प्रश्नकर्ता: जो आपने प्रेम के बारे में मैंने आपके वीडियोज़ भी देखे, थोड़ा समझने की कोशिश करी तो ये समझ में आया कि हम कई बार व्यापार बहुत सारा कर रहे होते हैं, उनको प्रेम का नाम देते हैं। लेकिन जीवन में जो सम्बन्ध हैं, जैसे कोई भी सम्बन्ध है, चाहे वो दोस्त से है, माँ से है, बाप से है, अब इनमें एक व्यावहारिक तल भी है जिसमें कुछ लेन-देन है और तो उसको कैसे साथ में लें? और इसी के साथ कई बार ये भी दिखता है कि खुद की कुछ ज़रूरतें होती हैं कि खुद पर कुछ चीज़ें खुद के लिए करनी है और कई बार दूसरे के लिए भी करनी है और इसकी दोनों एक्सट्रीम भी मैं देखता हूँ कि जैसे कुछ घरों में लोग अपने ऊपर काम नहीं करते बस दूसरे को ठीक करने की कोशिश करते रहते हैं, वो भी नर्क बन जाता है और कुछ जगह लोग सिर्फ़ अपने ही अपने में घुसे हुए हैं, वो भी नर्क बन जाता है। तो इसका लाइफ़ में बैलेंस कैसे करें कि ये मतलब ये जजमेंट कॉल (निर्णायक कॉल) कैसे लें?
आचार्य प्रशांत: ये बात हुई थी तो मैंने दो उसमें सिरे बताये थे जिनसे सावधान रहना है, ठीक है न? कि एक तो ये है कि दूसरे को बदलने की कोशिश कहीं तुम इसलिए तो नहीं कर रहे कि उससे तुम्हारी ठसक बढ़ती है, एक ये देखते चलो। और दूसरा सिरा ये जाँचते चलो कि कहीं दूसरे को न बदलने की कोशिश तो तुम इसलिए नहीं कर रहे कि तुम्हारी ठसक बची रहे? सही रास्ता इन दोनों सिरों के कहीं बीच में होता है, ये दोनों ही अतियाँ अहंकार की हैं।
पहली अति मैंने कौन सी बतायी? ये मेरा परिवार है। देखो, तुम्हें बाल लम्बे नहीं रखने चाहिए। देखिये, आपको रोज़ सुबह दौड़ लगानी चाहिए। देखिये, आप खाना बहुत ज़्यादा खाते हैं। तुम, तुम दाढ़ी बढ़ाओ, दाढ़ी बढ़ाओ। इसको वज़न बढ़ाना चाहिए ये जो बीच में बैठा है। ये सब क्या हो रहा है? मैं शुभचिन्तक हूँ सबका? मैं क्या कर रहा हूँ ये? मैं सबको क्यों बदलना चाह रहा हूँ? भाई का रौला है। क्या बोल रहे थे तुम? क्या चलते हैं? कोलोक्विअल वर्ड (बोलचाल का शब्द)। ‘लैट’। ये सब भाई की लैट है। ज़ोन ऑफ़ इन्फ़्लूएन्स (प्रभाव क्षेत्र)।
कोई गम्भीर सच्ची इच्छा थोड़े ही है दूसरे की भलाई की। मैं हो सकता है इसको बोल रहा हूँ कि तुम बहुत कमज़ोर हो, और अगर वो अपनी ताकत इतनी बढ़ा ले कि उसकी ताकत मुझसे ज़्यादा हो जाए तो मुझे बुरा भी लगने लग जाएगा। वास्तव में कहीं-न-कहीं उसकी कमज़ोरी मेरे लिए हितकर है क्योंकि जब तक वो कमज़ोर है, पहली बात तो मुझे ये सुख है कि वो मुझसे कमज़ोर है, दूसरे मुझे इसका सुख है कि देखो मैं अच्छा आदमी हूँ, मैं इसकी कमज़ोरी दूर करना चाहता हूँ, रोज़ मैं इसको बोलता हूँ कमज़ोरी हटाओ ताकत बढ़ाओ। कहीं सही में उसने ताकत बढ़ा ली, मुझसे ही ज़्यादा ताकतवर हो गया तो मेरा क्या होगा? ये सब सवाल पूछने होते हैं। क्योंकि दूसरे को सलाह देने में हमें अच्छा तो लगता ही है, नीयत क्या है? चाह क्या रहे हैं?




