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(गीता-8) धर्म के झूठे रूप को तोड़ते श्रीकृष्ण || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2022)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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आचार्य प्रशांत कर्मयोग की बात शुरू हो गयी है। लेकिन इससे पहले कि योग की बारीकियों में, सूक्ष्मताओं में कृष्ण प्रवेश करें। वो दो बातें कहते हैं अर्जुन से बल्कि चेताते हैं। जो पहली बात है वो ये कि कर्मयोग की उपादेयता क्या है। तो क्या कहते हैं? हम चर्चा कर चुके हैं परन्तु दोहराना उचित रहेगा। 'इस निष्काम कर्मयोग में प्रारम्भ किये कर्म का नाश नहीं है और कर्म न करने से होने वाला पाप भी नहीं होता, इस निष्काम कर्मयोग का अति अल्प अनुष्ठान भी महान भय से रक्षा करता है।'

इसमें जो शुरू होता है उसका कोई अन्त नहीं होता। क्योंकि अन्त और आरम्भ दोनों ही मात्र प्रकृति के भीतर होते हैं। निष्काम कर्मयोग का लक्ष्य प्रकृति के भीतर होता ही नहीं। प्रकृति माने ये पूरा ये संसार। निष्काम कर्मयोग में आप इस दुनिया से, संसार से कुछ चाह ही नहीं रहे होते। यहाँ का कुछ चाहा होता तो कर्म का दो प्रकार से अन्त हो सकता था। पहला, जिसकी कामना है वो प्राप्त हो जाए तो भी कर्म का अन्त हो जाता है। दूसरा, जिसकी कामना है उसका ही अन्त हो जाए तो भी कर्म का अन्त हो जाता है। परन्तु जब सत्य के प्रार्थी होते हैं आप तो कर्म का कोई अन्त नहीं होता या आप कह सकते हैं कि कर्म अनन्त हो जाता है, या कर्म अनन्त को लक्ष्य करके किया जाता है। कर्म का कोई क्षुद्र विषय नहीं होता, किसी छोटी कामना के वशीभूत कर्म नहीं किया जाता। और कर्म न करने से होने वाला पाप भी नहीं होता।

पाप-पुण्य इत्यादि नैतिक धारणाएँ हैं, कर्तव्य मूलक धारणाएँ हैं। निष्काम कर्मयोग में न पाप की, न पुण्य की, न उनसे जुड़े हुए सुख-दुख की कोई महत्ता होती है। आप अगर कुछ करते हैं निष्काम भाव से तो वो पुण्य अथवा सुख, अथवा स्वर्ग के लिए नहीं करते। और अगर आप कुछ करने से पीछे हटते हैं तो उसका कारण भी यही होता है कि वो कर्म मुक्ति की ओर ले जाने वाला नहीं था। मुक्ति की ओर कर्म नहीं ले जा रहा, आपने नहीं किया अब इसमें पाप क्यों लगेगा?

तो निष्काम कर्मयोगी जो करता है उसमें उसको दुख नहीं मिलता, और जो नहीं करता है उसमें भी उसको पाप अर्थात् दुख नहीं मिलता। दोनों ही स्थितियों में वो दुख से बचा रह जाता है। फिर कहते हैं कि ये निष्काम कर्मयोग सम्बन्धी ज्ञान तो एक ही है लेकिन लोगों की बुद्धि अलग-अलग तरीक़े की है, और आशा ये है कि इसीलिए इस ज्ञान की विवेचना अलग-अलग तरीक़े से की जाती है; निर्भर इस पर करता है कि सुनने वाला कौन है।

आगे बताते हैं कि कौन-से लोग हैं जिनको ये ज्ञान समझ में नहीं आता। जिनको बता भी दो, किसी प्रकार थोड़ा समझा भी दो तो उनके भीतर ये ज्ञान टिकता नहीं है। उनके क्या लक्षण बताए हैं? आपको स्मृत होना चाहिए क्योंकि पिछले ही सत्र में बात हुई है। पर मैं दोहराए देता हूँ – अल्पबुद्धि वाले, कम बुद्धि वाले लोगों के लिए ये ज्ञान किसी काम का नहीं है; वेदोक्त काम्य कर्मों की प्रशंसा करने वाले।

वेदों में दो खंड होते हैं — काम्यखंड और मोक्षखंड। एक खंड है जिसमें विधियाँ वर्णित हैं, जिनसे कामनाओं की पूर्ति होती है। सब कर्मकांड उसी खंड में आ जाता है। और जो दूसरा खंड है वो ज्ञानखंड है। उसमें कामनाओं की पूर्ति की कोई बात नहीं है, उसमें कामनाओं की मुक्ति की बात है; कामनाओं से आप कैसे मुक्त हो सकते हैं। निश्चित रूप से वेदों की महत्ता ज्ञानखंड के कारण ही है। और श्रीकृष्ण भी यहाँ पर भी एकदम स्पष्ट करे दे रहे हैं, कह रहे हैं, 'जिन लोगों की बुद्धि वेदोक्त काम्यकर्मों में ही जाकर अटक गयी है उनके मन में वास्तविक ज्ञान टिक नहीं पाता।’ क्यों? क्योंकि उनके मन में तो कामना टिकी हुई है न।

