चंद्रयान: ISRO वैज्ञानिक की जिज्ञासा || आचार्य प्रशांत (2023)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं इसरो बैंगलोर में कार्यरत हूँ। मैं चन्द्रयान-3 मिशन से भी जुड़ा हुआ हूँ, और आपको विगत चार वर्षों से सुन रहा हूँ। आचार्य जी इस चन्द्रयान-3 मिशन में कई उतार-चढ़ाव आये, और उतार-चढ़ाव के मध्य खासतौर पर जो आखिरी पैंतालीस दिन का मिशन था। उसमें हम लोगों ने कई बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिये। इस पूरी प्रक्रिया में आपकी शिक्षाओं से मुझे बहुत बल मिला।
दूसरी तरफ़ हम बहुत तनाव में थे इस यान की लैन्डिंग को अपनी योजना के अनुसार देखने के लिए। इस प्रक्रिया में जो हमने योजना बनायी उसी का नतीजा होगा जो आगे होने वाला है। इस दौरान मैं दो रात पहले से बिलकुल निद्रारहित हो गया था, मैं काफ़ी तनाव में आ गया था, फिर मैंने आपकी शिक्षाओं को याद करना शुरू किया। तब मुझे आपकी एक बात याद आयी — अपनी तरफ़ से जितना प्रयास कर सकते हो करो, और भरोसा रखो। इस बात से मुझे बहुत राहत मिली।
आचार्य जी एक और प्रश्न था इस चीज़ को लेकर कि ये जो मिशन था, इसमें मतलब तकनीकी विषय तो थे ही एक आध्यात्मिक पहलू भी था इसका। एक अध्यात्मिक पहलू ये था कि कई सारी टीमें एक साथ काम कर रही थीं तो हम बिलकुल फोकस्ड थे। और मन में शान्ति का अनुभव हुआ। लेकिन जैसे ही इस मिशन से बाहर निकलकर आये, अब एक व्यावहारिक ज़िन्दगी फिर से शुरू हो गयी है, और फिर से एक बेचैनी पकड़े हुए है।
तो क्या इस तरह के मिशन ही ज़रूरी हैं? आप जैसे बताते हैं कि कोई ऐसा बड़ा काम लो जो आपको सोख कर ले। तो क्या यही एक तरीका है कि इन सब चीज़ों को या कुछ और भी है?
आचार्य: हाँ, बस यही एक तरीका है। देखिए, या तो हम मेहनत करके इस संसार को, माने ये जो समाजकृत संसार है, जो हमारा संसार है वो तो हम ही ने बनाया है न? प्राकृतिक जंगल तो है नहीं, हम जहाँ रहते हैं वो हमारी बनायी दुनिया है। वो जो आदिम प्रकृति है, उसकी दुनिया से तो हम कबके बाहर आ गये। तो हम तो समाज के बनाये संसार में रहते हैं।



