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चंचल मन का क्या करें? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मन बन्दर की तरह उछलता-कूदता बहुत है। दृढ़ निश्च‌यी नहीं है। अपना शत-प्रतिशत सच्चाई के साथ किसी काम में दे नहीं पाती। क्या मेरा जीवन ऐसे ही अधूरेपन में कट जाएगा? इस कारण मुझे बेचैनी रहती है कि क्या ज़िन्दगी यूँही निकाल देनी है।

आचार्य प्रशांत: जाड़ों का मौसम है, गजक चल रही है, मूँगफली चल रही है। मैं थोड़ी देर को बाहर गया था, तमाम गजक के ठेले, मूँगफली के ठेले। मूँगफली के ठेलों पर लोग खड़े होकर के मूँगफली फाँक रहे हैं और एक-दूसरे से बातें कर रहे हैं। क्या बातें कर रहे हैं? कुछ मौसम का हाल, ऊनी कपड़ों का हाल, कुछ राजनीति की बात, आज क्रिकेट का मैच हुआ था, कोई उसकी बात करता होगा। कोई घर-द्वार की चर्चा करता होगा।

मैंने तो किसी को नहीं देखा कि वो मूँगफली में ही लीन हो गया हो। खड़े हैं मूँगफली के ठेले के आगे और एकटक निहार रहे हैं मूँगफली को। और कह रहे हैं, 'सत्य-सत्य, हरि ओम।' या कि कह रहे हों, 'माँ-माँ!'

अब मूँगफली है, तो उसे तो मूँगफली का ही दर्ज़ा मिलेगा न? तुम जब काम ही यही कर रहे हो कि छिलका उतार-उतारकर दाने मुँह में डाल रहे हो, मूँगफली के ठेले के आगे खड़े हुए एक गली में, तो तुम पचास तरह की बातें तो करोगे ही। 'और भाई! तुमने नयी गाड़ी ले ली।' 'अरे! ज़रा देखना वो लड़की।' 'अरे! ये इधर गुप्ता जी की दुकान ज़्यादा चलने लगी है।' मूँगफली खाते-खाते ठेले के सामने गली में खड़े होकर क्या ब्रह्म चर्चा करोगे? वही तो करोगे न जो मूँगफली की औकात है।

मन्दिर के गर्भगृह और मूँगफली के ठेले में कुछ तो अन्तर होगा न। मूँगफली के ठेले पर तो समाधि नहीं लग जाएगी। अभी दसों ठेले देखें, वहाँ सबकुछ ऐसा ही था, बिना वज़न की, बिना गुरुता की हल्की-फुल्की बातें, गॉसिप। अब वहाँ कोई खड़ा होकर ये शिकायत करे कि मैं अपना शत-प्रतिशत इस मूँगफली को नहीं दे पा रहा, तो उसको मैं क्या जवाब दूँ?

तुमने चुना ही क्या है जीवन में? मूँगफली, अब उसे कैसे दे दोगे अपना शत-प्रतिशत। तुम अपना वज़न देखो, सत्तर किलो, और मूँगफली सात ग्राम की भी नहीं। तुमने अपना शत-प्रतिशत उसे दे दिया तो बेचारी पिस जाएगी। तुम अपना शत-प्रतिशत किसी को दे सको, इसके लिए वो कम-से-कम तुमसे थोड़ा तो बड़ा हो। ज़िन्दगी में अगर सब काम ही क्षुद्र, छोटे चुने हैं, तो तुम उन्हें अपना सबकुछ कैसे दे पाओगे? पर लालसा बहुत रहती है कि मैं अपना शत-प्रतिशत दे दूँ।

अपने शब्दों को पढ़िए, 'अपना सौ प्रतिशत सच्चाई के साथ मैं किसी काम में नहीं दे पाती।' अरे भाई! किसी भी काम को शत-प्रतिशत दिया जा ही नहीं सकता। सब काम इस लायक़ नहीं होते कि तुम उन्हें अपना शत-प्रतिशत दे दो। शत-प्रतिशत मतलब पूर्ण। अपना पूर्ण तो आप पूर्ण को ही समर्पित कर पाएँगी, मूँगफली को नहीं कर पाएँगी।

अब सुबह से लेकर रात तक अगर जीवन में मूँगफलियों का ही आवागमन है, तो आप कैसे अपना शत-प्रतिशत उन्हें देंगी। पहले कोई महत् काम तो उठाइए। समझ रहे हो? पहले कुछ काम तो ऐसा मिले तुम्हें जो तुमसे तुम्हारा शत-प्रतिशत माँगता हो, जब माँगेगा तब दोगे न।

