हम अकसर प्रतीकों को यह बोलकर ठुकरा देते हैं कि यह सब तो यूँ ही है, आचरण गत बातें है इनमें कुछ रखा नहीं है। उनमें ही बहुत कुछ रखा है। आप मंदिर के बगल से निकल रहे हो और आपके मन में दुनिया भर के अंट-संट विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं, जैसे कि आमतौर पर चलते रहते है मन में, लेकिन मंदिर को देखते ही आप एक क्षण को रुके और आपने नमस्कार कर लिया मंदिर को, तो जो विचारों का पूरा बहाव है, जो पूरी शृंखला है वह टूट जाती है, क्योंकि वह एक लगातार बहने वाला निरंतर प्रवाह था न, एक निरंतरता थी।
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आचार्य प्रशान्त: जो कुछ भी ज़िन्दगी में क़ीमती है, इज़्ज़त के लायक़ है, उसको अगर तुम क़ीमत देते हो, आदर देते हो तो उसका तुम कोई बहुत भला नहीं कर देते हो, उसका कोई हित नहीं हो जाता; क्योंकि वह ऊँचा है तभी तो क़ीमती है, जो पहले से ऊँचा है उसे हमसे क्या चाहिए? लेकिन हम उसे इज़्ज़त देते हैं, क़ीमत देते हैं, लगातार याद रखते हैं तो हमारा ज़रूर भला हो जाता है। और वह जो याद रखना है, वह ऐसी चीज़ नहीं होती कि किसी ख़ास मौके पर कर ली गयी।
सारी धार्मिकता, आध्यात्मिकता, बुद्धि, के केन्द्र में एक बात होती है सतत सुरति, कॉन्स्टेंट रिमेंम्बरेंस। लगातार याद रखना और लगातार का मतलब है तब भी याद रखना और तभी ही ज़्यादा याद रखना जब दूसरी चीज़ें खींच रही हों, आकर्षित कर रही हों। मन कहीं और को भाग रहा है तब याद रखना कि क्या क़ीमती है।
इसीलिए भारत में प्रतीकों की, रिवाज़ों की, रिचुअल्स की बड़ी क़ीमत रही है। हम अकसर उनको यह बोलकर ठुकरा देते हैं कि यह सब तो यूँ ही है, आचरण गत बातें है इनमें कुछ रखा नहीं है। उनमें ही बहुत कुछ रखा है। आप मंदिर के बगल से निकल रहे हो और आपके मन में दुनिया भर के अंट-संट विचार उमड़-घुमड़ रहे हैं, जैसे कि आमतौर पर चलते रहते है मन में, लेकिन मंदिर को देखते ही आप एक क्षण को रुके और आपने नमस्कार कर लिया मंदिर को, तो जो विचारों का पूरा बहाव है, जो पूरी शृंखला है वह टूट जाती है, क्योंकि वह एक लगातार बहने वाला निरंतर प्रवाह था न, एक निरंतरता थी।


![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
