जिनको माल, खजाना मिल चुका है, जो ऊपर के तल पर हैं, उनकी सबसे बड़ी जीत इसमें है, उनके ऊपर सबसे बड़ा कर्त्तव्य ये है कि “पाव रती घटने नहीं पावे।“ जो मिला है, उसको पकड़कर के रखना। अपना तल छोड़ना नहीं। क्योंकि गुरु से मिला ही क्या है? वो तल चेतना का। गुरु और कौनसा माल खजाना देगा आपको? “गुरु दीन्हा माल, खजाना।“ गुरु ने क्या दिया है आपको सोना दिया है? प्लैटिनम दिया है? और क्या दे देगा गुरु?
गुरु आपको चेतना का ऊँचा तल ही तो देता है और बदला लेने के लिए या चोट खाकर के या कुछ और करके किसी भी कारण से मजबूर होकर आपने वो चेतना का तल ही छोड़ दिया, आप नीचे गिर आये, तो गुरु ने आपको जो कुछ भी दिया था, आप उससे हाथ धो बैठे न? बात समझ में आ रही है ये?
क्षमा क्या है, समझे? क्षमा क्या है? जब चोट ही न लगे तो उसको क्षमा बोलते हैं। क्षमा इसमें नहीं है कि चोट लगी थी, माफ़ कर दिया। आपको अगर चोट लग गयी है, तो आगे अब जो होगा, वो होगा। क्यों? क्योंकि एक अन्धापन है जिसमें आपको चोट लगी और आगे का काम भी वही अन्धापन करेगा। एक बेहोशी है जिसमें आपने चोट खायी है। क्योंकि चोट सिर्फ़ बेहोशी ही खाती है और जो बेहोशी चोट खाएगी, वो बेहोशी फिर चोट खाने के बाद बदला भी लेगी।
तो आप ये नहीं कह सकते कि चोट तो लगी है, पर बदला नहीं लूँगा। भाई, जिस प्रक्रिया से चोट लगी है, ठीक उसी प्रक्रिया से अब बदला भी स्वमेव घटित होगा, तुम बदला लोगे नहीं। जैसे तुमने चोट खायी नहीं, जैसे तुमने चोट अनजाने में खायी वैसे ही बदला भी तुम अनजाने में ले लोगे। ये नहीं सम्भव है कि चोट खायी पर बदला नहीं लिया। ये एक अस्तित्वगत विषमता है, ये बेमेल है, ये असम्भव है, ये नहीं हो सकता। “हर्ट बट नॉट रिवेंजफुल।“ (चोटिल हैं, पर बदला नहीं लेना है।) इम्पॉसिबल। इम्पॉसिबल (असम्भव) है। हाँ, ये होगा कि आपका जो रिवेंज है, जो आपका बदला है, वो कॉन्शियस नहीं होगा ठीक वैसे जैसे आपकी हर्ट कॉन्शियस नहीं थी।
तो आप रिवेंज तो लोगे, पर कैसे लोगे? अनकॉन्शियसली लोगे। और ये काम करते हैं सारे नैतिक लोग, मोरल लोग। वो बदला भी लेते हैं, तो बेहोशी में लेते हैं। और जब बदला बेहोशी में होता है, तो उनके पास स्वयं को ये कहने का अवसर आ जाता है कि मैंने तो बदला लिया ही नहीं। मैं तो अच्छा आदमी हूँ। मैं बदला-वदला थोड़े ही लेता हूँ!
