्की की दिशा से, अरब की दिशा से। वो अपनी संस्कृति लेकर आयें और चूँकि युद्ध में वो जीते तो उन्होंने अपनी संस्कृति भारत के ऊपर भी लाद दी और उसके बाद अंग्रेज़ आयें। उनकी भी अपनी एक उस समय पर विक्टोरियन सेंसिबिलिटीज़ होती थी। उनके यहाँ भी महिलाओं को कोई बहुत ऊँचा स्थान थोड़े ही था! बहुत सारे विकसित मुल्क हैं, अमेरिका जैसे जिनमें महिलाओं को बराबरी का हक़ अभी हाल में मिला है।

भारत में प्रधानमन्त्री और राष्ट्रपति दोनों हो चुकी हैं अब महिलाएँ। हो चुकी हैं न? अमेरिका में आज तक कौन है? तो जो पश्चिम से संस्कृति आयी और जो अरब से संस्कृति आयी, ये दोनों ही प्राचीन भारतीय संस्कृति की अपेक्षा बहुत संकीर्ण थी। और इस कारण महिलाओं का वो हाल हो गया है भारत में जो आज आप देख रहे हैं और इसके अलावा हमने कहा है कि भारत के ही भीतर से ये एक पौराणिक धारा निकल पड़ी। उसमें भी महिलाओं का खूब दमन है।

नहीं तो आप अगर वेदों के पास जाएँगे या ऐतिहासिक दृष्टि से बिलकुल शुद्ध तथ्यात्मक ऐतिहासिक दृष्टि से अगर आप ईसा पूर्व भारत में महिलाओं की स्थिति का अध्ययन करेंगे, तो पाएँगे बहुत खुला मामला था। आप जितनी कल्पना नहीं कर सकती उससे ज़्यादा खुला मामला था। विचार की स्वतन्त्रता, आचरण की स्वतन्त्रता, जीवन की स्वतन्त्रता। सब थी महिलाओं के पास और पूरा उसका उपयोग करती थीं।

हम नहीं कल्पना कर सकते उस समय पर कि महिला ऐसी है कि (डरने का अभिनय करते हुए)। ये सब तो भारतीय महिला को बना दिया गया, थी नहीं ऐसी। इसलिए वेदान्त है।

वेदान्त महिला को उसकी आवाज़ वापस लौटाता है। वेदान्त महिला को महिला से ज़्यादा मनुष्य बनाता है।

आ रही बात समझ में?

और तुर्रा ये है कि आज हम जिसको अपनी संस्कृति बोलते हैं और बार-बार बोलते हैं कि हमें भारतीय संस्कृति की रक्षा करनी है। वो वास्तव में भारतीय संस्कृति है ही नहीं। वो तो आक्रान्ताओं की संस्कृति है जो कि आपके ऊपर थोप दी गयी। आपने उसे स्वीकार कर लिया और अब आप भ्रमवश उसको ही अपनी संस्कृति समझते हो। और नारे लगाते हो कि मुझे तो महान भारतीय संस्कृति की रक्षा करनी है।

आप जिसको अपनी संस्कृति बोल रहे हो, वो आपकी है ही नहीं। आपको वास्तव में अपनी मौलिक संस्कृति जाननी है, तो पीछे और पीछे जाइए। पुराणों से थोड़ा पीछे जाइए। पुराण सब ईसा काल के बाद के हैं और कुछ पुराण तो बिलकुल अभी के हैं, सिर्फ़ कुछ सौ साल पहले के।

आपको मौलिक रूप से अगर भारतीय महिला की स्थिति जाननी है तो ईसा पूर्व जाइए, बहुत बेहतर स्थिति पाएँगे आप। हो सकता है एकदम समानता न पाएँ। लेकिन फिर भी आज की दुर्दशा से बहुत बेहतर स्थिति पाएँगे।