हे अर्जुन, ऐसे लोगों के मन में मेरे द्वारा दिया गया ज्ञान नहीं टिक पाताः

१. कम बुद्धि वाले २. वेदों के कामनायुक्त कर्म (कर्मकांड) की प्रशंसा करने वाले ३. कर्मकांड करके जन्म-पुनर्जन्म व स्वर्गसुख को ही पुरुषार्थ मानने वाले ४. सुख भोग तथा वैभव देने वाली अनेक धार्मिक क्रियाओं में आसक्त रहने वाले ५. अपने कामनायुक्त मत के समर्थन में मधुर बातें कहने वाले ६. भोग और ऐश्वर्य में मोहित चित्त वाले

देखिए, वेद अपनेआप में पूरी तरह से आध्यात्मिक ग्रन्थ नहीं हैं। वेदों का एक बड़ा भाग भौतिक कामनाओं की पूर्ति हेतु है, उसका कोई आध्यात्मिक कोण नहीं है। आपके खेतों में फसल अच्छी उगे, आपकी गायें ज़्यादा दूध दें, आपको सन्तानों की, पुत्रों की प्राप्ति हों, आपका कुल, कुटुम्ब-कुनबा स्वस्थ रहें, खूब फले-फूले बढ़े, आपके शत्रुओं का नाश हो जाए, सब देवता इत्यादि आप पर प्रसन्न रहें और आपके सुख की वृद्धि होती रहे, इन सब कामनाओं की पूर्ति हेतु कर्मकांड में मन्त्र और विधान हैं। ये भाग आध्यात्मिक नहीं है। वेदों के आध्यात्मिक भाग को उपनिषद् अथवा वेदान्त कहते है। वेदान्त का अर्थ होता है वो उद्देश्य जिसके लिए वेदों की रचना हुई। वेदों की रचना इसलिए नहीं हुई है कि आपकी इच्छाओं की पूर्ति हो जाए। और इच्छाओं की पूर्ति सम्बन्धी बहुत सारे वेदों में मन्त्र इत्यादि दे रखे हैं।

पर जानने वाले सदा से जानते रहे हैं और श्री कृष्ण भी यहाँ पर यही समझा रहे हैं कि वेदों का वो हिस्सा जिसमें इच्छाओं की पूर्ति के लिए मन्त्रों आदि का विधान है, वो कोई विशेष महत्व नहीं रखता। दूसरी बात इच्छाएँ तो कालानुसार होती है और इच्छाओं की पूर्ति की विधियाँ भी काल अनुसार बदलती रहती है। तो वेदों का वो भाग जो देवताओं की स्तुति आदि करता है ताकि आपकी मनोकामनाएँ पूरी हो जाएँ, आज वो कोई महत्व नहीं रखता। क्योंकि आज के समय में इच्छाओं की पूर्ति के साधन दूसरे हैं।

समय बदल गया है, मनुष्य बदल गया है। मनुष्य के मन का पूरा माहौल बदल गया है। क्या नहीं बदला है बस? मन का केंद्र नहीं बदला है बाक़ी सब कुछ बदल चुका है। मन का केंद्र जहाँ अटक जाता है, जहाँ बँधा होता है वहाँ से उसे मुक्ति देने वाले वेदों के हिस्से का भाग का नाम है उपनिषद्। तो उपनिषद् ही है मात्र जो महत्व के हैं – ये बात हम नहीं कह रहे, ये बात स्वयं श्री कृष्ण कह रहे हैं। और आगे अभी वो इस बात को और समझा कर कहेंगे, आने वाले श्लोकों में।

लेकिन दुख की बात ये है कि अधिकांश सनातनियों को वेदों का तो कुछ पता ही नहीं हैं, और जिन्हें वेदों का पता भी हैं वो कर्मकांड में ही उलझे हुए हैं। उन्हें लगता है वेदों का अर्थ है यही सब यज्ञ, हवन, पूजा आहुति, व्रत, उपवास आराधना, उपासना और कहते हैं कि यही तो वेद है, यही तो हमारा धर्म है।

ये जितनी बातें हैं वो एक तरफ़ और ज्ञानखंड एक तरफ़। वेद इसलिए हैं कि आप उनमें निहित दर्शन को अपनाएँ। वेदों का दर्शन, वेदों का अमृत, वेदों का शिखर, वेदों का अन्त, माने वेदों का आखिरी उद्देश्य हैं, 'उपनिषद'। इसीलिए श्रीमद्भगवतगीता को गीतोपनिषद् कहा जाता है। वेदों का चरम, वेदों का उत्कर्ष हैं, उपनिषद्। वेदों के कालातीत हिस्से को, जो कभी पुराना नहीं पड़ने वाला उसको कहते हैं, उपनिषद्।

समझ में आ रही है बात?

तो श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जो लोग वेदोक्त काम्य कर्मों में ही पड़े रहते हैं, वहीं सुख ढूँढते रहते हैं उनको वास्तविक ज्ञान कभी समझ में नहीं आता। इसी तरीक़े से जिन लोगों के कर्मों का उद्देश्य बस स्वर्ग आदि सुख पाना है, उनको भी वास्तविक ज्ञान समझ नहीं पाता। जो दिनभर जो कुछ करते हैं, जीवनभर बस सुख के लिए ही काम करते हैं, उनको भी ज्ञान समझ में नहीं आएगा। क्योंकि उनको ज्ञान चाहिए ही नहीं, उनको तो सुख चाहिए। ज्ञान का उद्देश्य आपको सुख देना नहीं होता। ज्ञान का उद्देश्य आपको सुख-दुख दोनों से मुक्ति देना होता है। ये दो तरह की बातें हैं और इनमें बहुत बड़ा अन्तर है।

