
द सॉन्ग ऑफ द टवेल्व डिसेप्शंस। वर्ल्डली अफेयर्स आर ऑल डिसेप्टिव; सो आई सीक द ट्रुथ डिवाइन।
"संसार के सभी क्रियाकलाप तो मायारूपी हैं, अतः मैं सत्य की शरण में जाता हूँ।"
आचार्य प्रशांत: शुरुआत हमेशा वहीं से होती है—जो तुमने कहा न मैं जानवर हूँ—ये जानने से। शुरुआत वहीं…


“फॉलो योर पैशन” तभी सार्थक है, जब वह सचमुच आपका अपना हो। अक्सर जिसे हम अपनी पसंद, पैशन या इच्छा मानते हैं, वह समाज, परिवार, संस्कार और परिस्थितियों से भीतर बैठा हुआ प्रभाव होता है। वास्तविक स्वतंत्रता न बाहरी दबाव में जीने में है, न भीतर की कंडीशनिंग का गुलाम बनने में। आत्मनिरीक्षण से सही कर्म की स्पष्टता आती है और बिना बिके, बिना डरे एक गरिमापूर्ण जीवन जिया जा सकता है।

स्वतंत्रता दिवस को केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मावलोकन और सतर्कता दिवस की तरह देखने की आवश्यकता है। भारत की परतंत्रता के पीछे रहे आंतरिक कारणों को समझना ज़रूरी है, क्योंकि राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद लोकधर्म, अंधविश्वास, जातिगत विभाजन, ज्ञान-विज्ञान की उपेक्षा, परंपरागत जड़ता और आत्मबल की कमी आज भी मौजूद हैं। वास्तविक देशभक्ति इन बंधनों को पहचानकर ज्ञान, आत्मनिर्भरता, वैज्ञानिक दृष्टि और जागरूक नागरिकता विकसित करने में है।

लोकतंत्र, गणतंत्र और स्वतंत्रता केवल संविधान में लिखे शब्द नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की चेतना पर निर्भर हैं। वास्तविक स्वतंत्रता मनमानी करने की छूट नहीं, बल्कि भीतर घुसे भय, लालच, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और बाहरी प्रभावों से मुक्ति है। जब नागरिक अपने ही विचारों और मान्यताओं की जाँच नहीं करता, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र और संप्रभुता खोखली बन सकती है।

अकेलापन बाहर लोगों की कमी से नहीं, भीतर के अधूरेपन की मान्यता से पैदा होता है। जब व्यक्ति मान लेता है कि उसे पूरा होने के लिए किसी व्यक्ति, वस्तु या उपलब्धि की ज़रूरत है, तब वह लगातार खोज और निर्भरता में भटकता है। यह भावना सामाजिक मान्यताओं और बाज़ार द्वारा भी पोषित होती है। समाधान बाहर कुछ जोड़ने में नहीं, बल्कि इस झूठी धारणा को पहचानने में है कि हम मूलतः अधूरे हैं। आत्मज्ञान के साथ यह भ्रम टूटता है और अकेलापन स्वतः समाप्त होने लगता है।

मजबूरी एक झूठ है जिसे अहंकार स्वार्थ छुपाने के लिए गढ़ता है। जो दबता है वो किसी सौदे में दब रहा है। माँ-बाप की धमकी, समाज का दबाव - ये सब तभी काम करते हैं जब भीतर डर हो और डर तभी होता है जब कोई चीज़ पानी हो। आज़ादी के लिए आखिरी कीमत भी चुकाने की तैयारी ही असली जीवन है।

कोई रिश्ता गड़बड़ है, यह जानने के लिए बस यह देख लो कि क्या उसमें मुखौटे पहनने पड़ते हैं। और यदि मुखौटे उतारने पर रिश्ता टूटने लगे, तो समझ लीजिए वह रिश्ता वास्तविक नहीं था। उसने आपसे रिश्ता बनाया, उसने आपकी छवि से रिश्ता बनाया है। और आपकी छवि आप हैं नहीं, तो माने, उसका आपसे कोई रिश्ता है नहीं। फिर तो डर में ही जीना पड़ेगा, क्योंकि छवियाँ काल्पनिक होती हैं। जैसे ही यथार्थ आकर एक धक्का मारेगा, सारी छवियाँ टूट जाएँगी। इससे बेहतर यही है कि बेबाकी से सच में जिएं ।

