हम कुछ करते नहीं, हमसे सब करवाया जाता है || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

आचार्य प्रशांत: जो तुम कर रहे हो वह तुम कर नहीं रहे, तुम्हें लग रहा है कि तुम कर रहे हो। पीछे से तुम्हारी वृत्तियाँ, तुम्हारा जो वह कलुषित मालिक बैठा है वह करवा रहा है, कौन सा मालिक? भगवान मालिक नहीं, कौन मालिक?
श्रोता: अहम्।
आचार्य: हाँ, वह जो अहम् बैठा है और जो पचास तरीके के शारीरिक, सामाजिक मालिक पीछे बैठे हैं वह करवा रहे हैं। तो जो तुम्हें लगता है कि तुम कर रहे हो वह भी तुम कर नहीं रहे। तुमने कुछ नहीं किया। तुम्हें लगता भर है कि तुम्हारे पास विकल्प था, विकल्प था ही नहीं। अगर विकल्प होता तो तुमने जो चुनाव करा तुम उसके अलावा भी कुछ कर पाते, पर वास्तव में तुम उस चुनाव के अलावा कोई चुनाव कर ही नहीं सकते थे क्योंकि वह चुनाव करने के लिए तुम्हें अच्छे से संस्कारित किया जा चुका था। तो बताओ विकल्प कहाँ है?
आपको अच्छे से संस्कारित किया जा चुका है कि जब आपके सामने काला रुमाल और सफेद रुमाल आए (रुमाल दिखाते हुए) तो सफेद रुमाल ही चुनना है, गोरा-गोरा, बागा छोरा। और आप कहो कि मेरे सामने काला और सफेद रुमाल आया और मैंने सफेद का चुनाव किया, तो झूठ बोल रहे हो कि नहीं बोल रहे हो? तुम्हारे सामने विकल्प था कहाँ? तुम तो पहले ही संस्कारित किया चुके थे। कुछ नहीं चुना तुमने, चुनने वाला कोई और है जिसने तुम्हें पट्टी पढ़ा दी है।
तो इसे कहते हैं कर्म में अकर्म को देखना कि जो तुमने कर्म करा, वह तुमने वास्तव में करा ही नहीं, वह तुमसे कोई और करा रहा है। समझ में आ रही बात? जैसे कोई छोटा बच्चा होता है, जब वह कोई गड़बड़ करता है तो सबसे पहले उससे क्या पूछते हो? 'कौन है, कौन है, किस घर से हो, माँ-बाप कौन है तुम्हारे, मम्मी-पापा ने यही सिखाया है?’






