(गीता-8) धर्म के झूठे रूप को तोड़ते श्रीकृष्ण || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

आचार्य प्रशांत कर्मयोग की बात शुरू हो गयी है। लेकिन इससे पहले कि योग की बारीकियों में, सूक्ष्मताओं में कृष्ण प्रवेश करें। वो दो बातें कहते हैं अर्जुन से बल्कि चेताते हैं। जो पहली बात है वो ये कि कर्मयोग की उपादेयता क्या है। तो क्या कहते हैं? हम चर्चा कर चुके हैं परन्तु दोहराना उचित रहेगा। 'इस निष्काम कर्मयोग में प्रारम्भ किये कर्म का नाश नहीं है और कर्म न करने से होने वाला पाप भी नहीं होता, इस निष्काम कर्मयोग का अति अल्प अनुष्ठान भी महान भय से रक्षा करता है।'
इसमें जो शुरू होता है उसका कोई अन्त नहीं होता। क्योंकि अन्त और आरम्भ दोनों ही मात्र प्रकृति के भीतर होते हैं। निष्काम कर्मयोग का लक्ष्य प्रकृति के भीतर होता ही नहीं। प्रकृति माने ये पूरा ये संसार। निष्काम कर्मयोग में आप इस दुनिया से, संसार से कुछ चाह ही नहीं रहे होते। यहाँ का कुछ चाहा होता तो कर्म का दो प्रकार से अन्त हो सकता था। पहला, जिसकी कामना है वो प्राप्त हो जाए तो भी कर्म का अन्त हो जाता है। दूसरा, जिसकी कामना है उसका ही अन्त हो जाए तो भी कर्म का अन्त हो जाता है। परन्तु जब सत्य के प्रार्थी होते हैं आप तो कर्म का कोई अन्त नहीं होता या आप कह सकते हैं कि कर्म अनन्त हो जाता है, या कर्म अनन्त को लक्ष्य करके किया जाता है। कर्म का कोई क्षुद्र विषय नहीं होता, किसी छोटी कामना के वशीभूत कर्म नहीं किया जाता। और कर्म न करने से होने वाला पाप भी नहीं होता।
पाप-पुण्य इत्यादि नैतिक धारणाएँ हैं, कर्तव्य मूलक धारणाएँ हैं। निष्काम कर्मयोग में न पाप की, न पुण्य की, न उनसे जुड़े हुए सुख-दुख की कोई महत्ता होती है। आप अगर कुछ करते हैं निष्काम भाव से तो वो पुण्य अथवा सुख, अथवा स्वर्ग के लिए नहीं करते। और अगर आप कुछ करने से पीछे हटते हैं तो उसका कारण भी यही होता है कि वो कर्म मुक्ति की ओर ले जाने वाला नहीं था। मुक्ति की ओर कर्म नहीं ले जा रहा, आपने नहीं किया अब इसमें पाप क्यों लगेगा?
तो निष्काम कर्मयोगी जो करता है उसमें उसको दुख नहीं मिलता, और जो नहीं करता है उसमें भी उसको पाप अर्थात् दुख नहीं मिलता। दोनों ही स्थितियों में वो दुख से बचा रह जाता है। फिर कहते हैं कि ये निष्काम कर्मयोग सम्बन्धी ज्ञान तो एक ही है लेकिन लोगों की बुद्धि अलग-अलग तरीक़े की है, और आशा ये है कि इसीलिए इस ज्ञान की विवेचना अलग-अलग तरीक़े से की जाती है; निर्भर इस पर करता है कि सुनने वाला कौन है।