तुम ट्रेन पकड़ने जा रहे हो और तुम दौड़ रहे हो। बीच-बीच में रुक जाते हो और मोटिवेशनल वीडियो देखते हो? ऐसा होता है क्या? वहाँ तुम्हें मोटिवेशन नहीं चाहिए होता, वहाँ तुम्हें घड़ी चाहिए होती है। तथ्य काफ़ी है। मोटिवेशन उनको चाहिए, जो कोई काम बिल्कुल अंधे होकर कर रहे हैं। भीतर से कोई ललक है ही नहीं, लेकिन डर के मारे वो काम करना भी पड़ रहा है। मोटिवेट होकर भी क्या होगा? तुमने काम ही ग़लत उठा लिया है, क्योंकि काम अगर सही होता है, तो काम ही जान बन जाता है। फिर मोटिवेशन नहीं चाहिए होता।

बहुत लोग होते हैं, जिनको दूसरों को तकलीफ़ देने में खुशी मिलती है। बहुत लोग हैं, जिन्हें जानवरों का गला काट करके खाने में खुशी मिलती है। वो कहेंगे, “मैं तो वही करूँगा, जिसमें खुशी मिलती है।” पहले तो यह सीखना पड़ेगा न कि यह जो मेरा खुशी का सिद्धांत है, यह आया कहाँ से? आज की समस्या है, ब्लाइंड फ़्रीडम; जहाँ आदमी बाहर वाली तो किसी ताक़त का ग़ुलाम नहीं है, पर भीतरी ताक़त का ग़ुलाम हो गया है। और वो भीतरी ताक़त क्या है? अहंकार।

मैंने कहा है कि जिसको छोड़ने में तुम्हें देर लग रही हो, उसको पूरी तरह छूटने का इंतज़ार मत करो। उसको लिए-लिए भागो। यह थोड़ी कहा है कि उसको बाँध कर भागो। आप मान लीजिए, शरीर पर बहुत सारा फैट ढोए हुए हैं, उसको लिए-लिए ही तो भागोगे। लेकिन भागने की प्रक्रिया में क्या होगा? वो गलेगा। मैं तब तक इंतज़ार करूँगी जब तक सब ठीक… नहीं, नहीं, नहीं। जो भी तुम्हारी बुरी हालत है, जैसी भी है, अभी दुर्बल हालत है, शुरू अभी करो। कम ऐज़ यू आर एंड रन ऐज़ यू आर।

आदमी कहता है, “मैं ठीक हूँ। बस हालात कुछ ऐसे बने कि मैं फिसल गया।” ग्लानि सिद्ध करती है कि तुम आदमी बढ़िया हो; बस संयोग से असफल रह गए। तुम्हारी ग्लानि ये थोड़ी है कि तुम आदमी ही गड़बड़ हो। तुम्हारा केंद्र ही गड़बड़ है। तुम्हारी ग्लानि तो धोखे से मिस्टेक वाली होती है। वास्तविक ग्लानि तो अग्नि होती है। तुम बचोगे ही नहीं जैसे हो, अगर ग्लानि हो जाए तो।

आपका कहना है कि “सब ठीक है, कुछ भी बदलने की ज़रूरत क्या है?” और मैं कह रहा हूँ, कुछ भी ठीक नहीं है, सब कुछ बदलने की ज़रूरत है। तुम्हें तुम्हारी मंज़िल मिल गई है, और मैं कहता हूँ कि मैं जिस यात्रा पर हूँ, उसमें मंज़िल अनंत है। मुझे पता है, मुझे मरते दम तक मंज़िल नहीं मिलनी। मेरा काम उनके लिए है, जिनकी असंतुष्टि रुकने का नाम नहीं ले रही, जिनके दिल में आग लगी हुई है। मुझे एक पल का चैन नहीं, और तुम्हें कहीं बेचैनी नहीं। तुम मेरे साथ कैसे हो? बताओ।

