क्या करें क्या न करें - पहेली कर्म की || आचार्य प्रशांत, बातचीत (2021)

प्रश्नकर्ता: जो सबसे प्रमुख सिद्धान्त मैं सुनता हूँ बाजार में या इंटरनेट पर वो है थ्योरी आफ़ कर्मा। जिसको मैं कर्म भी नहीं बोलूँगा, मैं थ्योरी ऑफ़ कर्मा ही बोलूँगा, क्योंकि वो अपने विकृत रूप में ऐसे ही बिकती और चलती है। जहाँ मैंने ये बोल दिया कि अच्छा काम करो तो अच्छा होगा, बुरा काम करो तो बुरा होगा, वहाँ मैंने पहले से ही डर को बाँध कर बेच दिया। अब किस बात की फ़्रीडम (आज़ादी), अब तो उस चक्कर में मैं फिर फँस गया। कर्मा के पीछे नहीं, कर्म के पीछे कुछ तो तर्कसंगत बात है। क्या है वो, उसे सही तरीक़े से कैसे समझा जाए? और जो भौंडी नक़ल बाँटी जा रही है, उसके विरुद्ध स्वयं को कैसे बचाया जाए?
आचार्य प्रशांत: देखो, कर्मा में जो कुछ चल रहा है, वो तो तुमको पता ही है। अभी बोल ही रहे थे, ‘अच्छा करो अच्छा होगा, बुरा करो बुरा होगा’, कार्मिक अकाउंट, कार्मिक बैलेंस और कार्मिक लेफ़्टओवर्स और कार्मिक क्लीनज़िंग, पता नहीं क्या-क्या वो सब चल रहा है। वो सब कुछ नहीं है।
कर्म की जो बात है वो बहुत सीधी है। वो ये है कि कर्म से पहले कर्ता आता है। सीधी सी बात है, एक्टर (कर्ता) है, तभी तो एक्शन (कर्म) होगा। तो एक्शन हवा में तो हो नहीं सकता। पहले एक्टर बैठा है और ये जो एक्टर है, जो करता है काम को वही उस काम का एक्सपीरियंसर (भोक्ता) भी है — इस बात को अच्छे से समझो। ये आइडेंटिटी (पहचान) हमे एकदम साफ़ होनी चाहिए कि एक्टर ही एक्सपीरियंसर भी है। जो काम कर रहा है, वही उस काम की प्रक्रिया का और उस काम के परिणाम का एक्सपीरियंसर भी है।