और रही सही कसर मनुस्मृति आदि ने पूरी कर दी। ये पुराण और स्मृति, ये दोनों मिलकर के ‘स्मृति साहित्य’ कहलाते हैं, इन्हें शास्त्र नहीं कहा जाता, ये साहित्य है। पुराण और स्मृति मिलकर के कहलाते हैं ‘स्मृति साहित्य’। शास्त्र माने सिर्फ़ ‘श्रुति’ होता है। श्रुति माने वेद-वेदान्त। एक ये बड़ी भारी भूल हो गयी भारत में कि स्मृति को ही शास्त्र बोलना शुरू कर दिया। तो पुराणों को शास्त्र बोल रहे हैं, मनुस्मृति को शास्त्र बोल रहे हैं। ये नहीं शास्त्र हो जाते भाई!

शास्त्र माने, सिर्फ़ वो जहाँ बात बस आत्मज्ञान की हो रही है। अहम् और आत्मा जिसके ये प्रतिपाद्य विषय हों, उसको ‘शास्त्र’ बोलते हैं।

जहाँ बात मिथ की है और समाज की है और सामाजिक नियमों की है, वो शास्त्र थोड़े ही कहलाएगा। कि राजा को प्रजा का संचालन कैसे करना है, इसको शास्त्र थोड़े ही बोल सकते हो। कि फ़लाना अपराध करने पर कैसी-कैसी सज़ा मिलनी चाहिए, ये शास्त्र थोड़े ही हो गया। कई प्रकार की कहानियाँ जिनका अर्थ मात्र सांकेतिक हो सकता है, कथाएँ उनका संकलन शास्त्र थोड़े ही हो गया।

श्रुति शास्त्र है और वेदान्त महिलाओं का बहुत अच्छा मित्र है क्योंकि वो कहता है कि देह से कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं। आप चेतना हो जो मुक्ति की अभिलाषी है। चेतना मात्र हो आप और मुक्ति चाहिए आपको, तो आपकी आयु क्या है, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। आपका लिंग क्या है, कोई फ़र्क नहीं पड़ता। आपकी जाति क्या है, कोई फ़र्क नहीं पड़ता। ये सब बातें देह की हैं। देह से हमें कोई लेना-देना नहीं, आप सब चेतना मात्र हों।

वेदान्त आपको चेतना मात्र के तौर पर देखता है और कहता है, आपके जीवन का एक ही उद्देश्य है, मुक्ति। सब चेतनाएँ हैं, सबको मुक्ति चाहिए बस। समझ में आ रही है बात? गाड़ दीजिए खूँटा एकदम।

प्र३: आचार्य जी नमस्ते। आपसे जुड़ने के बाद में मुझे लगा कि दो ग़लतियाँ मेरी हुई हैं इसमें। एक तो ये कि मुझे ये जीवन जो है आसान जीवन के लिए नहीं है। और मैंने शादी जो करी थी, आसान जीवन के लिए की थी कि ग़ैर-कामकाजी से कि जीवन आसान रहेगा और अभी ये पता लगता है कि जीवन हमारा आसान जीवन नहीं। हमारा बहुत मेहनत करने के लिए है, सही से मेहनत करने के लिए है और निःस्वार्थ निष्काम होकर के काम करने के लिए है।

दूसरा, स्त्री हो या पुरुष हो, हमें इसके ऊपर जेंडर रेलेवेन्ट (लिंग संगत) होना है, वो भी आपने बताया। जेंडर डिस्क्रिमिनेशन (लिंग भेद) और रेलेवेन्ट (संगत) में मुझे लगा कि जेंडर रेलेवेन्ट होना बड़ी बात है। हमें जेंडर रेलेवेन्ट होना चाहिए।

