नौकरी और पैसे के बारे में कुछ अहम बातें || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव ऋषिकेश में (2021)

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा नाम शुभम है। मैं एक-डेढ़ साल से सुन रहा हूँ आपको। मैं कॉर्पोरेट नौकरी में हूँ, इंजीनियरिंग जॉब भी है तो मेरा सवाल ये था कि किसी भी काम में जाते हैं शुरुआत में तो वो नया होता है, उसके बाद वो दिनचर्या बन जाता है और अरुचि पूर्ण हो जाता है बोरिंग हो जाता है।
तो मैं ये भी सोच रहा था कि आप निकले थे कॉरपोरेट जॉब से तो आपने क्या सोचा और कैसे आप बदले वहाँ से यहाँ तक। और उसमें जो कठिनाई या जो भी दिमाग में आती है चीज़ें तो वो कैसे साफ़-साफ़ दिखाई दीं आपको?
आचार्य प्रशांत: नहीं, मैंने कुछ किसी ख़ास समय पर विशेष नहीं सोचा कॉर्पोरेट जॉब मुझे कभी करनी ही नहीं थी। तो मैं तो जब मैनेजमेंट की पढ़ाई पढ़ रहा था मुझे तब भी स्पष्ट था कि ये तो नहीं करना है मेरा कॉरपोरेशन्स में या जो शेयर होल्डर प्रॉफ़िट मैक्सिमाइजेशन (कम्पनी के हिस्से दारू के लाभ को बढ़ाने का काम) होता है उसमें कभी कोई रुझान था ही नहीं।
पता नहीं सुनने में कैसा लगेगा, लेकिन मैं जिस दिन पहुँचा था अहमदाबाद उस दिन उसी दिन पहुँचा हूँ और उस दिन मैं बहुत रोया था कि मैं यहाँ क्यों आ गया हूँ। और पहले ट्राइमेस्टर के बाद मैंने मन बना ही लिया था कि इसको छोड़ ही देता हूँ। फिर सेकेंड ट्राइमेस्टर में जो वहाँ सेकेंड और थर्ड में वहाँ पर गाँधी आश्रम था वहाँ एक एनजीओ चलता था।
गाँधी आश्रम गया था ऐसे ही घूमने वहाँ वो दिखा कि बच्चे पढ़ रहे हैं, मैं चला गया। मैंने कहा, ‘मैं भी पढ़ाऊँगा’। उन्होंने कहा, ‘आ जाया करो’। तो मैं वहाँ जाने लगा, वहाँ जाने के लिए भी खर्चा लगता था और मैं जाता था तो मुझे लगता था बच्चों को दे दूंँ कुछ।



