प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज़ाद मन को पुन: कैसे प्राप्त करूँ? यदि मेरा आनन्द खो गया है, तो पुनः उस आनन्द को कैसे प्राप्त करूँ?
आचार्य जी: खोता नहीं है। अगर होता है, नहीं खोता है। अगर खोया है तो खोने लायक़ ही था, असली नहीं था। आने-जाने वाली चीज़ थोड़े ही है आनन्द। ये सब हमारे भीतरी छल होते हैं, भ्रम कि पहले बहुत आनन्द था अब नहीं है। पहले खुशी रही होगी। सबको यही लगता है कि बचपन में कितना आनन्द था और जब बचपन में थे तो छिछन बहाये, लार टपकाये, भैं-भैं करते रोते घूमते थे कि जब बड़े हो जाएँगे तब पिंटू भैया को मारेंगे।
अब जब बड़े हो गये हैं तो बताते हैं कि बचपन जैसा आनन्द तो कभी था ही नहीं — ‘वो कागज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी।’ जिसको देखो वही ‘मेरा स्वर्णिम बचपन।' या कि ब्रेकअप के बाद ख़ूब होगा, जब तक वो मेरी प्रेम कहानी थी — ‘पूछो मत, हीर-रांझा फ़ीके पड़े थे, लैला-मजनू कोचिंग माँगने आये थे। ऐसा था मेरा प्रेम प्रसंग, ऐसा था।’ और हक़ीक़त ये है कि जब चल रहा था तब ख़ूब दिन-रात दुआ माँगते थे कि कब ये टरे। नहीं तो ब्रेकअप होता क्यों? लैला-मजनू का ब्रेकअप हुआ था कभी?
पर वर्तमान के झूठ को न देखना पड़े और वर्तमान की चुनौती को न स्वीकार करना पड़े, इसके लिए हम अतीत का एक बहुत बड़ा और ज़्यादा बड़ा झूठ खड़ा कर देते हैं। हम ये नहीं मानते हैं कि हम जैसे हैं सदा से ऐसे ही थे, क्योंकि विकार और वृतियाँ तो हममें जन्मजात हैं, पैदा ही उनके साथ हुए थे। हम कहते हैं, ‘नहीं, हमारा सबकुछ ठीक चल रहा था। अभी आजकल अकस्मात दुर्घटनावश थोड़ा सा ख़राब हो गया है। हम ऐसे है नहीं, जैसे अभी दिख रहे हैं। हम तो बहुत बढ़िया चीज़ हैं। हमने तो बड़े सुनहरे पल जिये हैं। आजकल बस थोड़ी सी गड़बड़ हो गयी है। आजकल, बस आजकल।’
अरे! आजकल नहीं हो गयी है, जीवन सदा से रूखा-सूखा था। जिसको देखो वही बताने आता है कि बस आजकल कुछ हो गयी है। पुलिस वाले ने किसी को पकड़ा छेड़ते हुए और जहाँ थप्पड़ मारा, तो बोले, ‘आजकल।’ वो बोले कि तू सदा का लफंगा है, आजकल? पर सबको यही बताना है।