कृपा प्रदर्शित करने का तरीका है — युद्ध में निष्ठुरता। जो धर्म-विरुद्ध जा रहा हो, उसके प्रति सबसे बड़ी कृपा यही है कि उसको रोक दिया जाए। अगर अचेत व्यक्तियों को तुमने निष्ठुर होकर रोका नहीं, तो तुम उन्हें परोक्ष रूप से और ज़्यादा अधर्म करने के लिए प्रोत्साहित ही कर रहे हो। याद रहे कि किसी व्यक्ति के प्रति तुम्हारी आसक्ति, सत्य के प्रति तुम्हारे समर्पण से बड़ी न हो जाए।

आचार्य प्रशांत: तो आज हम दुर्गा सप्तशती के तीसरे चरित्र में प्रवेश कर रहे हैं और पिछले चरित्र का और पिछले अध्याय का अन्त किसके वध पर हुआ था?
श्रोता: महिषासुर।
आचार्य प्रशांत: महिषासुर के वध पर हुआ था, तो महिषासुर का वध हो गया था और देवता लोग प्रसन्न…

प्रश्नकर्ता: मेरे अतीत में मुझ पर हुए दुष्कर्म मुझे चैन से जीने नहीं दे रहे हैं। मानो मैं अपने बचपन में ही जिए जा रही हूँ। वही खयाल, वही सपने। मुझे उस भयानक अतीत से पूरी तरह बाहर आना है। कैसे होगा?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो समझना होगा कि…

जब जीवन को चुनौती दिए बिना स्वयं को स्वतंत्र मान लिया जाता है, तो वह अध्यात्म नहीं, पलायन होता है। सच्ची ज़िंदगी जीना माने टूटना — 'आग का दरिया है, डूबकर जाना है।' अध्यात्म बड़े योद्धाओं के लिए होता है। बड़ी लड़ाई उठाइए, तब गीता को दिल से महसूस कर पाएँगे। आप कितने स्वतंत्र हो पता तो तब चलेगा न जब आप बेड़ियों को चुनौती दोगे। जो चुनौती नहीं दे रहा है उसे पता क्या!

सेवा की शर्त है: समझदारी। जब कोई आए और बड़ी उत्सुकता दिखाए कि आपकी सेवा करनी है, तो इतना ज़रूर देख लेना कि उसने अपनी सेवा कर ली है या नहीं। जो अपना हितैषी नहीं हो पाया, वो तुम्हारा हितैषी क्या ख़ाक होगा। और जब तुम्हारे मन में ये भाव उठे कि, "मुझे किसी की सेवा करनी है," तो स्वयं से ये पूछ लेना, "क्या मैं इस क़ाबिल हूँ? अपनी सेवा कर ली?"

मात्र विशिष्ट संगीत है, जो बंधनों को काटता है। अधिकांशतः संगीत उत्तेजक ही होता है, क्योंकि वो तुम्हें नए तरीक़े के अनुभव दे जाता है। जबकि शास्त्रीय संगीत अलग आयाम का होता है, इसीलिए वो बाज़ारू नहीं होता। संगीत का सबसे सुंदर और प्रभावी मेल होता है — शास्त्रीय संगीत पर संतों के वचन। इनके अलावा, बाकी सबकुछ जो संगीत के नाम पर चल रहा है, वो तुम्हारे आंतरिक कोलाहल को ही बढ़ाएगा।

आस्तिकता का अर्थ — वेदान्त के प्रति सम्मान। बुद्ध वेदान्त की जितनी गहराई तक पहुँचे थे, उतनी गहराई तक उस समय में कोई ऋषि-मुनि नहीं था जिसको वेदान्त समझ में आता हो। असली वेदान्ती वही हैं। वेद का मर्म कर्मकांड नहीं, वेदान्त है और वेदान्त को सबसे आगे बुद्ध ही बढ़ा रहे थे। वेदान्त अकेला है जो अमर है। अगर आप वेद को कर्मकांड बना दोगे, तो आज की पीढ़ी वेद को भुलाती जाएगी — यह सबसे बड़ा ख़तरा है।

गीता का संबंध हमारे जीवन से है, सिर्फ़ हमारे जीवन से ही है और किसी चीज़ से नहीं है। अध्यात्म, दर्शन — ये सब इसलिए नहीं होते कि आपका ज्ञान बढ़ जाए। ये इसलिए होते हैं ताकि आपका जीवन सुधर जाए। ये श्लोक आपको कुछ बता रहा है, आपके संबंधों के बारे में। पलायन कर लेना आसान होता है। अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए अपने कर्तव्यों की बलि चढ़ा देना आसान होता है, और ये सब करते हैं हम लोग अपनी-अपनी ज़िन्दगी में।