अधिकांशतः धर्म के नाम पर जो कुछ होता है वो सुख पाने के लिए होता है। ‘मेरी मनोकामनाएँ पूरी हो जाए’ ईश्वर इसलिए है। मन्दिर इसलिए है, देवी देवता इसलिए है कि ये मेरी कामनाएँ पूरी कर दें, ये मेरी रक्षा करें, इत्यादि-इत्यादि बातें। ये कोई आध्यात्मिक बात नहीं है। धर्म के नाम पर अधिकांशतः जो होता है उसमें अध्यात्म कहीं नहीं है, उसमें बस कामना पूर्ति है, कामनापूर्ति। वो पूरी तरह से भौतिक चीज़ है, वो पूरे तरीक़े से मटेरियलस्टिक (पदार्थवादी) है। ये सुनकर आप में से हो सकता है, कइयों को आश्चर्य हो। लेकिन धर्म भी निन्यानवे प्रतिशत भौतिक ही है पदार्थवादी है, मटेरियलिस्टिक है क्योंकि वो बस आपकी कामनापूर्ति का अनुष्ठान बना हुआ है।

एक के बाद एक आपको मन्त्र मिल जाएँगे, पूजाएँ मिल जाएँगी, विधियाँ मिल जाएँगीं; ये करो, वो करो। फलाना व्रत करो तो फलानी मनोकामना पूरी होगी। मनोकामनाएँ तो सारी इसी दुनिया की होती है न, भौतिक होती हैं। तो धर्म भी बस पदार्थवादी है, धर्म में भी गहरा भोगवाद घुसा हुआ है। धार्मिक ग्रन्थों में भी ज़बरदस्त पदार्थवाद, भोगवाद, कंज़्यूमरिज़्म और मटेरियलिज़्म है। इसलिए श्री कृष्ण कह रहे हैं कि जो लोग वेदों के काम्यभाग में ही फँसे रहते हैं, उनको ज्ञान समझ में नहीं आता। क्योंकि वो भाग तो पूरे तरीक़े से भोगवादी है, पदार्थवादी है।

समझ में आ रही है बात?

तो धर्म का भी एक बहुत छोटा-सा भाग है, जो वास्तव में आध्यात्मिक है। यही कारण है कि जानने वालों को धर्म और अध्यात्म में भेद करके बताना पड़ा। अन्यथा धर्म और अध्यात्म एक ही बात होना चाहिए। शुद्धतम अर्थों में धर्म ही अध्यात्म है; लेकिन शुद्धतम अर्थों में। व्यवहार में धर्म और अध्यात्म में बहुत अन्तर है। व्यवहार में धर्म क्या है? कामनापूर्ति का साधन, और वो भी कामना पूर्ति का बड़ा बेतुका और असफल साधन। आपको कामना है कि आपका घर बन जाए। घर बनाने के लिए आपको मेहनत करनी पड़ेगी तो एक साधन तो ये है कि आप सांसारिक तल पर जोड़-तोड़ करें, मेहनत करें, कुछ उपाय लगाएँ कि पैसा आ जाए तो घर बन जाए। और वही जो भौतिक लक्ष्य है कि मेरा घर बन जाए उसका एक बेतुका साधन धर्म भी बन जाता है। कैसे? मैं जाकर के मन्दिर में खड़ा हो जाऊँगा और प्रार्थना करूँगा कि हे ईश्वर, मेरा घर बनवा दो।

तो पहली बात तो इसमें लक्ष्य पूरी तरह भौतिक है कि मेरा ईट-पत्थर का घर बन जाए। दूसरी बात, जो साधन अपनाया गया है, वो बहुत बेतुका है, वो साधन असफल रहेगा। वो जो साधन है उससे मोक्ष तो नहीं मिलना है क्योंकि मोक्ष तो माँगा ही नहीं जा रहा, घर भी नहीं मिलना है क्योंकि कहीं मन्दिर में मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो जाने से नहीं बन जाता। अगर घर ही बनवाना या पैसे ही कमाना आपका लक्ष्य है तो उसके लिए तो आपको संसार के नियम-क़ायदों पर चलना पड़ेगा, और सांसारिक तौर-तरीक़ों से पैसे वगैरह कमाने पड़ेंगे।

तो जो कर्मकांड वाला हिस्सा है धर्म का, वो एकदम व्यर्थ है। पहली बात, व्यर्थ क्यों है? हमने कहा, 'पहली बात उसका लक्ष्य भौतिक है।' ये कौनसा धर्म है जिसका भौतिक लक्ष्य होगा? और दूसरी बात, वो जो भौतिक लक्ष्य है वो भी उस तरीक़े से नहीं पाया जा सकता जिस तरीक़े से कर्मकांड में वर्णित है। क्या आप सोचो कि आप यज्ञ करके देवताओं को प्रसन्न कर लोगे तो आपके खेतों में फसलें ज़्यादा बेहतर होंगी, ऐसा हो सकता है क्या? तो इसीलिए श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि जो लोग वेदोक्त काम्यकर्मों की प्रशंसा करते नहीं अघाते, उन्हें ज्ञान कभी समझ में नहीं आता।

वेदों में भी कामनापूर्ति की ही अधिकांश बातें हैं। उन बातों में कोई दम नहीं, उन बातों में कोई अमरता नहीं। लेकिन वेद नि:सन्देह अमर हैं। वेद क्यों अमर हैं? वेद उपनिषदों के कारण अमर हैं, वेद वेदान्त के कारण अमर हैं। वेदान्त वेद से अलग नहीं है; वेद बनाम वेदान्त ऐसा यहाँ कोई बहस या विचार नहीं हो रहा है। वेदों के ही शीर्षस्थ भाग को ही वेदान्त कहते हैं। और वेदान्त ही है वेदों का वो हिस्सा जो सदा प्रासंगिक रहेगा। जिसका सत्य कभी पुराना नहीं पड़ने वाला, जिसको आप कभी खारिज नहीं कर पाओगे ये कहकर कि ये बात अब तिथि-बाह्य हो गयी, पुराने जमाने की है, आज इस बात का कोई उपयोग या मूल्य नहीं। ये बात आप उपनिषदों के साथ, वेदान्त के साथ कभी नहीं कह पाएँगे।

