आप पार्टी-टाइप हैं या पूजा-टाइप? || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी. कानपुर के साथ (2023)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, सर। मैं रूपेश कुमार, आइआइटी कानपुर से हूँ। सर, मेरा प्रश्न था कि भारतीय लोग जानने के प्रति उदासीन क्यों हैं? कि या तो हम लोग किसी भी एक मान्यता को फॉलो करना चाहते हैं। जैसे कि जो लोग कोई भी पूजा-पाठ टाइप या फिर जो भी हमारे घर में हम देखते आऍं हैं या फिर हम वही करना चाहते हैं या फिर हमने किसी नयी विचारधारा या फिर किसी नयी मान्यता या किसी नये व्यक्ति को पूरी तरह फॉलो करने लग जाते हैं, बिना ये जाने कि उसमें कितना सच है और कितना ग़लत। तो हम लोग कुछ भी नया जानने के प्रति उत्सुक क्यों नहीं हैं? और मानने के प्रति क्यों उतना वो रहते हैं?
आचार्य प्रशांत: देखो, नया जानने की तो बात ही तब उठती है न जब पहले ये विनम्रता से स्वीकार किया जाए कि हमें अभी पता नहीं है, हमने जाना नहीं हैं। अगर आपने अपनेआप को आश्वस्त कर लिया है कि आप जान ही गये हैं तो फिर नये जानने की तो कोई बात उठेगी नहीं न। आपका जो प्रश्न है वो विशेषकर धर्म और परम्परा के सम्बन्ध में है क्या?
प्र: नहीं, सर। जैसे कि हम यहाँ आस-पास कुछ लोगों को देखते हैं तो वो या तो पार्टी टाइप होते हैं या फिर पूजा-पाठ टाइप। तो वो लोग एक ही तरह को फॉलो (अनुसरण) किये जाते हैं। कि बिना उस पर किसी भी नयी चीज़ को सोचे समझे बिना।
आचार्य: तो ये दो बताये, एक पार्टी टाइप, एक पूजा-पाठ टाइप। तो पूजा-पाठ वालों से शुरू करो। इनके साथ क्या हुआ है कि इन्होंने अपनेआप को जता लिया है कि जो अन्तिम सत्य है वो इनको पता ही है, क्योंकि इनके पुरखे बहुत महान थे। तो इनके पुरखे इनको सत्य की, जीवन की, ईश्वर की जो भी अवधारणा दे गये हैं और उस अवधारणा को इन्होंने जो भी समझा है। ये उसी को दोहराते रहें तो बिलकुल ठीक है। इनसे पूछोगे तो ये कहेंगे कि जो भी ऊँची-से-ऊँची बात थी वो अतीत में पहले ही कही जा चुकी है। जो भी अन्तिम सत्य खोजा जा सकता था वो खोजा जा चुका है, तो हम अब नया क्या जान लेंगे। आम भाषा में कहें तो नया क्या उखाड़ लेंगे।