मैं आज भी इनसे यही कह रहा था कि तुम काम कर रही हो बहुत अच्छी चीज़ है। लेकिन आज हो सकता है कि तुम डॉक्टर होती, तुम पढ़ती पहले कहीं। पढ़ाई में तुम्हारा रुझान होता उस तरीक़े से। बीए किया है इन्होंने, बीकॉम। लेकिन एक जाती बीकॉम करके कुछ कर सकती थी आगे और अच्छा हो सकता था। यू कुड बिकम बेटर डॉक्टर देन मी, मेरे से भी अच्छे डॉक्टर हो सकते थे। तो हमारी ये बहस चल रही थी दो-तीन से। आपसे सवाल पूछने से पहले इस बात से। मैं आपकी साइड में हूँ सर।

आचार्य: मैं इनकी साइड में हूँ। (महिलाओं की ओर इशारा करते हुए।) (श्रोतागण हँसते हैं)

प्र३: और मुझे मालूम है कि आपकी साइड होने से भी ये बुरा नहीं मानेगा इस बात को। कि भई, नहीं बात यहाँ…।

आचार्य: देखिए, मैं तो महिलाओं की साइड रहता हूँ हमेशा।

प्र३: नहीं सर, मैं महिला और पुरुष नहीं देख रहा हूँ। (आचार्य जी हँसते हैं) मैं एक चेतना की तरह देख रहा हूँ। दोनों चेतना, दोनों बराबर हैं बिलकुल लेकिन सर यहाँ मैं एड (जोडूँगा) करूँगा कि हमारा जो समाज है जिसमें हम रह रहे हैं, वो अभी उसके लिए परिपक्व नहीं है।

इनका सवाल कहाँ से आया, इन्होंने वो नहीं बताया अभी तक। मैं बता देता हूँ। ये कई लोगों को जानती हैं जो जैसे वो स्वावलम्बी हैं, काम कर रही हैं ऑफिस में, पढ़ा रही हैं स्कूल में। उनकी सैलरी पता लगा कि उनके पति के खाते में जा रही है और वो दस रुपया अपनी मर्ज़ी से ख़र्च नहीं कर सकते हैं।

डॉक्टर हैं सर, मैं जानता हूँ कि जो डॉक्टर होने के बाद भी उनकी जो लाइफ़ है न इतनी गयी-गुज़री है, अपना ससुराल में पति के सामने किसी का कोई सहारा नहीं है। और एक नहीं सर, अनगिनत को हम जानते हैं। ये सवाल उनका वहाँ से उठा है।

आचार्य: ठीक-ठीक, बहुत अच्छे, बहुत बढ़िया। ये एकदम बहुत सम्बन्धित और इसमें प्रासंगिक पक्ष है। देखिए, मैंने बहुत बार बोला है। बाहर की स्वतन्त्रता काम नहीं आती जब तक भीतरी स्वतन्त्रता न हो। आज बाहर की स्वतन्त्रता के लिए आपको बहुत चीज़ें मिल गयी हैं। सबसे पहले तो कानून आपके पक्ष में है। देश का जो सबसे बड़ा कानून है संविधान, वही महिलाओं के पक्ष में है। उसके बाद पिछले कई दशकों में एक-के-बाद-एक कई कानून बनते गये हैं। जो महिलाओं को कई तरीक़े से सुरक्षा भी देते हैं और मदद देते हैं।

बाहर वो सब चीज़ें हैं आपके पक्ष में। शिक्षा आपके पक्ष में है। आज कोई बच्चा अगर सच में शिक्षित है तो उसको ये भी सिखाया जाता है कि महिलाओं को बराबरी से देखो, सम्मान से। मीडिया आपके पक्ष में है। पहले गुनाह बहुत सारे सिर्फ़ इसीलिए छुपे रह जाते थे। क्योंकि कोई बोलने बताने वाला नहीं था। आज मीडिया है, मीडिया नहीं तो सोशल मीडिया है। कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा हो और कोई भी रिकॉर्ड करके डाल देगा। तो बात वो सामने आ जाती है।

