सही प्यार - दर्द भी, दवा भी || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! आचार्य जी अपनी निचाइयों से ऊपर उठने के जितने भी संकल्प लेता हूँ, वो कुछ दिन तो ठीक चलते हैं। लेकिन कुछ समय बाद संकल्पों से बाहर निकलने के लिए मैं जितना खींचता हूँ, उतना नीचे गिरता हूँ। और इस तरह फिर से उसी जगह पर आ जाता हूँ और इसी तरह ये चक्र चलता रहता है।
आचार्य प्रशांत: वो चलेगा न ऐसा, क्यों चलेगा अब समझना गौर से, तुम अपनी हालत को देखते हो ठीक है! उस हालत में तुम्हें कोई खोट नज़र आती है, खोट भी क्यों नज़र आती है? क्योंकि कोई नुकसान हो रहा होता है तुम्हारा उस हालत से। या लोग ताने मार रहें होते हैं लोग कह रहें होते हैं अरे! ये ठीक नहीं ऐसा-वैसा। तो तुम कहते हो ‘भई ये बदलनी चाहिए अपनी ये हालत।’
और बदलने के लिए तुम क्या करते हो? तुम सोचते हो कि अगर मेरी हालत ऐसी न हो तो कैसी हो? ठीक! तुम एक विकल्प तलाशते हो, तुम कहते हो अभी मैं ऐसा हूँ, ऐसा नहीं होना चाहिए, तो मैं एक विकल्प का निर्माण करता हूँ।
कहाँ? अपने खोपडे़ में कल्पना करके। और फिर तुम उस विकल्प की तरफ़ बढ़ने की कोशिश करते हो, तुम उस विकल्प को आज़माते हो, और अधिकांशतः ये होता है कि तुम उस विकल्प पर टिक नहीं पाते हो, तुम वापस लौटकर के अभी जैसे हो, वहीं वापस आ जाते हो, ये होता है?
क्यों होता है? क्योंकि तुम्हारे मन में अभी तुम जैसे हो और तुम जो कुछ भी अभी के अलावा हो सकते हो, वो सब मौजूद तो पहले से ही था। मान लो तुम्हारे पास पाँच विकल्प हैं कुछ होने के, कैसा होने के? मान लो अभी तुम देर से जगते हो, ज़्यादा खाते हो, ठीक है! काम कम करते हो, ये अभी तुम्हारी एक स्थिति है।
तुम्हारे पास इस स्थिति के अलावा पाँच तरह के विकल्प और हो सकते हैं जैसे एक विकल्प ये हो सकता है कि तुम वो इंसान हो जो रोज़ सुबह जल्दी उठकर के दौड़ जाता है। तुम्हारे पास एक विकल्प ये भी हो सकता है कि तुम वो इंसान हो जिसने जीवन में एक सार्थक काम चुन लिया है और अपना पूरा जीवन उसी को झोंक दिया है।