तुमने बदला लिया है। और तुम्हारा बदला ज़्यादा घातक है। क्योंकि तुम्हारा बदला बिलकुल बेहोशी में लिया गया है। अनकॉन्शियस बदला है, अचेतन बदला है तुम्हारा। अचेतन बदला है। ये वो बदला है जो नैतिक सम्बन्धों में लिया जाता है। चाहे वो माँ-बाप और सन्तान का सम्बन्ध हो, चाहे वो पति-पत्नी का सम्बन्ध हो। विशेषकर पति-पत्नी और प्रेमी-प्रेमिका आदि के सम्बन्ध में ये बदला खूब रहता है। क्योंकि वहाँ आप खुलेआम तो बदला ले नहीं सकते।
आप अपनी पत्नी को डंडा लेकर मारने जाओ, ये बात आपकी नैतिकता ही गवारा न करे। बड़ा अजीब लगेगा कि डंडा लेकर थूर रहे हैं, किसको? अपनी पत्नी को। तो आम आदमी ऐसा करेगा नहीं। कुछ विरले ऐसा भी कर जाते हैं! सब तरह के जीव-जन्तु होते हैं दुनिया में। पर आम आदमी कम-से-कम डंडा नहीं चलाएगा अपने पति या पत्नी पर। न माँ-बाप ये करेंगे कि गोली मार दें सन्तान को, न सन्तान ये करेगी कि मूसल लेकर के माँ-बाप को धुन रही है। लेकिन चोट तो हम खाते हैं न? ईमानदारी से बताइएगा सबसे ज़्यादा चोट आपको कौन देता है? दूर वाले लोग या अपने लोग?
आप शायद समझ नहीं रहे हैं कि आपने अभी जो वक्तव्य दिया जब आपने जो सूत्र लिखा है, उसके साथ उसको जोड़ दें, तो क्या मिलेगा? आपने समझा — ‘चोट खायी पर बदला नहीं लूँगा, ये असम्भव है।’ और आपने अभी-अभी कहते हो कि सबसे ज़्यादा चोट आपको अपने देते हैं। तो इसका मतलब क्या है? आप लगातार अपनों से बदला लेते रहते हैं? लगातार। बस वो बदला कभी भी प्रत्यक्ष, प्रकट नहीं होता। वो एक छुपा बदला होता है। वो एक अचेतन बदला होता है। पर बदला तो हम लेंगे। क्योंकि चोट तो हमने खायी है, चोट तो हमने खायी है।
उधर चौराहे पर वो नत्थू पनवाड़ी है, उससे कितनी चोट खायी है तुमने? कुछ नहीं। और जिन-जिन से चोट खायी एक बार उनका नाम स्मरण करो। वो कौन हैं? सब, जिनसे कोई रिश्ता होगा आपका। ठीक? रिश्ता न हो, तो चोट देकर कैसे जाए? बड़ा मुश्किल है। और चोट खाओ, बदला न लो, ये हो नहीं सकता।
तो पूरा जीवन हमारा एक तरह से कह सकते हैं कि बदले की अनवरत प्रक्रिया होता है। चोट खाओ, बदला लो। चोट खाओ, बदला लो। चोट खाओ, बदला लो। ‘डूड, क्या किया आज दिनभर?’ ‘चोट खायी, बदला लिया। चोट खायी, बदला लिया।’ चोट खायी, बदला लिया। अच्छी डांस स्टेप है न। एक कन्धे से दिखाओ, क्या खायी? चोट। और दूसरे कन्धे से क्या दिखाना है? बदला। सब लोग खड़े हो और कन्धे हिलाओ ऐसे-ऐसे। पूरा जन्म काहे में गँवाया? चोट खायी, बदला लिया। चोट खायी, बदला लिया। और दोनों ही काम बिना हमसे पूछे हुए।
चोट भी हमसे पूछकर हमको नहीं लगी और बदला भी हमने कोई सोच-समझकर बहुत होश में, बहुत बोध में नहीं लिया। बदला तो आग की तरह होता है। आग कहाँ देखती है कि किसको जला रही है। भभककर आती है जो मिला, उसको लील जाती है।
समझ में आ रही है बात?
और बदला ऐसे ही नहीं लिया जाता कि थप्पड़ मार दिया। चार साल से नौकरी की तैयारी कर रहा है झुन्नू। क्यों कर रहा है? क्योंकि ताऊ ने एक बार झुन्नू के बाप को गँवार बोल दिया था। ताऊ उधर ही कहीं जिले में लग गया है क्लर्क और झुन्नू के पिता जी ऐसे ही किसान, बहुत पढ़े-लिखे नहीं। और ताऊ क्या है? क्लर्क। तो ताऊ ने एक बार क्या बोला झुन्नू के बाप को? गँवार। वो दिन है और आज का दिन है। झुन्नू कह रहा है,’मैं कलेक्टर बनकर दिखाऊँगा।‘