इसलिए मैं बार-बार कहता हूँ कि सनातन धर्म का अर्थ ही है 'वेदान्त'। कि वैदिक धर्म का अर्थ ही है 'वेदान्तिक धर्म'। और जो अपनेआप को हिन्दू या सनातनी कहता हो और वेदान्त से अपरिचित हो, उसे अपनेआप को सनातनी कहने का कोई अधिकार ही नहीं है। सनातनी होने का अर्थ ही यही है, जो वेदान्त का अनुसरण करता है सिर्फ़ वही सनातनी है, और कोई नहीं। जिसको उपनिषद् और गीता की न समझ है, न उनसे प्रेम वो कहाँ का सनातनी हो गया?

'कामनायुक्त और स्वर्ग-लाभ को ही परम पुरुषार्थ मानने वाले' वही बात, जो भौतिक कामनाओं में पड़े हुए हैं। स्वर्ग माने एक सुख की जगह, बड़े सुख की जगह को स्वर्ग कहते हैं। बड़े सुख की कल्पना को स्वर्ग कहते हैं। तो जो लोग सोचते हैं कि बस किसी तरह स्वर्ग जैसा सुख मिल जाए उनके लिए ज्ञान नहीं है। वो तो अभी मन के झमेले में पड़े हुए हैं, उनको ज्ञान का क्या काम?

'जन्म रूप, कर्मफल तथा सुख भोग और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली अनेक प्रकार की क्रियाओं के प्रति आसक्त लोग जो अपने मत की पुष्टि में, सुनने में सुखकर बातें कहा करते हैं। उनसे भोग और ऐश्वर्य में लिखा आसक्त व्यक्तियों का चित्त मोहित हो जाता है।' ' जन्म रूप, कर्मफल, सुखभोग और ऐश्वर्य प्रदान करने वाली तमाम क्रियाओं के प्रति आसक्त लोग ऐसा कर लो तो इस तरह का सुख मिलेगा, ऐश्वर्य मिलेगा, विभूतियाँ, सिद्धियाँ मिल जाएँगी; इस तरह के जितने लोग होते हैं उनका चित्त मोहित और आसक्त रहता है। और उन्हें कुछ ज्ञान की बात, कोई ढंग की बात समझ में नहीं आती। ज्ञान उनको बता भी दो तो उनके भीतर टिकता नहीं है, क्योंकि उनके भीतर तो कामनाएँ और सुख के भोग की इच्छा ही गहराई से टिकी होती है, पार्थ! उन्हें कुछ समझ में नहीं आता। उनके मन में बस इच्छाएँ हैं, इच्छाएँ हैं, कामनाएँ हैं, आसक्तियाँ हैं।' ऐसे लोगों के अन्तःकरण में ईश्वर सम्बन्धी निश्चयात्मक ज्ञान टिक नहीं पाता। 'ऐसों को ईश्वर सम्बन्धी निश्चयात्मक ज्ञान समझ में नहीं आता है, पार्थ!'

अब आज पैतालीसवाँ श्लोक —

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रेगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।२.४५।।

हे अर्जुन! वेद सत्त्व, रज, तम, इन तीन गुणों वाले हैं अर्थात् कामना-मूलक हैं। तुम इन तीनों गुणों से अतीत अर्थात् निष्काम हो जाओ। सुख-दुःखादि द्वन्द्वों से रहित, सदा आत्मनिष्ठ अर्थात् सदा धैर्यशील तथा आवश्यक वस्तु की प्राप्ति और उसकी रक्षा में प्रयत्न-रहित, स्वस्थ अर्थात् आत्मवान् हो जाओ।

~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ४५)

हे अर्जुन! वेद सत, रज, तम इन तीन गुणों वाले हैं अर्थात् मूलक हैं। वही जो बात थोड़ी देर पहले हमने कहीं, वेद कामना मूलक हैं। क्योंकि वेदों में कामनापूर्ति के लिए ही तमाम बातें और युक्तियाँ और मन्त्र दिये गए हैं तो वेद कामना मूलक है। और वेदों में जो बातें हैं वो सब प्रकृति के आयाम की ही हैं। इसीलिए कह रहे हैं श्री कृष्ण कि वेद सत्, रज, तम आदि गुणों वाले हैं। गुणों का अतिक्रमण नहीं करते, निर्गुण की बात नहीं करते वेद। निर्गुण की बात कौन करता है? वेदान्त। निर्गुण की बात कहाँ होती है? श्रीमद्भगवद्गीता में होती है। प्रकृति से आगे जाना है, ये बात कौन बताता है? ये बात उपनिषद् बताते हैं। उपनिषद् वेदों के ही हिस्से हैं। पर वेदों के शरीर का जो बड़ा भाग है, वो प्रकृति के भीतर-भीतर की ही बातें करता है।

