तनाव कम करने के तीन तरीके (तीसरा खतरनाक है) || आचार्य प्रशांत के नीम लड्डू

आचार्य प्रशांत: जो तनावग्रस्त है, उसकी ज़िन्दगी में तनाव, चिंता और मनोविकार लगातार है। बस वो कुछ मौकों पर प्रदर्शित हो जाता है। ये आपके लिए कोई खुशखबरी नहीं है कि आपका तनाव दिन में दो-चार घंटे ही प्रकट होता है। ऐसे समझ लीजिए, यदि आपका तनाव चौबीस घंटे बना रह गया होता तो आप तनाव से मुक्त हो गए होते। क्योंकि तब आप तनाव से आज़ाद हुए बिना जी नहीं पाएँगे। हम गलत जीवन जी ही इसलिए पाते हैं क्योंकि गलत जीवन का दुष्परिणाम लगातार अपना अनुभव नहीं कराता। अगर कोई ऐसी व्यवस्था हो पाती कि जो गलत जीवन जी रहे हैं, उनको उसी समय तत्काल अपनी गलती का फल मिल जाता तो गलतियाँ होनी ही बंद हो जातीं।
ये दुनिया का खेल, ये सब मायावी कार्यक्रम चल ही इसलिए रहा है क्योंकि गलती करके भी हम सुख पाते हैं। यही तो दुनिया की धुरी है, इसी के इर्द-गिर्द दुनिया नाच रही है। इसी चीज़ ने तो दुनिया का समीकरण पूरा बिगाड़ रखा है। अगर ऐसा होता कि तुम गलत काम करते और उसकी सज़ा तुरंत पा पाते लेकिन ऐसा नहीं होता। हमें और ज़्यादा भ्रमित करने के लिए एक चीज़ और होती है। आप बिल्कुल सही काम करके भी दुःख पा सकते हो। यदि ऐसी व्यवस्था होती कि सब सही काम करके अनिवार्यतः सुख ही पाते तो सब सही काम करते।
यहाँ पर कर्म और कर्मफल का खेल थोड़ा उलझा हुआ है, आदमी की समझ से बाहर का है। इसलिए कृष्ण ने कहा है, तुम कर्म और कर्मफल में मत उलझना बल्कि तुम कर्मफल की परवाह ही मत करना। कर्मफल कर्म से सीधे-सीधे आनुपातिक है, यह तुमको सदा प्रत्यक्ष नहीं दिखेगा। तुमने यदि कर्मफल के आधार पर कर्म चुनना शुरू कर दिया तो तुम बड़ी मुसीबत में फँस जाओगे क्योंकि गलत काम करने पर सुख मिल रहा है और सही काम करने पर दुःख मिल रहा है। अब तो तुम गलत कर्म का ही चयन करोगे। तुम देखोगे अपने चारों तरफ़ और कहोगे कि जो घटिया काम कर रहे हैं, केवल वही सुखी नज़र आ रहे हैं।
जब श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि कर्मफल मुझे समर्पित होकर कार्य करो तो उसका अर्थ यही है, मुझे दे दो और तुम भूल जाओ। तुम तो सही कर्म करो, अंज़ाम की बात छोड़ो। परिणाम का ख्याल करने लग गए, तौलने लग गए, नापने लग गए कि क्या पाया और क्या खोया। कितना मिला, कितना गँवाया तो फिर तुम अनिवार्यतः गलत काम ही चुनोगे। माया ने समय का खेल चला रखा है।