तो बाहर बहुत सारी चीज़ें हैं, जो महिला के पक्ष में है आज। लेकिन भीतर महिला अगर आज भी बन्धक हो तो बाहर जो स्वतन्त्रता मिली है, वो किसी काम की नहीं रहती। बल्कि बाहरी स्वतन्त्रता का दुरुपयोग और हो जाता है। ये भी तो एक तथ्य है न कि दहेज विरोधी और महिला उत्पीड़न विरोधी कानूनों का सहारा उठाकर के बहुत सारी महिलाएँ पुरुषों पर एकदम फ़र्ज़ी मुकदमे डालती हैं और उनका शोषण करती हैं। बहुत सारी ऐसी महिलाएँ हैं।

ये इसीलिए हो रहा है क्योंकि बाहर तो आपको स्वतन्त्रता का माहौल मिला। लेकिन भीतर से आप अभी भी ग़ुलाम हो। कहीं देह के ग़ुलाम हों, कहीं लोभ वगैरह के, वही जो तीन चीज़ें होती हैं — ‘शरीर, समाज, संयोग’। आप उसके अभी भी भीतर से ग़ुलाम हो। तो बाहर की स्वतन्त्रता या तो काम नहीं आएगी या फिर दुरुपयुक्त हो जाएगी।

तो वो जो आप सारी बातें बोल रहे हैं कि महिला है, वो काम खूब करती है लेकिन सारी तनख़्वाह पति के खाते में जाती है, वो वही मसला है। बाहर तो मिल गयी है आज़ादी, काम भी करने की और अपना जीवन आगे बढ़ाने की। लेकिन भीतर से वो पूरी तरह ग़ुलाम है फिर कोई बात नहीं बनेगी, एकदम बात नहीं बनेगी।

और ये हम बहुत सारी अग्रणी महिलाओं के साथ भी होते हुए देख चुके हैं। कि खिलाड़ी होती हैं और उनको पूरे तरीक़े से मुट्ठी में रखा होता है उनके आसपास के लोगों ने, कई बार घर वाले होते हैं, पति होते हैं। अभिनेत्रियाँ होती हैं, उनका सारा पैसा उनके माँ-बाप के खाते में जा रहा होता है और पूरा उनका जो करियर और डिसीज़न्स (निर्णय) है, वो भी घर वाले ले रहे होते हैं। तो आप हो सकता है कि एक सामाजिक हस्ती भी बन गयी हों और तब भी आप भीतर से भयानक ग़ुलाम हो। तो मैं जो बातें बोला करता हूँ, मैं उनसे बोला करता हूँ न जो मेरे पास आते हैं।

जो मेरे पास आते हैं माने, वेदान्त के पास आते हैं। तो मैं उनसे जो बात बोलता हूँ, वो इस अनुमान पर, इस आधार पर बोलता हूँ कि वेदान्त के पास तो वो हैं ही माने आन्तरिक स्वतन्त्रता तो उनको अब धीरे-धीरे मिल ही रही है, तो मैं कहता हूँ कि अब आप बाहरी स्वतन्त्रता भी लीजिए। लेकिन जिसके पास आन्तरिक स्वतन्त्रता नहीं है, उसको बाहरी दे दो तो वो उसका अपना और नाश ही कर लेगी। चाहे स्त्री हो, चाहे पुरुष हो कोई हो।

जो भीतर से अभी ग़ुलाम है। उसको बाहर आप अधिकार दे दो तो बन्दर के हाथ में तलवार। समझ रहे हो? तो दोनों चीज़ें ज़रूरी हैं, दोनों। बाहर के जो हक़ मिलने थे, अब वो मिल चुके। बहुत हक़ मिल गये हैं महिलाओं को। पुरुष तो शिकायत करते हैं कि सारे हक़ महिलाओं को ही मिलें हुए हैं कानून में। लेकिन भीतर से जो महिला की मुक्ति और तरक़्क़ी होनी है वो नहीं हो पायी है, वो होनी ज़रूरी है और वो भी उन्हीं दो तरीक़ों से होगी जिसकी बात उपनिषद् करते हैं — अविद्या भी चाहिए और विद्या भी चाहिए। ये दोनों जैसे-जैसे स्त्री को मिलते जाएँगे, वो भीतर से फिर स्वतन्त्र होती जाएगी। और इसमें कोई शक नहीं कि भीतरी स्वतन्त्रता, बाहरी स्वतन्त्रता से ज़्यादा मूल्य की होती है।

