गीता एक एलीट डॉक्यूमेंट है, उत्कृष्टता है इसमें। इससे प्यार वही कर पाएँगे, जिन्हें ऊँचाइयों से प्यार है, जिन्हें एक्सीलेंस चाहिए। और जिनको ऐसे ही बीच में पड़े रह जाना है — मिडियॉकर — उन्हें गीता रुचेगी ही नहीं। जीवन में जो भी ऊँचे-से-ऊँचा, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठतर हो सकता है, वो निष्काम कर्म से ही मिलेगा। घोर कर्म करना है, जज़्बे से खेलना है, दिल से चाहना है, डूबकर जीना है — ये श्रीकृष्ण का उपदेश है।
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नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन। न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ।।१८।।
इस संसार के कर्मों के अनुष्ठान से निष्कामी मनुष्य को कोई प्रयोजन नहीं रहता फिर, और ऐसे मनुष्य को कर्मत्याग की कोई आवश्यकता नहीं रहती। ऐसे मनुष्य के लिए संसार में किसी प्रयोजन की सिद्धि हेतु आश्रय करने योग्य भी कुछ नहीं है।
~ श्रीमद्भगवद्गीता, तीसरा अध्याय, कर्मयोग, श्लोक १८
आचार्य प्रशांत: “इस संसार के कर्मों के अनुष्ठान से निष्कामी मनुष्य को कोई प्रयोजन नहीं रहता फिर।” जो इस संसार में साधारण कर्म चक्र चलता है, वो कहता है, ‘ये चलने दो, मुझे पता है मुझे क्या करना है। दुनिया अपना खेल देखे, मैं अपना खेल देखूँगा।‘
“और ऐसे मनुष्य को कर्मत्याग की कोई आवश्यकता नहीं रहती।” न वो ये कहता है कि, ‘मैं कुछ कर्म करूँगा ही नहीं।’ वो कहता है, ‘करूँगा, पर वो नहीं करूँगा जो तुम करते हो।’ न तो वो दुनिया के कर्मानुष्ठान में लिप्त होता है, न ही वो कर्म का त्याग कर देता है। ये महीन बात है, समझो! सूक्ष्म चीज़ है।


![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)