देखिए, समझिए वेद क्या हैं? जितना भी ज्ञान उपलब्ध था, वो सब संचित करा गया, संकलित कर दिया गया और उस संकलन का नाम दिया गया 'वेद।' वेद माने ज्ञान, जो कुछ भी पता था। अब अधिकांशतः जो पता होगा वो तो भौतिक ही पता होगा न। तो इसलिए वेदों में भी अधिकांशतः भौतिकता ही है। लेकिन भौतिकता के मार्ग पर चलते-चलते वेद भौतिकता का अतिक्रमण कर जाते हैं। जिस जगह पर जाकर वेद भौतिकता का अतिक्रमण कर जाते हैं उसको बोलते हैं, वेदान्त। ठीक है? अधिकांशतः मैं दोहरा रहा हूँ कि हमें वेदान्त से कोई प्रयोजन ही नहीं होता, अगर हम वेदों की ओर देखते भी हैं तो बस कामनापूर्ति के लिए। और हम देखते हैं कि इस वेद में ऐसा कहा गया है, कहीं पर तो टोने-टोटके की भी बात है, हम उसकी ओर भी देख लेते हैं। कहीं इस देवता को प्रसन्न करने के लिए कोई बात कही गयी है। देवताओं को प्रसन्न करना ही क्यों हैं? देवताओं को इसलिए प्रसन्न करना हैं कि प्रसन्न नहीं किया तो कहीं कुपित न हो जाए, और प्रसन्न हो जाएँगे तो कुछ वरदान दे देंगे, कुछ इच्छा पूर्ति वगैरह हो जाएगी।

वेद सत, रज, तम इन तीन गुणों वाले हैं अर्थात् कामना मूलक हैं। तुम इन तीन गुणों से अतीत अर्थात् निष्काम हो जाओ। 'वेद तो सत, रज, तम में ही फँसे हैं पार्थ। तुम ये सत, रज, तम, अर्थात प्रकृति से आगे निकल के निष्काम हो जाओ, तुम वेदों से आगे निकल जाओ। वेदों से आगे निकलने का मतलब किससे आगे निकलना? कर्मकांड से आगे निकलना। जो काम्यकर्म भाग है वेदों का उससे आगे निकल जाओ।

और ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आज भी जब हम कहते हैं, 'वेद'। तो अधिकतर हमारा आशय किससे होता है? यही कर्मकांड से होता है। क्योंकि न तो हमने वेद पढ़े हैं, न हमने गीता पढ़ी है, न हमें कृष्ण से कोई प्रेम है। तो कृष्ण साफ़-साफ़ समझा रहे हैं कि वेद, कामनामूलक हैं और वेदों से आगे निकल जाओ पार्थ। लेकिन ये बात, पहली बात तो हम सुनते नहीं और सुन भी ली तो इस बात को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं।

समझ में आ रही है बात?

एक ग़लती तो ये है कि आप वेदों की ओर देखें ही नहीं, और दूसरी ग़लती ये है कि आप वेदों की ओर देखें और कर्मकांड में उलझकर रह जाएँ। अभी ऐसा भी हुआ है पिछली शताब्दी से, और इस शताब्दी में भी, कि धाराएँ उठी हैं जो वेदों की बात करती हैं कि चलो वेदों का सम्मान वापस लेकर के आना है, वेदों की ओर पुनः जाना है। पर उन्होंने भी यही भूल करी है, जब वेदों की बात करते हैं तो यही, कामनामूलक कर्मकांड में ही ज़्यादा उलझ जाते हैं। जिसका साफ़-साफ़ निषेध कर रहे हैं कृष्ण यहाँ पर वो उसी काम में उलझ जाते हैं। 'सुख-दुख आदि द्वन्दों से रहित सदा आत्मनिष्ठ अर्थात् सदा धैर्यशील तथा आवश्यक वस्तु की प्राप्ति और उसकी रक्षा में प्रयत्न रहित स्वस्थ अर्थात आत्मवान् हो जाओ।'

आत्मवान् हो जाओ, प्रकृति से आगे निकल जाओ। वेद कामनामूलक हैं, वेद प्रकृति के आयाम में ही गति कर रहे हैं, तुम प्रकृति से आगे निकलकर के आत्मस्थ हो जाओ। सुख-दुख इत्यादि जितने द्वन्द है ये सब कहाँ पाये जाते हैं? प्रकृति में पाये जाते हैं, आगे निकलो पार्थ, आगे निकलो-आगे निकलो। 'आत्मा हो तुम न जाने क्या बने बैठे हो! जो तुम बने बैठे हो उसका भी लक्ष्य यही है कि उसे आत्मा ही हो जाना है। सदा आत्मनिष्ठ रहो।’

“नियोगक्षेम, आत्मवान भव।”

जो आवश्यक वस्तु है, उसी की प्राप्ति में संलग्न रहो इस तरीक़े से कि कर्म तुम्हारा प्रयत्न रहित रहे। प्रयत्न सारा करा जाता है प्रकृति के आयाम में। आत्मा की ओर बढ़ने में प्रयत्न नहीं आवश्यक होता, समझ आवश्यक होती है।

तो क्या समझ भर से काम चल जाता है, प्रयत्न अर्थात् श्रम करना ही नहीं पड़ता? नहीं, करना पड़ता है पर आवश्यक समझ होती है। उस समझ के बाद जो श्रम होना होता है वो अपनेआप होता है। भलीभाँति समझिएगा, श्रम का बहुत महत्व है लेकिन श्रम का कोई महत्व नहीं है। वास्तविक बात है बोध। जो समझ गया वो बड़े-से-बड़ा श्रम कर जाता है। और उसके श्रम में एक निष्प्रयत्नता रहती है एफर्टलेसनेस (श्रमरहित) क्योंकि उसको पता है कि ये होना ही है। कोई और तरीक़ा नहीं, कहीं बचने का कोई उपाय नहीं, बात निर्विकल्प है।

