आचार्य प्रशांत: ऐसे तरीक़े से कमाकर क्या करोगे जिसमें तुम्हारा मन टिकना ही नहीं चाहता? पेटभर चलता रहेगा, मन जलता रहेगा, ऐसे जीना है? पेट फूल जाएगा, मन राख हो जाएगा, ऐसे जीना है?
ऐसे नहीं देखा जाता रोज़गार को या आमदनी के स्रोत को कि पहले कुछ कमाने लगें फिर कमाई के आधार पर अपनी रुचियाँ ढूँढेंगे, अपना प्रेम ढूँढेंगे। ऐसे नहीं होता, उल्टा होता है; पहले ढूँढो कि क्या करते हुए शान्त हो जाते हो। पहले ढूँढो कि क्या है जो तुम्हारे मन को रोशनी देता है, तृप्त कर देता है और फिर ये ढूँढो कि ऐसे काम से पैसा कैसे कमा सकते हैं।
वो काम कुछ भी हो सकता है, मैं तो कह रहा हूँ तुम्हें पतंग उड़ाना अच्छा लगता है तो फिर ढूँढो कि पतंगबाज़ी से निर्वाह कैसे होगा। और जब मैं कह रहा हूँ कि पतंग उड़ाना अच्छा लगता है तो उसका मतलब ये नहीं है कि उससे तुम्हें प्रतिस्पर्धा का मज़ा मिलता है, रोमांच आता है इत्यादि।
काम वो होना चाहिए जो बिलकुल भिगा दे। जिसे डूबकर ही कर सको। कर्म माने गति; मन की गति, तन की गति और गति का तो एक ही उद्देश्य है, अगति तक पहुँचना, शान्ति तक पहुँचना।
तो वो काम कुछ भी हो सकता है, अगर वो काम तुम्हारे मन का है तो उसके बाद सृजनात्मकता इसमें लगाओ कि काम तो अब यही करेंगे, और कुछ नहीं करने वाले, ये करते-करते क्या विधि लगाएँ कि कुछ पैसा भी मिल जाए। कुछ पैसा ‘भी’ मिल जाए। कुछ पैसा?
श्रोतागण: भी मिल जाए।