तुम गाड़ी चलाते हो या मोटरसाइकिल चलाते हो। उसमें एक टॉर्क रेटिंग (आघूर्ण बल दर्जा) होती है, एक पावर रेटिंग (शक्ति दर्जा) होती है। इंजीनियर कितने लोग हैं यहाँ? तुम लोग तो समझते होगे? तुम्हें क्या लगता है, तुम्हारी गाड़ी हमेशा उतना पॉवर , उतना टॉर्क उत्पादित कर रही होती है? हमेशा नहीं, सिर्फ़ तब जब ज़रूरत पड़ती है, नहीं तो नहीं। नहीं तो गाड़ी जितना पावर दे पाने की सामर्थ्य रखती है उसका दस प्रतिशत, बीस प्रतिशत, चालीस प्रतिशत इतने में काम चल रहा है। जब इतने में काम चल रहा है तो इससे ज़्यादा गाड़ी उत्पादन क्यों करे? कोई बड़ी चीज़ सामने आये, कोई बड़ा पहाड़ चढ़ना है, तब फिर टॉर्क बढ़ेगा, क्योंकि तब ज़्यादा टॉर्क चाहिए।

हमारी ज़िन्दगी भरी हुई है ऐसे कामों से। टिफ़िन तैयार करना है, अब इसमें आप अपना शत-प्रतिशत कैसे दे देंगी? सोफ़ा झाड़ना है, धूल आ गयी है, हमने तो किसी को नहीं देखा कि अपना शत-प्रतिशत, नख से लेकर शिख तक अपना पूरा अस्तित्व समर्पित करके सोफ़ा झाड़ रहा हो। ऐसा हो सकता है क्या?

जीवन में अगर काम ही यही कर रहे हैं कि गर्म कपड़े धूप में डाल दो, जाड़े आ रहे हैं। अब इसमें क्या शत-प्रतिशत दोगे अपना? गर्म कपड़ा है, निकालो, धूप में डाल दो। सुबह-सुबह दाँत साफ़ कर रहे हैं, कह रहे हैं शत-प्रतिशत आज अपना दे देना है। चार-पाँच दाँत हाथ में आ ग‌ये होंगे। आज अपना शत-प्रतिशत देकर दाँत साफ़ कर रहे थे।

(कुछ हरकतें करते हुए श्रोता की ओर इशारा करते हुए) लो, ज़िक्र ही काफ़ी है, कर दिया तो क्या होगा!

और आप सोच रही हैं कि आपका दोष ये है कि जो काम आप जीवन में कर रही हैं उन कामों में पूरे तरीक़े से डूब नहीं पातीं। मैं आपसे कह रहा हूँ कि चुल्लू भर पानी में कौन डूब पाया है, डूबने के लिए भी कुछ पोखर, कुआँ, सरोवर कुछ तो चाहिए। हम कहते हैं कि डूब कर जियो, जीवन में बिलकुल आप्लावित हो जाओ। अच्छा ठीक है। 'बेटा, जो करो डूब कर करो।' और क्या है? बस इतना (कम गहरे पानी का इशारा करते हुए)। अब बेटाजान इसमें डूबने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। 'डूबो, डूबो।'

अरे! कुछ बड़ा मिलेगा तब न डूबोगे? पर ये जो शब्द है 'बड़ा’, ये हमें बड़ा सताता है। एकदम हम चौंक जाते हैं, 'बड़ा!' क्योंकि बड़े के आगे अपनी हस्ती के खोने का डर होता है। कोई छोटी चीज़ है, उसके तो तुम मालिक हो। अब रोटी पका रहे हो, रोटी बेली, रोटी पकायी और खा ली। रोटी तुम्हें क्या बदलेगी, वो तो तुम्हारे ही पेट में चली गयी। रोटी बेली, रोटी सेकी और खा गये। ये काम तुम्हें बदल देगा? ये काम तुम्हें फुला और देगा।

बड़े से जब रूबरू होते हो, तो फ़ायदा भी होता है और ख़तरा भी। फ़ायदा ये कि पहली बार ज़िन्दगी जीने को मिलेगी, पहली बार गहरा गोता मारने को मिलेगा। और डर ये होता है कि?

श्रोता: मौत न हो जाए।

आचार्य: अब तुम बता दो कि डर ज़्यादा बड़ा है या मौत चाहिए?