जहाँ आप निर्विकल्प हो जाते हो, वहाँ मन को कष्ट होना बन्द हो जाता है। इस बात को थोड़ा समझिएगा, बात सूक्ष्म है। किसी भी स्थिति में आपको यदि मानसिक पीड़ा हो रही होती है तो उसका कारण मानसिक द्वन्द होता है। द्वन्द माने क्या? जहाँ दो उपलब्ध हैं। आपकी एक स्थिति है वो आपको मानसिक तौर पर दुख तभी देती है जब आप ये कल्पना कर पायें कि आप इस स्थिति से अलग किसी सुखदायी स्थिति में हो सकते थे। तब भीतर विरोध उठता है, उसी विरोध का नाम दुख है। आप किसी स्थिति में हैं और मन यदि ये कल्पना कर पा रहा है कि आप इस स्थिति से अलग भी किसी और स्थिति में हो सकते थे, जिसमें आपको सुख मिलता तब भीतर से वर्तमान स्थिति के प्रति विरोध उठता है, उसको दुख कहते हैं।

जो निर्विकल्प हो जाता है वो इस कष्ट से बच जाता है। क्योंकि उसको पता होता है कि स्थिति जैसी भी है उसको वैसा ही होना है, दूसरे रास्ते कब के बन्द हो चुके; अब विरोध करने से, रोने से, छाती पीटने से अर्थात् दुख मनाने से लाभ क्या। लाभ की बात भी तब आती है जब तुलना करने के लिए कुछ तो उपलब्ध हो न। लाभ और हानि, किसी की भी गणना करनी है तो दो आँकड़े चाहिए होते हैं न, एक ही आँकड़ा बताया जाए और पूछा जाए, ‘बताओ, कितना लाभ हुआ?’ तो क्या बता पाओगे? मैं तुमसे कहूँ, ‘दस हज़ार’, बताओ कितना लाभ हुआ। बताओ। बताओ, कितना लाभ हुआ? कुछ दूसरा चाहिए न, उसमें जोड़ने या घटाने के लिए तब बता पाओगे कुछ लाभ हुआ कि कुछ हानि हुई और कितना हुआ।

जो निर्विकल्प हो जाता है उसके पास वो दूसरा होता ही नहीं वो गणना कैसे करे उसको बोलोगे, दस हज़ार वो बोलेगा, दस हज़ार। जो है सो है, दस हज़ार तो दस हज़ार। और दस तो दस। और दस आये तो दस आये, दस गये तो दस गये। इसके अलग जब कुछ हो ही नहीं सकता। इसके इतर जब कोई सम्भावना ही नहीं है, तो कहाँ को देखें? कैसे तुलना करें? और कैसे दुख मनाऍं? सुख का भी अनुभव कैसे करें?

समझ में आ रही है बात?

तो ये जो एफर्टलेसनेस होती है, प्रयत्न से आगे की जो स्थिति होती है। उसका अर्थ श्रम की अनुपस्थित से मत लगा लीजिएगा। वहाँ श्रम पूरा-पूरा होता है, बस मानसिक क्लेश नहीं होता। श्रम की तो जितनी आवश्यकता है, उतना करा जाएगा। श्रम करना तो वहीं पर रुकेगा, जहाँ शरीर की शारीरिक सीमाऍं टूटने लग जाऍं। जहाँ देहबन्ध ही जवाब देने लग जाए। श्रम तो बस वहीं रुकेगा, माने श्रम की कोई सीमा नहीं है। श्रम की सीमा देह मात्र है; मृत्यु मात्र है। श्रम पूरा होगा, प्रयत्न नहीं होगा। ये दो अलग-अलग बातें हैं, वर्क और एफर्ट। श्रम पूरा होगा, प्रयत्न नहीं होगा।

बहुत कुछ किया, भीतर से एक अविरोध था। क्योंकि विरोध तभी उठता है, जब विकल्प उठता है। न विकल्प था, न विरोध था। आपके पास भी अगर कोई समुचित काम हो और उस काम को करने में भीतर से कभी विरोध उठता हो, तो विरोध से मत लड़ने लग जाइएगा। नहीं जीत पाऍंगे। आप तलाशिएगा कि विकल्प कहाँ से उठा लाये आप। विकल्प नहीं होता तो विरोध नहीं होता। आप तलाशिएगा कि मन चोरी से किसी विकल्प की रचना कैसे कर रहा है। और मन कर रहा है, मन कहीं कोई चोर दरवाज़ा खोल रहा है। उसी चोर दरवाज़े की उपस्थिति या मानसिक या काल्पनिक उपस्थित अब दुःख दे रही है। क्योंकि अब आप तुलना कर पाऍंगे, आप कहेंगे, ‘देखो वो चोर दरवाज़ा उसमें कितना सुख मिलता है। और जो अभी कर रहा हूँ, उसमें श्रम करना पड़ रहा है’, और श्रम तो करना पड़ ही रहा है।

निष्काम कर्म योगी बड़ा श्रमशील होता है। रुकता ही नहीं, मेहनत ही करता जाता है, करता ही जाता है, करते ही जाता है। सुख तो उसको चाहिए ही नहीं। उसको सत्य चाहिए। जिन्हें सत्य नहीं चाहिए, सुख चाहिए; वो श्रम से बचते हैं। ढूॅंढिएगा, दूसरा कौनसा आपने विकल्प तैयार कर लिया है। उसी विकल्प के कारण अब काम के प्रति विरोध उठता है। विरोध उठ रहा है, विरोध उठ रहा है।