जिस किसी में सत्य के प्रति अर्जुन जैसी प्रगाढ़ निष्ठा होगी, उसे श्रीकृष्ण मिल ही जाएँगे। तुम्हारे भीतर वो प्रश्न उठें तो सही, जो अर्जुन में उठते थे। केन्द्रीय बात है मुक्ति और बोध की — वो अगर है, तो फिर कुछ-न-कुछ हो ही जाएगा। जिसे चाहिए, उसे मिल ही जाता है, चाह मूल है। हर मार्ग पर तुम्हें अपनी मुमुक्षा का, अपनी आतुरता का परिचय देना ही पड़ता है — उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

‘अप्प दीपो भव’ — ‘अपने प्रकाश स्वयं बनो’ — यह एक बहुमूल्य वक्तव्य है, लेकिन आख़िरी है। उससे पहले बड़ी साधना करनी पड़ती है। ‘कोई गुरु आवश्यक नहीं है’, यह जानने के लिए भी कोई गुरु चाहिए। जब पूरी साधना, पूरी दीक्षा हो जाए और शिष्य की विदाई का समय आए तभी गुरु को कहना चाहिए — ‘अप्प दीपो भव’। और तभी शिष्य के कान में ये शब्द पड़ने चाहिए। भूलना नहीं, ये ‘आख़िरी’ शब्द हैं।

मैं ज़िन्दा हूँ और मैं अभी दुख में हूँ, ये दुख कैसे हटाया जाए — धर्म इसका विज्ञान है। मरने के बाद कोई जीवन होता है (आफ्टर लाइफ) — उससे धर्म का कोई रिश्ता नहीं है। इतना तो ज्ञानियों ने चेताया है कि “हीरा जनम अमोल है, कौड़ी बदले जाय।” तो जब तक जीवित हो, तब तक मुक्ति मिल सकती है — उसके बाद कुछ नहीं है।

प्रश्नकर्ता१: नमस्ते सर। सर, बकरीद आने वाली है तो कल ही मेरे दोस्तों से मेरी बात हो रही थी व्हाट्सएप पर। तो उन्हें मैंने बोला कि भई इस बकरीद पर आप बकरा मत काटना — वो हर बकरीद पर काटते हैं।
तो उन्होंने मुझे सीधा ये बोला कि भाई, हम…

एक-एक पल को सार्थक उद्यम से भर दो। आदमी का दुख इसी में है कि वह सही काम नहीं करता, इसीलिए उसे दुखी होने के लिए खाली वक़्त बहुत मिल जाता है। जहाँ भी हो, जिस स्थिति में हो — जो तुम्हें शांति की ओर ले जाता है, वो करने योग्य है, और जिस भी वजह से जीवन में बंधन है, वो लड़ने योग्य है। जीवन वैसे ही बहुत छोटा-सा है। उसमें तुम्हारे पास इतना समय तो हो ही नहीं सकता कि खाली छोड़ दो।

बुद्ध ने जितना काम किया, उतना बहुत कम लोग ही कर पाए। उनके आंतरिक ज्ञान को तो एक तरफ़ रखो — जो उन्होंने भौतिक तल पर भी कर दिखाया, वह उस समय का बड़े-से-बड़ा आश्चर्य था। इतना बड़ा संघ उन्होंने खड़ा कर दिया था और उसकी व्यवस्था चलाते थे। बुद्ध एक तरह से उसके सीईओ थे। उसके बहुत विस्तृत और सूक्ष्म नियम-क़ायदे थे, जो बुद्ध ने स्वयं तय किए थे — जैसे आज की किसी भी संस्था में होते हैं। बड़े-से-बड़े वेदांतियों में महात्मा बुद्ध का नाम लिया जाना चाहिए।

भीतर से लड़की सिकुड़ जाती है। उसकी जैसे पूरी चेतना ही संकीर्ण हो गई हो। डर आ जाता है उसके भीतर। छुटपन आ जाता है बहुत तरीके का। वो बड़ी बातें अब सोचने में लगभग असमर्थ हो जाती है। भई जिसको अभी अपने घर का ही नहीं पता वो और कौन सी बड़ी बात सोचे? जिसको अभी यही नहीं पता कि इतनी बड़ी चीज भविष्य में मेरे साथ होनी क्या है कि मैं कहाँ जाकर पढ़ने वाली हूँ। वो और कौन सी बड़ी बात सोचेगी? उसके लिए तो यही बहुत बड़ा मुद्दा है जो खाए जाता है। कि आसपास के लोग इनकी उपेक्षा इनके व्यवहार का 'इनडिफरेंस' और जिसके यहाँ जाना है। वो होगा कौन?

