प्रश्नकर्ता: सर नमस्ते। सर आपने पीछे एक एक्टिविटी दी थी कि आपकी किसी बात से हम सहमत नहीं हैं तो बताइए। तो मेरी इस बात पर सहमति नहीं बनी — जैसे, मैं गृहिणी हूँ। पर मैं अपना जीवन सत्य के साथ जीती हूँ अधिकतर। तो मज़बूत महसूस करती हूँ अपनेआप को। पर मैं जो बाहर जगत में वर्किंग लेडीज़ (कामकाजी महिलाओं) को देखती हूँ। उन लोगों को भी देखती हूँ कि बहुत दबी हुई ज़िन्दगी या डर-डरकर के, समझौता करके जीते हैं। तो आप कहते हैं कि हर महिला को काम करना चाहिए।
पर मैं कहती हूँ, ‘जो काम करने वाली महिला को देख रही हूँ। मैं अपने से नीचे पाती हूँ उन लोगों को। तो मैं तो नॉन वर्किंग होते हुए भी सत्य के साथ अच्छा जीवन जी रही हूँ। तो मेरी सहमति आपसे इस बात पर नहीं बनी कि हर महिला को जैसे तो मेरा कहना है कि सत्य के साथ अगर आप जी रहे हो, तो इसमें वर्किंग और नॉन वर्किंग का शायद कोई फ़र्क न पड़े।
आचार्य प्रशांत: वर्किंग नहीं होता स्वावलम्बन होता है, स्वावलम्बन। घरवाली भी हो सकता है काम करती हो। वर्किंग माने कामकाजी तो वो भी है। स्वावलम्बन। रही बात काम करने पर भी दबे होने की, तो वो जो बाहर काम करती हैं अगर वो दबी हुई हैं, तो उनसे ज़्यादा तो मैं दबा हुआ हूँ। मैं भी खूब दबा हुआ रहता हूँ, खूब तनाव में रहता हूँ। तो इससे ये थोड़े ही सिद्ध हो जाता है कि जो लोग घर में रहते हैं वो मुझसे श्रेष्ठ हो गयें।
सत्य अर्जित करना पड़ता है। वर्किंग और नॉन वर्किंग की बात नहीं है। स्वावलम्बन समझती है न? बाक़ी आपको ख़ुद देखना है। मैं इसमें क्या बताऊँ। अपने जीवन के जो तथ्य हैं, वो आपको स्वयं ही समझने पड़ेंगे अच्छे से। गृहिणियों का सम्मान है। मैं उसमें बहुत ज़्यादा कुछ बोलूँगा नहीं लेकिन गृहिणी होने का तथ्य क्या है, ये तो आपको ख़ुद ही देखना पड़ेगा अपने जीवन में।