हम सोचते हैं विरोध में हमने कोई पाप कर दिया। विरोध में नहीं हुआ है पाप, चूक हुई है। चूक कहाँ हुई है? मन ने चोरी से किसी विकल्प को रच लिया है। आप देखिए वो विकल्प कहाँ छुपा बैठा है। क्या सोच रहे हैं आप? और विकल्प का करना क्या है फिर? विकल्प के प्रति निष्पक्ष रवैया रखना है भई। क्या पता? विकल्प अच्छा ही हो। मन तो अपनेआप को बड़ा धुरंधर होशियार ही मानता है, क्या पता कोई बड़ा अच्छा विकल्प आ गया हो? तो चलते हैं, चलते हैं। जब विकल्प है ही तो उसको एक चोरी की तरह छुपाकर क्या रखना? जाकर विकल्प को उघाड़ ही देते हैं। और पूछते हैं, ‘बता-बता-बता, तू मिलवाएगा कृष्ण से? (हँसते हुए) ये जो चोर सुरंग तैयार करी है, ये कहाँ को खुलती है?’ मन ऐसे ही है चूहे जैसा, वो सुरंगे तैयार करता रहता है नीचे-नीचे। बताता है, ये जो सुरंग है, सीधे जाकर सुख भरे स्वर्ग लोक में खुलेगी। अब वो सुरंग खुली हुई है वहाँ पर और आकर्षित कर रही है तो काम में मन कैसे लगे? काम कर रहे हैं और एक आँख से क्या दिख रही है? वो चुइया ने सुरंग खोल रखी है। वो दिख रही है कि काश उसी सुरंग में निकल जाऍं। किसी को बता भी नहीं सकते कि मन ने सुरंग तैयार कर ली है, भागने के लिए।

हम कह रहे हैं, वेदान्त समझाता है– 'सुरंग भी मन के तल पर तो एक तथ्य ही है, मन के लिए।' उसको किसी अपराध की तरह छुपाओ मत, जाओ उसके पास जाओ। ये जो मन में नया एक संसार खड़ा हो रहा हो, नये रास्ते फूट रहे हों, नयी सुरंग खुद रही हो, उसके पास जाओ और पूछो, क्या ये सुरंग वास्तव में कृष्ण के यहाँ खुलेगी? बुला तो रही है मुझे। और चला भी जाऊँ पर पहुँचूॅंगा कहाँ? सुरंग मिटती है, सुरंग से बात करने से। विकल्प मिटते हैं, विकल्पों का अन्वेषण करने से। जिनके भीतर सत्कार्य के विरुद्ध बड़ा विरोध हो, ये बहुत मॉरल क़िस्म के लोग होंगे, नैतिक।

इनकी समस्या ये है कि इनके मन ने तमाम चोर दरवाज़े तैयार कर रखे हैं, लेकिन ये इतने शर्मिंदा हैं, इतने लजाये हुए हैं उन आन्तरिक चोर दरवाज़ों की उपस्थिति से कि स्वीकार ही नहीं कर सकते कि इन्होंने इतने विकल्प तैयार कर लिये हैं। तो वो विकल्प तैयार कर भी रखे हैं, स्वयं पता भी है कि इधर भी जा सकता हूँ, उधर भी जा सकता हूँ, वहाँ भी जा सकता हूँ, वहाँ भी जा सकता हूँ लेकिन नैतिकता का तकाजा कुछ ऐसा है कि स्वीकार भी नहीं कर सकते कि हमने इतने विकल्प तैयार कर रखे हैं। तो जितनी सुरंगें हैं, उन सबके ऊपर दरी बिछा रखी है। और अपनेआप को क्या बोल रहे हैं? ‘नहीं-नहीं-नहीं-नहीं, कोई विकल्प है नहीं।’

अपना ही एक हिस्सा जानता है कि विकल्प तो खूब तैयार कर रखे हैं और अपना एक हिस्सा है जो उन विकल्पों पर पर्दा डालने में व्यस्त है। क्यों पर्दा डालने पर व्यस्त है? क्योंकि बचपन से ही किसी ने बता दिया था कि इस तरह के काम करना गन्दी बात होती है, लज्जा की बात होती है, पाप होता है पाप। ‘पाप होता है, पाप होता है। तुम मन्दिर में मौजूद हो और मधुशाला की तरफ़ सुरंग खोद रहे हो, पापी!’ लेकिन सुरंग तो खुद ही रही है। क्योंकि मधु से बड़ा मोह है। अब सुरंग खुद भी रही है क्योंकि मधु से मोह है। और बचपन से, और जवानी से जो आवाज़ें सुनी हैं, जो कह रही हैं कि मन्दिर में मौजूद हो कर मधुशाला की ओर सुरंग खोदना पाप होता है। उन आवाज़ों के मारे स्वीकार भी नहीं कर पाऍंगे कि सुरंग खोद रखी है। नतीजा? वो सुरंग मौजूद है तो आप जो काम कर रहे हो, वो काम तो करने देगी नहीं। वो आपको लगातार आकर्षित करके रखेगी।

और चूँकि आप उस सुरंग के अस्तित्व को एक्नॉलेज भी नहीं कर सकते। मान भी नहीं सकते कि आपने वो खोद रखी है। इसलिए आप कभी उसके पास जाकर के उसको अनावृत भी नहीं करोगे। चूॅंकि आप कभी पास जाकर के उसको ठीक से देखोगे नहीं, तो आपको कभी पता भी नहीं चलेगा कि वो एक अन्धी सुरंग है — ए टनल टु नो वेयर।