डॉ. अंबेडकर के काम का कैनवस बड़ा विस्तृत है। वो दिल से कोई राजनीतिक नहीं थे — खरे इंसान थे, दो टूक बात करने वाले। उनकी शुरुआत अर्थशास्त्र से हुई, फिर एडमिनिस्ट्रेशन, एकेडमिक्स, लीगल प्रैक्टिस, इन्वेस्टमेंट कंसल्टिंग — राजनीति में आने से पहले उन्होंने सारे द्वार खटखटाए हैं। अंबेडकर की प्राथमिक लड़ाई धार्मिक रूढ़िवादिता के खिलाफ थी। फिर दलितों, महिलाओं, गरीबों, युवाओं के लिए काम करना — उसी लड़ाई के अलग-अलग मोर्चे हैं।

भीतर फौलाद तभी आता है जब जीवन फौलाद से टकराता है। जब तक सामने कोई बड़ी समस्या नहीं होगी, तुम्हारे भीतर ताकत बस सोई रहेगी, जगेगी नहीं। समस्या आविष्कृत नहीं करनी है। समस्याएँ तो होती ही हैं, हम उनसे मुँह चुराते हैं क्योंकि पता होता है कि समस्याओं का सामना करने का दम नहीं है। दम विकसित करना हो तो जिन समस्याओं से मुँह चुराते रहे हो, उनसे जूझ जाओ। मार पड़ेगी, चोट लगेगी, दर्द होगा, लेकिन ताकत विकसित हो जाएगी।

डिमोटिवेट इसीलिए हो जाते हैं क्योंकि काम चुना ही ऐसा था, जिसको भीतर से हम इज़्ज़त नहीं देते। किसी मजबूरी में चुन लिया। बेबसी और मजबूरी की भावना से शुरू किए गए काम में खीझ और चिढ़ होती है। अगर काम हृदय से चुना है, तो वो काम ज़िन्दगी भर भी पूरा न हो, तो भी आप शिकायत नहीं कर पाएँगे। अगर वाकई कुछ कर रहे हो, तो करो ही तभी, जब वो काम करने लायक हो। इसी को प्यार कहते हैं।

हम अकेले होते ही नहीं हैं क्योंकि हमारे दिमाग में घर, दफ़्तर, बाज़ार और अतीत की हजार आवाज़ें बोल रही होती हैं, और वो हमें चैन से जीने नहीं देतीं। अकेलापन आध्यात्म में उच्चतम अवस्था होती है। जब भी लगे कि बहुत सूनापन है, तो देख लो कि क्या है जो आकर्षित कर रहा है, और मिल नहीं रहा। जो तुम्हारे दिमाग को खाली करता हो, साफ़ करता हो, वही कीमती चीज़ है। अगर दिमाग साफ़ है, तो अकेलापन नहीं सताएगा।

स्त्री को ये अनुमति ही नहीं दी गई कि वह ये सोच भी पाए कि पुरुष के बिना जीवन हो सकता है। इससे बड़ा दुश्मन किसी स्त्री का नहीं हो सकता, ये जो भाव है — "I need a man in my life," ये सब छवियाँ हैं जो आपके भीतर डाली गई हैं। जीवन को किसी सार्थक उद्देश्य में डालिए। अपने आप में पर्याप्त रहिए, उसके बाद जो रिश्ता बनता है, उस रिश्ते में प्रेम की खुशबू होती है।