जीवन में कोई ऐसी स्थिति आ भी सकती है कि बाहर आपको परतन्त्र होना पड़े, होता है लेकिन अगर आप भीतर से आज़ाद हैं तो वो समय फिर धीरे-धीरे कट जाता है। लेकिन अगर बाहर जीवनभर आप आज़ाद रहे और भीतर ग़ुलामी ही है तो सारा व्यर्थ गया जीवन। बहुत आवश्यकता है अध्यात्म की महिलाओं को, बहुत-बहुत आवश्यकता है। नहीं तो ये सारा सशक्तिकरण का कार्यक्रम सब व्यर्थ है, उल्टा पड़ेगा। पुरुषों ने ताने कसने शुरू ही कर दिये हैं।

वो कहते हैं, ‘महिला को आज़ादी दो तो वो उधमी, उपद्रवी हो जाती है। नाश कर लेती है अपना भी और दुनिया का भी।’ ये खूब कहने लगे हैं पुरुष अब। पुरुषों को ये अधिकार मत दीजिए, ऐसा मत होने दीजिए। अध्यात्म बहुत ज़रूरी है और अध्यात्म से बहुत सारी महिलाएँ बचती हैं, ख़ासकर पढ़ी लिखी। क्योंकि उनमें ये धारणा डाल दी गयी है कि धर्म ही उनकी बेड़ी है।

हमारी जो कॉलेज की शिक्षा है न, वो धर्म को महिलाओं की दुर्दशा का कारण बताती है। वो यही बताती है कि महिला इतनी परेशान, दबी हुई इसीलिए रही क्योंकि धर्म ने उसको कर दिया। धर्म ने नहीं करा, विकृत धर्म ने करा। महिला का शोषण विकृत धर्म ने करा। वास्तविक धर्म तो मुक्ति दाता होता है न।

तो भीतरी मुक्ति के लिए अध्यात्म बहुत-बहुत ज़रूरी है। उसको आप विज़्डम लिटरेचर बोल दीजिए, जो भी बोलना है। आपको शास्त्र बोलना अजीब सा लगता है, पुराने ढर्रे का लगता है तो आप विज़्डम लिटरेचर बोल दीजिए, बोध साहित्य बोल दीजिए लेकिन वो चाहिए। वो सब महिलाओं को चाहिए।

प्र३: एक और मैं जोड़ना चाहता हूँ इसमें। जो आज हम देखते हैं कि महिलाओं के लिए आपने कहा कि महिलाओं को बहुत ज़रूरी है। लेकिन सर, इसमें ये जब बात आती है, जो मेरा अपना अवलोकन है, मैं कितने ही परिवारों को जानता हूँ कि जहाँ पर जो महिलाओं का शोषण हो रहा है उसमें जो महिला हैं, जो पुरुष के साथ हैं, उसके परिवार वाले हैं, वो उसमें ज़्यादा अग्रणी रहते हैं बजाय उस घर के पुरुष के अलावा। कि जो उसी घर के हैं, वो ज़्यादा करते हैं। तो शायद वही बात आती है फिर सभी के लिए कि स्त्री और पुरुष जो भी हैं उनको भी चाहिए चेतना। क्योंकि वो शोषण कर रहे है वहाँ पर।

आचार्य: आप यही कह रहे हैं कि ज़्यादा शोषण घर के पुरुषों द्वारा होता है। हाँ! बिलकुल।

