आचार्य प्रशांत: इस जीवनकाल में न जाने किसके-किसके हाथों लूट रहे हो और भूल ही गये हो कि असली बाप कौन है, यहाँ किसी के हाथों लुटने की, यहाँ किसी से दबने की ज़रूरत है क्या, बताओ? और उसने (परमात्मा ने) पूरी व्यवस्था बना रखी है कि अगर तुम न पसन्द करो लुटना, तो बस बता देना तुम्हें लुटने की कोई ज़रूरत नहीं है।
एंटी रैगिंग स्क्वाड (दुर्व्यवहार रोधक दस्ता) होते हैं, तुम्हें बस जाकर एक बार बताना है कि यहाँ पर हमारे साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। लेकिन तुम स्वेच्छा से चुनाव करे हो कि हमें तो बेइज़्ज़त होकर ही जीना है। क्यों? क्योंकि तुम अपने असली बाप को भूल गये, असली मालिक को भूल गये।
तो असली मालिक ने सहायता के लिए जो हाथ बढ़ा भी रखा है, तुम्हें वो दिखाई नहीं देता, तुम उसे स्वीकार नहीं करते। अगर कोई छात्र ये तय कर ले कि उसे रैगिंग नहीं करवानी, तो क्या हो सकती है उसकी? पुलिस से लेकर के संस्थान के प्रशासन तक, प्रबन्धन तक सब आ जाऍंगे उसकी मदद को कि नहीं आ जाएँगे; बोलो?
तो रैगिंग करवाना, सब सेकंड ईयर (द्वितीय वर्ष) के छोरों को अपना बाप बना लेना एक चुनाव ही है न, ये चुनाव किया तुमने। तुम ये चुनाव न करते तो तुम्हें बे-आबरू भी नहीं होना पड़ता न; पर ये चुनाव उन्होंने किया, आदमी वो चुनाव जीवन भर करता है।
प्रश्नकर्ता: किसी-न-किसी अर्थ में तो रोज़ हम यही कर रहे हैं?
आचार्य: रोज़ यही कर रहे हो, तुम ऐसों के सामने लुट रहे हो, पिट रहे हो जिनके सामने लुटने-पिटने की ज़रूरत नहीं। और उनके सामने तुम्हें इसलिए लुटना-पिटना पड़ रहा है, क्योंकि तुम अपने बाप के नहीं हो जो तुम्हारा असली सहायक है, जो तुम्हारा असली पिता है, तुम उसकी इज़्ज़त ही नहीं करते। इसीलिए फिर दुनिया के सामने डरे-डरे घूमते हो, कोई भी चीज़ तुम्हें डरा जाती है। अभी यहाँ से एक मछली उछल पड़े, देखना पाँच-सात बद-बदाकर गिरोगे। और इतनी बड़ी कोई मछली, वो भी पानी से बाहर, पानी से बाहर मछली उसमें क्या बल?