अकेलेपन से हमें डर लगता है क्योंकि हमें जो कुछ भी मिला है, वह दूसरों से ही मिला है। नाम, करियर, प्रेम, विवाह, धर्म—इन सबकी परिभाषा दूसरों से ही मिली है। इसलिए जब ये ‘दूसरे’ ज़िंदगी से दूर हो जाते हैं, तब हमें गहरा डर लगता है। जिसने खुद को जाना है, जो कहता है, "दूसरों के अलावा भी मेरा कुछ है, जो किसी ने मुझे दिया नहीं और कोई मुझसे छीन नहीं सकता," बस उसी को अकेलेपन से डर नहीं लगेगा।

जीवन को सँभालकर रखो तब तक, जब तक मुक्ति नहीं मिल जाती; लेकिन जीवन को सँभालने का उद्देश्य जीवन को लंबा ही करना कभी नहीं हो सकता। जीवन का उद्देश्य जीवन की लंबाई नहीं है; जीवन का उद्देश्य जीवन से मुक्ति है।

मेडिटेशन "करा" नहीं, "जीया" जाता है। "करने" वाला मेडिटेशन तो झुनझुना है, कि गए और तीस मिनट मेडिटेशन करके आ गए। जो तुम्हारी ज़िंदगी चल रही है, उसी में देखो कि तुम्हारे संदर्भ तथा संबंध में ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य क्या हो सकता है। अपने बंधन पहचानो और देखो कि उनके कारण कितना दुख है। उसे मिटाना ही लक्ष्य बनेगा तुम्हारा। और फिर उसकी प्राप्ति के लिए पूरे जीवन को झोंक दो, यही ध्यान है।

मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है लेकिन स्वभाव में जीना है या नहीं जीना — ये तुम्हारा चुनाव है। आवश्यक नहीं है कि सब मुक्ति को चुनें। मुक्ति स्वभाव है इसीलिए सदा उपलब्ध है पर तुम उसको चुनोगे ही, ये कोई आवश्यक नहीं है। तुम कुछ और भी चुन सकते हो। ये इंसान पैदा होने की विडंबना है। जो इंसान पैदा हुआ है उसको दुर्भाग्यवश ये विकल्प मिला हुआ है कि स्वभाव में चाहे तो जिए और न चाहे तो न जिए।

प्रश्नकर्ता: बार-बार कृष्णमूर्ति साहब ये कहते हैं कि कोई गुरु की आवश्यकता नहीं है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, क्योंकि सब अपना ही है, ज़िम्मेदारी सारी अपनी है, तो बाहर वाले का फिर नाम भी लेने की तकलीफ़ क्यों करनी है। और जो गुरु है वह सर्वप्रथम आंतरिक है। मैं कह रहा…

जो जगेगा, वही रोएगा क्योंकि संसार बड़ी पीड़ा में है। और जो जगता है, संसार की पीड़ा अपने ऊपर ले लेता है। संतों का रोना संत की करुणा की अभिव्यक्ति है। वो तुम्हारे लिए रोते हैं, वो अपने लिए नहीं रोते। दस लोग सो रहे हैं और घर में आग लग गई है। उन दस में से एक जगा हुआ है, तनाव किसे रहेगा? एक जगे हुए आदमी को ना! जो जग जाता है, वह शिव की तरह संसार के विष को ग्रहण करता है।

प्रश्नकर्ता: मन में एक खालीपन हर समय बना रहता है, और ये गहरा होता जा रहा है। अधिकतर सामान्य कामों में स्मृति रहती है, जीवन के सुख-दुख, उतार-चढ़ाव असर नहीं करते, और ऐसा लगता नहीं कि इस अवस्था के लिए कुछ अलग प्रयास किया था। आचार्य जी, ये कैसी स्थिति…

अगर तुम्हें सचमुच पछतावा है, तो फिर पूरी तरह से पछताओ। सतही पछतावा झूठा होता है। सच्चे पछतावे में एक ज़बरदस्त ताकत होती है। सच्चा पछतावा कहता है, अगर मैं वही पुराना बंदा हूँ, तो फिर मैं वही पुराने काम करूँगा और वही पुराने परिणाम झेलूँगा, मुझे वह पुराना बंदा ही नहीं रहना है। पछतावे को जीवन बदलने की ताकत बनने दो। इससे आप नए, बेहतर और सुंदर इंसान बनकर उभरेंगे।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, ध्यान में रहना और वैसे ही अपनी ज़िंदगी बिताना अगर सही तरीका है, तो हम लोग अपने तरीके से, जितना भी हमलोगों को पता है उस हिसाब से या आपको जैसे सुनते हैं, तो कोशिश करते हैं। पर लगता है कि कुछ हो नहीं रहा या हमसे…