श्रोता: मौत चाहिए।

आचार्य: मौत चाहिए, तो फिर इसमें तो नहीं मिलेगी मौत। ये मुहावरा ही भर है कि चुल्लू भर पानी में डूब मरो, दिक्क़त ये है कि चुल्लू भर पानी में तो मर भी नहीं सकते, जियोगे कैसे। हम सबकी ज़िन्दगियाँ चुल्लू भर पानी में बीत रही हैं। हाँ, सुरक्षा बहुत है क्योंकि चुल्लू अपना है। पानी बदतमीज़ी करेगा तो तुरन्त उछाल देंगे, कहेंगे, 'हट! हमारी बिल्ली हमीं से म्याउँ।' समुद्र किसी का नहीं होता, उसके साथ ये गुस्ताख़ी नहीं कर पाओगे।

न जाने कितने सवाल ऐसे ही आते हैं। 'ज़िन्दगी ऊब से भरी है, बोरियत से भरी है।’ कोई कहता है, 'जवान हूँ, जवानी नहीं है।' कोई कहता है, 'काम में नींद आती रहती है।' कोई कहता है, 'सुबह उठने का मन ही नहीं करता।' सबकी स्थिति एक है। और वो ये है कि करने के लिए तुम्हारे पास कोई ऐसा काम ही नहीं है जिसकी ख़ातिर उठना पड़े। ज़िन्दगी को कोई उद्देश्य तो दो। उद्देश्य नहीं होगा तो क्या करोगे, उठ कर भी क्या करोगे? जाकर गुसलख़ाना गन्दा करोगे, फिर सो जाओगे।

और नींद का ऐसा है कि जितना सोओ उतना बढ़ती है। जानते हो, पेशेवर सुअक्कड़ होते हैं, उनसे पूछना, वो बताएँगे। वो आठ घंटे सो कर उठते हैं, फिर चाय-नाश्ता करते हैं और फिर सो जाते हैं। तीन घंटा अगर वो जग लें तो उनके साथ अत्याचार हो गया। और वो कोई ग़लत काम नहीं कर रहे, जब जाग्रति से कुछ हासिल ही नहीं होना तो इससे भला ये है कि सो ही जाओ।

जिनको जीने के लिए वजह मिल जाती है उनकी आँखों की नींद उड़ जाती है। उनको तुम सुला कर दिखा दो! काम जितना कम होता है, उतना ज़्यादा फैलता है। ये छुटपन की निशानी है। वो चौड़ा बहुत होता है। जिनके पास करने को बहुत कुछ है, वो सबकुछ तुरन्त-तुरन्त निपटाते चलते हैं। और जिनके पास करने को कुछ नहीं है, जिनके पास कोई बड़ा उद्यम ही नहीं है, बड़ा उपक्रम ही नहीं है, उनके छोटे-छोटे काम भी हफ़्तों-महीनों ले लेते हैं।

दिन भर में अगर करने को तुम्हारे पास बस एक काम हो, क्या? एक किताब को उठाकर एक कमरे से दूसरे कमरे में रख देना है। तो तुम पक्का समझो कि ये काम भी बहुत फैल जाएगा। ये काम भी मुश्किल से होगा। तुम्हें यही लगता रहेगा कि तुम बहुत व्यस्त हो। उत्पादकता, सृजनात्मकता, सब बहुत कम हो जाते हैं जब तुम छोटे कामों में उलझे हुए होते हो।

जितना ऊँचा काम उठाओगे, तुम्हारी उत्पादकता, प्रोडक्टिविटी और तुम्हारी सृजनात्मकता, क्रिएटिविटी दोनों उतना बढ़ जाएँगे। और जितना छोटा, जितना संकीर्ण काम उठाओगे उतना ज़्यादा तुम्हारी ऐफिशिएन्सी , प्रोडक्टिविटी , क्रिएटिविटी सब गिर जाएँगे। निपुणता भी उतनी ही कम हो जाएगी। स्किल (कौशल) सब कम हो जाएँगे, जैसे-जैसे छोटा काम उठाओगे।

इसीलिए जो लोग बड़े काम करते हैं, तुम पाओगे कि वो बहुत सारे काम कर लेते हैं और सब में उन्हें महारत होती है। और जो लोग छोटी ज़िन्दगी जीते हैं, पहली बात तो छोटी ज़िन्दगी जी रहे हैं और दूसरी बात, वो छोटी ज़िन्दगी भी उनसे ठीक से जी नहीं जाती। और स्त्री के साथ तो ख़ासतौर पर बड़ा अभाग घटित होता है। कभी उसको घर की दीवारों में क़ैद कर देते हैं, कभी रसोई की दीवार में क़ैद कर देते हैं, कभी बच्चेख़ाने की दीवार में क़ैद कर देते हैं।

मैं एयरपोर्ट पर देख रहा था, वहाँ पर एक कमरे में लिखा हुआ था 'ममाज़ रूम' ( मातृ कक्ष)। अब वैसे तो ये मीठी बात है कि बच्चे की देखभाल के लिए एयरपोर्ट पर एक अलग से कमरा ही बना दिया। बच्चे की नर्सिंग करो, दूध पिलाओ, जो भी करो वहाँ पर। पर वो भी क्या एक क़ैद ही नहीं है? पुरुषों के लिए तो कोई नहीं होता 'पापाज़ रूम' (पितृ कक्ष)।