प्र३: क्योंकि घर के पुरुष जो शोषण कर रहे हैं, वो उनसे ज़्यादा उस घर की महिला करती हैं। क्योंकि वो अब घर के पुरुष हो गये हैं बजाय वो घर की महिला के। वो अब महिला नहीं रही, घर के पुरुष हो गयीं।

आचार्य: देखिए, ये जो पूरा पैट्रियार्कल सिस्टम है, पितृसत्ता। ये यूँही नहीं चला है। दुनिया की आधी आबादी तो महिलाओं की ही है। अगर ये सिस्टम चला है तो इसलिए चला है क्योंकि इसमें महिलाओं का भी स्वार्थ है। तो पितृसत्तात्मक सत्ता का, व्यवस्था का अर्थ ये नहीं होता कि उसमें बस जो पितृदेव हैं, वही फ़ायदा उठा रहे हैं। उसमें मातृ देवी भी तो फ़ायदा उठा रही हैं और मातृ देवी ने ज़्यादा फ़ायदा उठाया है। इसीलिए पूरी पैट्रियार्की को आगे बढ़ाने में सबसे आगे तो महिलाएँ ही हैं।

आप अक्सर पाओगे कि महिलाओं की मुक्ति के लिए पुरुष ही ज़्यादा संघर्ष करता है और महिला को रोकने में महिला का ज़्यादा हाथ रहता है। अपवाद हैं बिलकुल, कोई इसमें मैं नियम नहीं बता रहा हूँ। तर्क मत करने लगिएगा। तो जब तक महिला नहीं देखेगी कि इसमें जो अपना स्वार्थ देख रही है, उसमें हानि ही है। तब तक वो यही कहेगी कि ये जो व्यवस्था चल रही है, अच्छी ही है। चलने दो इसी सिस्टम को।

इस व्यवस्था में उसको सुरक्षा मिलती है न। वो घर की देवी बन जाती है। आगे का, बाहर का जितना काम है धूल-धक्कड़ का, वो कौन करेगा? पुरुष करेगा। युद्ध लड़ने की ज़िम्मेदारी किसकी? पुरुष की। गटर में उतरने की ज़िम्मेदारी किसकी? दुनिया के ख़तरे के सारे काम करने की ज़िम्मेदारी किसकी? मैं महिला की दृष्टि से जो स्वार्थी महिला है, उसकी दृष्टि से बोल रहा हूँ।

वो कहती है, ‘बाहर के सारे झंझट पुरुष को उठाने दो न।’ घर में हैं, घर का काम कर देते हैं तो घर में सुकून भी तो है। धूप भी नहीं है, धूल भी नहीं है। मुझे मालूम है ये तर्क ठीक नहीं है। मैं ये तर्क ये नहीं बता रहा हूँ कि बहुत बढ़िया तर्क है। मैं बता रहा हूँ ये तर्क दिया गया है महिलाओं की ओर से अज्ञान में।

दुनिया में मनुष्य को जीने के लिए बहुत सारे ख़तरनाक काम करने पड़ते हैं, मेहनत के काम करने पड़ते हैं। महिलाएँ उन सब कामों से बची रही न पैट्रियार्की में, तो ये स्वार्थ है महिला का पैपैट्रियार्की में। मैं कह रहा हूँ ये स्वार्थ ग़लत है। आप बाहर के काम से बच गये हो लेकिन फिर आप अपनी चेतना के उत्थान से भी बच गये हो। क्योंकि जो बाहर निकलकर संघर्ष करेगा, उसी का व्यक्तित्व बाहर से और भीतर से चमकेगा भी।

