अपने कर्मों का परिणाम देखा है? || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर : आइ.आइ.टी खड़गपुर सत्र (2020)

प्रश्नकर्ता: श्रीमद्भगवद्गीता के निष्काम कर्म ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया है और उसे बहुत समय से अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न कर रहा हूँ, पर निष्काम कर्म के सिद्धान्तों पर चलना मुझे दुष्कर लगता है। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: निष्काम कर्म का अर्थ हमारे लिए है कि कामना पर आधारित कर्म करोगे तो और दुख पाओगे। और कामना पर आधारित कर्म तो आजीवन करते ही आये हो न। तभी अब गीता पढ़कर निष्काम कर्म को नया-नया जीवन में उतारने का प्रयास कर रहे हो।
ये तो नहीं कहते कि मैं सकाम कर्म को जीवन में उतारने का प्रयास कर रहा हूँ, वो तो उतरा ही हुआ है। ज़िन्दगी भर सकाम कर्म ही करा है। सकाम कर्म माने ऐसा कर्म जो अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाए। मेरे पास कोई कामना है, वो मुझे उपलब्ध हो सके, इसके लिए मैं कुछ करूँगा। ये सकाम कर्म है।
वो तो कर चुके हो न खूब। उससे क्या मिला, और कितना सुखदायी था वो कि अब उसकी तुलना में कह रहे हो कि निष्काम कर्म दुष्कर लगता है?
निष्काम कर्म का कोई विशेष मार्ग नहीं है। देखते नहीं हो नाम ही निष्-काम। ये नहीं बता रहा यह शब्द कि किसके लिए काम करना है, हाँ ये बहुत स्पष्टता के साथ बता रहा है कि किसके लिए काम नहीं करना है। किसके लिए काम नहीं करना है? कामना के लिए नहीं करना है।
हाँ, गीता है तो ये भी कह दिया गया है कि श्रीकृष्ण के लिए करो, जो भी कुछ करो श्रीकृष्ण के लिए करो, श्रीकृष्ण को अर्पित कर दो, श्रीकृष्ण को प्रयोजन मानकर करो, इत्यादि। पर श्रीकृष्ण तो अमूर्त हैं, निराकार हैं। श्रीकृष्ण के लिए कुछ क्या करोगे और कैसे अर्पित करने जाओगे श्रीकृष्ण को, कहाँ बैठे हैं, कहाँ पाओगे?