प्रश्नकर्ता: मैं एक सर्जन (शल्य चिकित्सक) हूँ। क्या ध्यान में होने से सर्जरी सफल हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: ध्यान में होने पर ही सर्जरी सफल हो सकती है। नहीं तो ध्यान का फ़ायदा क्या? ध्यान का अर्थ ही होता है कि मन के पास भटकने के लिए कोई ठिकाना,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं काफ़ी समय से मेडिटेशन (ध्यान) कर रही हूँ। पिछले कुछ दिनों से कभी-कभी ऐसा होता है कि कुछ समय के लिए टाइमलेसनेस (कालहीनता) का अनुभव होता है। मैं ऐसा क्या करूँ कि ये अनुभव पूरे दिन रहे?
आचार्य प्रशांत: अगर आपको पता न होता कि मेडिटेशन…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप अपनी किताब में कहते हैं कि ध्यान की विधियों से कुछ नहीं होगा, लेकिन क्या कुछ देर बैठ कर अपने विचारों को देखना सही नहीं है? क्या इससे कुछ पलों का चैन नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: सटीक उदाहरण नहीं दे रहा हूँ पर इशारा समझना। चुपचाप…

आचार्य नागार्जुन की जीवन कथा का आंरभिक विवरण चीनी भाषा में उपलब्ध है, जिसे क़रीब 405 ई. में प्रसिद्ध बौद्ध अनुवादक कुमारजीव ने उपलब्ध कराया। यह अन्य चीनी एवं तिब्बती वृत्तांत से सहमत हैं कि नागार्जुन दक्षिण भारत में एक ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। ऐतिहासिक रूप से बचपन की…

जीवन माने वृत्तियाँ और विकार, तो ऐसे जीवन से हटना है। माने किससे हटना है? वृत्तियों और विकारों से। तो मृत्यु का अर्थ ये नहीं होता कि कब तुम्हारी देह मिटेगी, जलेगी; मृत्यु का अर्थ होता है कि कब तुम्हारे जीवन से वृत्तियाँ और विकार हटेंगे। यही ज़िन्दगी जीने का उचित तरीका भी है — प्रतिपल ऐसा बिताओ कि तुम्हारे भीतर जो मलिनताऍं हैं, जो दोष हों वो कम, कम और कम होते जाऍं। ये सब वही पुराना चक्र है, वो चले जा रहा है। हाँ, तुम जान गये कि ये पुराना चक्र है, तो ये अनुकम्पा है, ये बोध है।

बस ये देखिए कि क्या है जो चुभ रहा है। उसको हटाना ही जीवन का उद्देश्य है। सबसे पहले देखो कि अभी क्या है जो तुम्हें तंग कर रहा है? उसी से आज़ाद हो जाओ यही उद्देश्य है और कुछ नहीं।

करीब-करीब हर कोई बंधन में है और मुक्ति चाह रहा है; बंधनों से मुक्ति चाह रहा है न और कई बार कुछ बंधनों से मुक्ति मिल भी जाएगी, इसीलिए तो आपका अपने पुरुषार्थ पर इतना भरोसा है। इंसान ने अपने ऊपर के कई बंधनों पर फ़तह हासिल की भी है, तो उसका भरोसा कायम रहता है उसे लगता है कि कुछ बंधन तो पीछे छोड़ ही दिये, तोड़ ही दिये और भी छोड़े जा सकते हैं। वो ये नहीं देख पाता कि पुराने को छोड़कर जो नये बंधन वो धारण कर लेता है वो और कुछ नहीं है पुरानों का ही एक नया रूप है और वो होना ही था क्योंकि बंधन बने रहें इसकी प्यास हममें है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं अभी बैंक में जॉब कर रहा हूंँ, लगभग सात-आठ साल हो गये हैं। शुरुआत तो मैंने आजीविका के लिए करी थी; जैसे परिवार जो सोचता है कि आप पढ़ो और काम करो, उस हिसाब से।
लेकिन अभी, मतलब पिछले कुछ तीन से चार सालों में…