प्रश्न: मनुष्य ‘स्वार्थी’ है या ‘मतलबी’?
उत्तर: तुमने ‘स्वार्थ, मतलब’ के बारे में जानना चाहा है।
अर्थ माने कुछ ऐसा जो तुम्हें लुभावना, प्रिय लगता हो।
(यहां पर) ‘स्व’ माने अहंकार।
स्वार्थ माने वो जो अहंकार को प्यारा लगे।और मतलब माने भी अर्थ।
सत्य मात्र ‘होता है’, और उसका ‘मतलब’ अहंकार करता है। जहां अर्थ, जहां मतलब, वहीँ अहंकार। जहां कोई मतलब नहीं है, उस स्थिति को ‘तथाता’ कहते हैं।
तथाता माने ‘जस का तस’। जैसा है वैसा ही। कोई मतलब नहीं। सत्य ही सत्य रहेगा, अपना कुछ न जोड़ेंगे, स्वयं को बीच में लाएंगे ही नहीं। हम आये नहीं की झूठ आया। सत्य का अर्थ ही है तुम्हारा विगलित, समर्पित हो जाना। बुद्ध द्वारा, और ज़ेन साधना में, तथाता पर बहुत ज़ोर है।
पर इसमें मन बहुत घबराएगा, विद्रोह करेगा। मन को अर्थ चाहिए, मतलब चाहिए। पर अर्थ शब्द है, और शब्द शोर। सत्य शोर में नहीं, मौन में उतरता है।




