
प्रश्नकर्ता: रानी लक्ष्मी इतना कैसे लड़ी? लड़ती गई, लड़ती गई, और बाद में हार कैसे गई?
आचार्य प्रशांत: लड़ती गई क्योंकि उन्होंने ख़याल नहीं किया कि और लोग क्या बोल रहे हैं। हार इसलिए गई क्योंकि जिनका ख़याल नहीं किया, फिर उन्होंने समर्थन नहीं किया। ये वाली समझ में आई बात? हम रानी लक्ष्मीबाई को इसलिए नहीं याद करते कि वो हार गई, हम इसलिए याद करते हैं कि वो लड़ गई। और वो लड़ गई क्योंकि उन्होंने बहुत नहीं सोचा कि दूसरे लोग क्या सोचेंगे।
उस समय पर, बेटा, औरतें लड़ाई करने नहीं उतरती थीं, और ख़ासकर माएँ तो बिल्कुल नहीं उतरती थीं। और वो माँ, जिसके पास छोटा बच्चा हो, वो तो और न आए। और वो औरत, जो अभी-अभी विधवा हुई हो, वह तो एकदम ही न आए। और ऐसे के ख़िलाफ़ तो बिल्कुल ही न आए, जिसके ख़िलाफ़ जीतने की संभावना ही बहुत कम हो।
हम इसलिए लक्ष्मीबाई को याद करते हैं, यहाँ पर उनका गौरव है। बोलीं, सारी स्थितियाँ मेरे प्रतिकूल हैं। सोसाइटी तो छोड़ दो, मेरी आइडेंटिटी ही वर्जित करती है मुझे लड़ने से। मैं औरत हूँ, मैं विधवा हूँ, मैं माँ हूँ। मेरी आइडेंटिटी ही कहती है कि तुझे लड़ना-वड़ना नहीं चाहिए। और सोसाइटी क्या बोलती है? "छोड़ो न, ये सब क्या बेकार की बात।"
और सामने ये खड़े हुए हैं, ये बड़े-बड़े अंग्रेज अपनी ये सब लेकर के और उन्होंने कह रखा है कि आप इतना अलग हो जाइए। वो तो रानी के साथ संधि भी करने को तैयार थे, बोल रहे, "आपको इतना पैसा वग़ैरह दे देंगे। आपकी ज़िंदगी मस्त चलेगी।” वो बोलीं, "नहीं, मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी। मैं नहीं दूँगी।"
हार क्यों गई? क्योंकि, बेटा, बाहर की दुनिया में जीतने के लिए ज़रूरी होता है कि दूसरे भी सपोर्ट करें। अगर श्रीकृष्ण होते, अर्जुन होते और गीता होती लेकिन सेना नहीं होती तो अर्जुन नहीं जीतते। अर्जुन नहीं जीतते। तो जिस वजह से रानी लक्ष्मीबाई की महानता है, उसी वजह से फिर उन्हें हार भी झेलनी पड़ी। महानता किसमें है? कि किसी का ख़याल नहीं किया। बोलीं, "मुझे जो सही लग रहा है, वो करूँगी। बच्चे को पीठ पर बाँध के लड़ूँगी। लड़ूँगी, मैं नहीं छोड़ती। मुझे इसमें अन्याय दिखाई दे रहा है। मैं नहीं छोड़ दूँगी।" यह चीज़ उनको महान बनाती है। महान बन गईं। लेकिन उस समय जो समाज ऐसा था, और जो राजा-रजवाड़े थे ऐसे, उन्होंने ज़्यादातर ने समर्थन नहीं किया बेटा।
1757 में अंग्रेज़ों की कहानी शुरू होती है। और जब आप 1857 में भी आ जाते हो, तो पाते हो कि ब्रिटिश जीत अभी भी इसलिए रहे थे क्योंकि उन्हें बहुत सारी भारतीय रियासतों का समर्थन हासिल था। तो भारतीय कह रहे थे, "हम अपने ही लोगों का समर्थन नहीं करेंगे। हम किसका कर देंगे? अंग्रेज़ों का कर देंगे।" क्यों कर देंगे? क्योंकि हमारे क्षुद्र स्वार्थ हैं; क्योंकि हमारी निष्ठा सत्य, मुक्ति, आज़ादी की तरफ़ नहीं है। हमारी निष्ठा हमारे संकीर्ण स्वार्थों के प्रति है।
