(गीता-16) सुनिए श्रीकृष्ण से, जीवन का उच्चतम आदर्श क्या है || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति। स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥२.७२॥
हे अर्जुन! यही ब्रह्मस्वरूप में अवस्थिति है। इस अवस्था को पाकर मनुष्य संसार में मोहित नहीं होता। मृत्यु के समय भी इस ब्राह्मी स्थिति में प्रतिष्ठित रहकर वह ब्रह्मस्वरूपता के आनन्द को प्राप्त करता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ७२)
आचार्य प्रशांत: हे अर्जुन! यही ब्रह्मस्वरूप में अवस्थिति है। इस अवस्था को पाकर मनुष्य संसार में मोहित नहीं होता। अन्त में भी इस ब्राह्मी स्थिति में प्रतिष्ठित रह वो ब्रह्मस्वरूपता के आनन्द को पाता है। यही ब्राह्मी स्थिति है, जिसको कभी स्थितप्रज्ञता बोल सकते हो, कभी निर्ममता बोल सकते हो, कभी निष्काम कर्मयोग का पालन बोल सकते हो। यही ब्राह्मी स्थिति है। इसके विषय में फिर से एक यहाँ पर विशेष बात — अन्त की बात कर रहे हैं यहाँ पर श्रीकृष्ण, और जो हमारे सामने अनुवाद है वहाँ पर अन्तकाल को शारीरिक मृत्यु कहा गया है अनुवाद में। नहीं, देखिए, श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि ब्राह्मी स्थिति को जो पा लेता है वो मृत्यु के समय भी इसमें प्रतिष्ठित रहता है, और आनन्द पाता है।
आपका आनन्द क्या शारीरिक मृत्यु छीनती है? आपको अभी — आप आनन्द में हैं क्या अभी? नहीं, आनन्द में तो नहीं हैं। आप मर रहे हैं क्या अभी? आप मर भी नहीं रहे हैं। इसका मतलब आपका आनन्द छीनने वाली बात शारीरिक मृत्यु नहीं, कुछ और है। शारीरिक मृत्यु तो किसी एक पल में आपका आनन्द छीनती होगी, पर आप तो आनन्द विहीन सदा रहते हैं। तो फिर कौन आपको परेशान करे रहता है? अन्तकाल। वो परेशान करे रहता है।