जो घर में रहेगा, वो भी संघर्ष करता है, पर वो सीमित संघर्ष है। देखो, आप इस बात को मान लो। बार-बार ये तर्क दोगे कि नहीं घर में हम बराबर का संघर्ष करते हैं, तो फिर मुझे कुछ नहीं कहना आपसे। बहुतों का ये तर्क रहता है कि तुम्हें क्या पता घर में कितनी मेहनत करनी होती है। मुझे कुछ फिर कहना ही नहीं। कभी सड़क बनते हुए देखी है? अब आप बोलोगे कि मैं रसोई में जो आँच झेलती हूँ और जो सड़क पर वो मजदूर आँच झेल रहे हैं, वो एक बराबर है तो मैं तो नहीं मानूँगा आपकी बात। देखा है वहाँ कितनी ज़बरदस्त वो आग जल रही होती है? आप बोलो, ‘मेरी कड़ाही की आग और वो आग बराबर है।’ तो अब वो आग अगर पुरुष झेलेगा तो लाभ भी पुरुष ही उठाएगा न।

सेनाओं में अगर पुरुष ही आगे हैं, जान पुरुष दे रहे हैं तो सत्ता भी फिर पुरुष के ही हाथ में है। पुरुष कहेगा, ‘देश को तो मैं ही बचाकर रखता हूँ। तो सत्ता भी मेरे हाथ में होनी चाहिए देश की।’ वो गोली खाता है, वो जान देता है भाई! मज़ाक थोड़े ही है। चीथड़े उड़ते हैं उसके।

गन्दा और ख़तरनाक, दोनों ये काम है। ये जो मैनहोल में, गटर में, सीवेज में उतरना पड़ता है और सफ़ाई करनी पड़ती है। और समाज के लिए बड़ा ज़रूरी काम भी है। पश्चिम में तो मशीनें कर देती हैं। भारत में अभी भी मनुष्य करता है।

मैंने तो नहीं देखा कोई स्त्री ये काम कर रही है। मैं चाहता भी नहीं कोई स्त्री ये काम करे। मैं नहीं चाहता कोई पुरुष भी ये काम करे। मैं चाहता हूँ विकास इतना हो जाए कि ये काम मशीन करे। पर मैं एक बात आपके सामने रख रहा हूँ। जब वो काम पुरुष करता है न तो फिर उस काम के नाते पुरुष को बहुत सारे अधिकार भी मिल जाते हैं। हल कौन चला रहा है? अब नहीं हल चलाता, अब तो ट्रैक्टर है पर फिर भी। तो फिर उपज पर उसको अधिकार भी मिल जाता है।

यही सब देखकर बहुत सारी महिलाओं को लगता है जो सिस्टम चल रहा है, वो बढ़िया है। सारे मेहनत की और ख़तरे के काम अधिकांशत: किसको करने दो? पुरुष को करने दो। तो फिर वो घर में बेबी बन जाती है। अब बेबी बनना सुरक्षा की दृष्टि से तो ठीक है, पर विकास की दृष्टि से बहुत ग़लत है। बेबी का कभी विकास नहीं हो पाता। वो बेबी ही रहती है ज़िन्दगी भर। अस्सी साल की बेबी।

ये व्यवस्था अच्छी नहीं है। तोड़िए इस व्यवस्था को। न स्त्री के लिए अच्छी है, न पुरुष के लिए अच्छी है। और ये व्यवस्था तब तक नहीं टूटेगी जब तक देहभाव रहेगा इसलिए अध्यात्म आवश्यक है। वो आपको देहभाव से मुक्त करता है।

(भजन मंडली द्वारा भजन गया जाता है)

घूँघट के पट खोल रे, तुझे पिया मिलेंगे। घट घट में तेरे साईं बसत है, कटु वचन मत बोले रे। धन जोबन का गर्व न कीजै, झूठा पंच रंग चोल रे। शून्य महल में दिया जलत है, आशा से मत डोल रे। जोग जुगत से रंग महल में, पिया पाये अनमोल रे। कहे कबीर आनन्द भयो है, बाजत अनहद ढोल रे। ~ कबीर साहब

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