जब पत्नी जाती है ममाज़ रूम में, बेबी (बच्चे) को लेकर तो पापा को मज़े आ जाते हैं। वो फिर इधर-उधर आँखें गर्म करते हैं, कहते हैं, 'बढ़िया है, पन्द्रह मिनट तक ये अन्दर रहेगी, उतनी ही देर में इधर-उधर दो-चार कॉल कर लें। देख लें आजकल कौनसा एयरपोर्ट वियर प्रचलन में चल रहा है।' तो पापा तो मुक्त हैं और उन्मुक्त हैं। वहाँ ममाज़ रूम है, दीवारें हैं।

छोटी जगह में रानी बनकर रहने से अच्छा है किसी बड़े काम में निकलो न। वहाँ भले तुम्हें कतार में सबसे पीछे खड़ा होना पड़े। कुछ बड़ा तो करो। पर स्त्रियाँ अक्सर सन्तुष्ट हो जाती हैं कि हम गृहमन्त्री हैं। दुनिया में एक जगह तो है जहाँ हमारा आधिपत्य है। क्या आधिपत्य है! जैसे कोई मछली बड़ा गर्व माने कि चुल्लू भर पानी पर हमारी हुकूमत चलती है। चुल्लू भर पानी है और उसमें एक मछली तैर रही है। और वो बड़ा गुमान मानती है कि हमारी हुकूमत चलती है इस समुद्र पर। इससे अच्छा ये न हो कि तू विशाल सागर में खो ही जाए। विशाल सागर में अनन्त मछलियाँ। किसी मछली की वहाँ हुकूमत नहीं चलती पर सब मछलियों को आनन्द है, है न?

बड़े काम में हारो भी, तो भी वो छोटे काम की जीत से श्रेयस्कर है।

बात ये बाद में है कि हारे कि जीते, ज़्यादा महत्वपूर्ण ये है कि लड़ाई क्या थी। छोटी लड़ाई मत लड़ो न। छोटे काम में मत उलझो। हाथी सामने आ जाए तो उससे पिटोगे भी तो उसमें तुम्हारी सौ प्रतिशत ऊर्जा तो लग ही जाएगी, लग जाएगी न? अगर मच्छर मारने में तुमने अपनी सौ प्रतिशत ऊर्जा लगा दी, तो तुम्हारा पंजा तुम्हारे ही गाल पर छप जाएगा। 'मुँह पर मच्छर बैठा था और आज हमने सौ प्रतिशत शक्ति के साथ उसका संहार किया है।' कुछ नहीं होगा, एक गाल से दूसरे गाल तक सुरंग बन जाएगी, मच्छर उड़ जाएगा।

भिड़ना ही है तो जाकर हाथियों से भिड़ो। पिटोगे, मज़ा तो आ जाएगा। आहाहा! सही दौड़ाया उसने। क्या सूँड थी! पटक-पटककर मारा है क़सम से। हाथी से पिटने का भी कुछ मज़ा है। मच्छर मारने में क्या मज़ा है? कि है?

'आज दिन की उपलब्धि बताइएगा।'

'आज दिन की उपलब्धि ये है कि बबलू की बनियान साफ़ कर दी, न जाने कहाँ से उस पर ग्रीस लगा आया था।’

सही मायनों में पुरुष से ज़्यादा ऊँची होती है स्त्री की सम्भावना। ऊँची नहीं माननी है तो कम-से-कम बराबर की तो मानो ही। लेकिन वो अपनेआप को छोटे कमरों में सीमित कर देती है, फिर तड़पती रह जाती है। दुनिया में बहुत कुछ है जो चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है, 'मुझे करो।' इस दुनिया को इस समय बहुत ज़रूरत है ऐसे लोगों की, जो सम्यक् काम, ढंग के काम, धार्मिक काम करने का बीड़ा उठायें। तो एक तरफ़ तो काम पड़े हैं, अनुत्तरित, अपूर्ण। दूसरी ओर लोग हैं जो कह रहे हैं कि हमारे पास करने के लिए कुछ नहीं है। ये कैसी स्थिति है भाई!

एक तरफ़ तो इतना कुछ करने को है और इतने लोग हैं जो ऊब भरा जीवन जी रहे हैं क्योंकि उनके पास करने को कुछ नहीं है। तो इसलिए मैं कह रहा हूँ, सही काम को उठाओ और उसमें पूरी तरह कूद जाओ। इसके अलावा आनन्दमगन जीवन जीने का कोई नुस्खा नहीं है।

कोई अध्यात्म, कोई समाधि तुम्हारे काम नहीं आएगी अगर जीवन में तुम्हारा काम ही छोटा है। और काम तुम्हें करना ही पड़ेगा। काम तो वो भी कर रहे हैं जो दिन भर सोते हैं, वो क्या काम कर रहे हैं? सो रहे हैं। तो काम तो तुम कुछ-न-कुछ कर ही रहे हो। सही काम करो।

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