बहुत सारे तो सीधे-सीधे ख़रीदे गए। कुछ को धमका दिया गया, कुछ को ख़रीद लिया गया, और कुछ अपने पड़ोसी राज्यों से इतनी जलन करते थे कि बोले, "अभी पड़ोसी राज्य को जलाने के लिए, मारने के लिए, गिराने के लिए, अगर अंग्रेज़ों के सामने सर झुकाना पड़े, तो ठीक है।" निष्ठा किसी ऊँचाई की तरफ़ थी ही नहीं। निष्ठा किसकी तरफ़ है? अपने जो अहंकार के छोटे-छोटे सरोकार हैं, उनकी तरफ़ निष्ठा है। और यह बात कोई सिर्फ़ राजा में नहीं है, याद रखिएगा। मैंने कहा था न, पलटकर बोलना चाहिए। पलटकर बोलो, क्या? "यथा प्रजा तथा राजा।"
इंसान को सत्य के प्रति निष्ठा तो धर्म सिखाता है। जब धर्म की जगह लोकधर्म ले लेगा, जब भीतर ही गड़बड़ हो जाएगी, तो वो भीतरी गड़बड़ बाहर हर तरीके से दिखाई देती है।
जो आदमी भीतर अहंकार के पराधीन हो गया, वह बाहर भी अब किसी बाहरी ताक़त के पराधीन होकर रहेगा।
तुम्हें सीखना है वो क्या? जो चीज़ सचमुच मेरी है, वो मैं किसी को नहीं दूँगी। कोई मेरे साथ आए चाहे नहीं आए, चाहे मुझे कोई भी क़ीमत चुकानी पड़े। वो बेचारी चाहती, वो भी लंबा जी सकती थी। बहुत कम उम्र थी उनकी, जान दे दी। कोई भी क़ीमत चुकानी पड़े, जो चीज़ मुझे ठीक लगती है, मैं वही करूँगी। जीत मिले चाहे हार मिले। दुनिया यही तो धमकाएगी कि हरा देंगे, हरा देंगे। तो हारना मंज़ूर है, झूठ के सामने झुकना मंज़ूर नहीं है। अन्याय झेलना मंज़ूर नहीं है।
अभी ये सब बहुत कुछ बड़ी-बड़ी बातें, मोटे-मोटे शब्द हो गए। अभी आप धीरे-धीरे बड़े होओगे। जो हमारी आज बात हुई है न, इसको और सुनना। बड़े होते-होते सुनना। हर छह महीने में सुनना। ये काम आपकी मम्मी कराएँगी आपको। कहाँ हैं? हाथ उठाइए, माताजी। हाँ। क्योंकि अभी तो जो मैंने बोला है, वो बेचारे को कितना समझ में आया होगा। बेटा, इतना समझ में आया है कि जो चीज़ सही है, वो करनी है। इतना आया समझ में? जो चीज़ सही है, वो ज़रूर करनी है। भले कोई कितना भी डराए, डरना नहीं है। ठीक है?
मम्मी बार-बार ये वीडियो दिखाएँगी आपको। मम्मी ने नोट्स भी बना लिए हैं, मम्मी सब नोट्स भी पढ़ाएँगी आपको। ठीक है? बाक़ी और कोई खड़ा हो कि नहीं खड़ा हो, अगर सही लड़ाई लड़ोगी ज़िंदगी में, तो एक आदमी ज़रूर खड़ा होगा तुम्हारे साथ, पक्का। जब तक तुम बड़ी होगी, मैं एकदम बूढ़ा हो चुका होऊँगा। लेकिन फिर भी तुम्हें यह कहने को होगा कि तुम्हारे देश में एक तो मर्द है, बूढ़ा ही सही।
विद यू इन द राइट बैटल, ऑलवेज़।