प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन बन्दर की तरह उछलता-कूदता बहुत है। दृढ़ निश्चयी नहीं है। अपना शत-प्रतिशत सच्चाई के साथ किसी काम में दे नहीं पाती। क्या मेरा जीवन ऐसे ही अधूरेपन में कट जाएगा? इस कारण मुझे बेचैनी रहती है कि क्या ज़िन्दगी यूँही निकाल देनी है।
आचार्य प्रशांत: जाड़ों का मौसम है, गजक चल रही है, मूँगफली चल रही है। मैं थोड़ी देर को बाहर गया था, तमाम गजक के ठेले, मूँगफली के ठेले। मूँगफली के ठेलों पर लोग खड़े होकर के मूँगफली फाँक रहे हैं और एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं। क्या बातें कर रहे हैं? कुछ मौसम का हाल, ऊनी कपड़ों का हाल, कुछ राजनीति की बात, आज क्रिकेट का मैच हुआ था, कोई उसकी बात करता होगा। कोई घर-द्वार की चर्चा करता होगा।
मैंने तो किसी को नहीं देखा कि वो मूँगफली में ही लीन हो गया हो। खड़े हैं मूँगफली के ठेले के आगे और एकटक निहार रहे हैं मूँगफली को। और कह रहे हैं, 'सत्य-सत्य, हरि ओम।' या कि कह रहे हों, 'माँ-माँ!'
अब मूँगफली है, तो उसे तो मूँगफली का ही दर्ज़ा मिलेगा न? तुम जब काम ही यही कर रहे हो कि छिलका उतार-उतारकर दाने मुँह में डाल रहे हो, मूँगफली के ठेले के आगे खड़े हुए एक गली में, तो तुम पचास तरह की बातें तो करोगे ही। 'और भाई! तुमने नयी गाड़ी ले ली।' 'अरे! ज़रा देखना वो लड़की।' 'अरे! ये इधर गुप्ता जी की दुकान ज़्यादा चलने लगी है।' मूँगफली खाते-खाते ठेले के सामने गली में खड़े होकर क्या ब्रह्म चर्चा करोगे? वही तो करोगे न जो मूँगफली की औकात है।
मन्दिर के गर्भगृह और मूँगफली के ठेले में कुछ तो अन्तर होगा न। मूँगफली के ठेले पर तो समाधि नहीं लग जाएगी। अभी दसों ठेले देखें, वहाँ सबकुछ ऐसा ही था, बिना वज़न की, बिना गुरुता की हल्की-फुल्की बातें, गॉसिप। अब वहाँ कोई खड़ा होकर ये शिकायत करे कि मैं अपना शत-प्रतिशत इस मूँगफली को नहीं दे पा रहा, तो उसको मैं क्या जवाब दूँ?




