प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन बड़ा आनन्दमयी अवस्था सी है, मतलब वो उसमें ऐसा लगता है कि आलस भी है, मतलब पड़े रहे बस, आँख आदि खुली रहे, धूप मद्धम-मद्धम आ रही है, अभी मौसम बदल रहा है, तो इसका रस लेने का मन प्रतीत होता है, ये शंका पैदा करता है कि कहीं कोई गहरी अवस्था मतलब नींद में तो नहीं जा रहे हैं या अक्सर हमारे को ये प्रतीति या आलस का ही कोई लक्षण है?
आचार्य प्रशांत: चार शब्द लेते हैं और इनके अन्तरसम्बन्ध लेते हैं- तनाव, आलस, विश्राम और ऊर्जा; तनाव, आलस, विश्राम और ऊर्जा, तनाव और आलस साथ-साथ चलते हैं। तनाव, ऊर्जा की असहजता है; तनाव, ऊर्जा का पागलपन है, तो जब आप तने हुए होंगे, तनित हैं तनाव में हैं तो उस वक्त ऊर्जा तो आपसे निकलेगी, इस बात को हम मानते हैं। आप दुनिया की ओर देखें तो दुनिया की अधिकांश ऊर्जा तनाव के बिन्दु से ही निकल रही है। आप कार्यों को देखें, कर्मों को देखें वो हो किस कारण से रहे हैं कार्य के पीछे का कारण क्या है?
प्र: तनाव। आचार्य: तनाव। आपको जितना तनाव होता है आप उतना अधिक काम करते हैं, है न? लेकिन ये तो अजीब बात है, मैंने तनाव का सम्बन्ध आलस से बोला, मैंने तनाव का सम्बन्ध ऊर्जा से नहीं बोला है, तनाव की प्राकृतिक परिणति है आलस। जिन लोगों को आलस बहुत सताता हो, सुस्ती के मारे हुए हों, वो ज़रा गौर से सुनेंगे।
आप सुस्ती के मारे इसीलिए हो क्योंकि आप की ऊर्जा विक्षिप्त है, आप इतनी ज़ोर से दौड़ते हो कि थोड़ी ही देर में आपके पास कोई विकल्प नहीं रहता थम जाने के अलावा और यदि आप न थमो तो आपकी दौड़ ऐसी उपद्रवी है कि वो आपको गिराकर थमा देती है; आपकी दौड़ में ऐसी अव्यवस्था, ऐसी अराजकता है, आप ऐसा टेढ़ा-मेढा भागते हो कि आपको थमना ही पड़ता है। लेकिन तनाव, उत्तेजना है और उत्तेजना में कर्ताभाव को और अहंकार को बड़ा प्रश्रय मिलता है।