अब आपने वो सुरंग रखी हुई है, आपको लग रहा है मेरे जीवन में, मेरे पास एक विकल्प मौजूद है, मैं यहाँ से भाग जाऊँगा और तुरन्त उस सुरंग में घुसकर चूहे की तरह निकल लूॅंगा। और उस सुरंग को कभी आप अच्छे तरीक़े से, ठोक-बजाकर, आज़मा कर, उसमें ज़रा रोशनी करके ज़रा देख भी नहीं रहे कि खुलती कहाॅं को है? तो आपको पता भी नहीं चल रहा कि वो सुरंग मौत की सुरंग है। ये तो छोड़ दीजिए कि वो सुरंग जा करके कृष्ण के निकट खुलेगी, उस सुरंग में आप मरेंगे वो भी दम घुटने से। ऐसे लोगों की गति सबसे बुरी होती है।

वो तो अच्छे हैं ही, जिनके जीवन में इस तरह की सुरंगों के लिए कोई स्थान नहीं हैं। जो पूर्णतया निष्काम कर्मयोगी हो गये, वो कह रहे हैं हमें इधर-उधर का देखना क्या? मैं अहंकार हूँ, मेरा एक ही लक्ष्य है 'आत्मा'। मैं अर्जुन हूँ, मेरा एक ही लक्ष्य है कृष्ण। इधर-उधर से मुझे कोई मतलब ही नहीं। उनकी तो बात ही क्या करनी, वो तो श्रेष्ठतम कोटी के हो ही गये।

वो भी बुरे नहीं हैं, जो प्रकृति के मारे हुए हैं। जिनके मन के घर में बहुत सारे चोर दरवाज़़े और सुरंगें हैं। लेकिन जिनमें इतनी ईमानदारी है कि साफ़-साफ़ स्वीकार कर लेते हैं कि साहब एक उधर को (सामने दाहिनी ओर संकेत) दरवाज़ा है, जो मैंने बना रखा है, एक उधर की (सामने बायीं ओर संकेत) खिड़की है, जो तैयार कर रखी है। और जो पीछे का रोशनदान देख रहे हो न, वो भी रोशनी भीतर लाने के लिए नहीं है, मेरे बाहर जाने के लिए है। ऐसे लोग भी ठीक होते हैं। उनमें कम-से-कम एक बेबाक़ी होती हैं, एक सत्यनिष्ठा। उन्हें पता तो होता है और साफ़-साफ़ बोल तो पाते है कि धर्म इत्यादि में मेरा मन नहीं लगता, मुझे तो मधु चाहिए। ये लोग भी ठीक होते हैं। क्यों? क्योंकि जब ये स्वीकार कर लेते हैं कि इनको तो मधु में ही रस आ रहा है, तो ये उन दरवाज़ों के पास चले जाते हैं।

जब पास जाते हैं दरवाज़े खोलते हैं, थोड़ा आगे बढ़ते हैं तो फिर उन्हें पता भी चल जाता है कि दरवाज़ा नर्क का दरवाज़ा है। तो फिर ये वापस आ जाते हैं। और इस बार ये ज़रा आश्वस्ति के साथ वापस आते हैं, कहते हैं, 'न-बाबा-न! इस तरह के दरवाज़े तो मन खोलता रहता है लेकिन सब नर्क के दरवाज़े हैं। अब दोबारा कभी इनकी ओर नहीं जाऊॅंगा। जब दोबारा कभी उधर नहीं जाऊँगा तो मैं क्या हो गया फिर? मैं निर्विकल्प हो गया। जैसे ही मेरे विकल्प हटे बाहर से, सारे विरोध हटे भीतर से। विकल्प जो बाहर है, वही बनते हैं विरोध जो अब भीतर है।

समझ में आ रही बात?

इसीलिए संसार तुम्हें जिन सुखों का लालच देकर बार-बार आकृष्ट करता हो, उनको आजमाने में यदा-कदा बुद्धिमानी है। दुनिया से अपनेआप को इतना भी काटकर न रख दो कि दुनिया तुम्हारे लिए बहुत बड़ी चीज़ बन जाए। देखो तो कि संसार तुम्हें क्या दिखा-दिखा बुला रहा है। देखो तो कि संसार तुम्हें कैसे-कैसे लुभा रहा है, जाओ चले जाओ कभी-कभी उसके पास। ‘क्या है तेरे पास?’ ‘हम मधुशाला हैं।’ ‘ला भाई अपनी मधु बता, कौनसा नशा है तेरी मधु में, करके देखेंगे।’ और करके देख लो। ताकि पूरे तरीक़े से निश्चित हो जाओ कि नशा तो उतर जाता है, संसार वाला। ये कौनसा नशा है कि चढ़ा, उतर गया? दिक्क़त ये नहीं है कि चढ़ा नहीं था, दिक्क़त ये है कि उतर गया। और वापस वहीं छोड़ गया, जहाँ से शुरू करा था। बस मुॅंह और गँधा रहा है। और पैसे भी जल गये। तो कुछ मज़ा तो आया नहीं।

‘अगली बार कम-से-कम ये बोलकर मत लुभाना कि मधुशाला है। बताओ और किन तरीक़ों से हमें लुभा रहे हो। बताओ, बताओ। कौनसी रंगीनियाॅं दिखाना चाहते हो? हम देखेंगे। हम समझना चाहते हैं, तुम्हारे पास ऐसा क्या है, जिसके बूते तुम इतने लुभावने बने बैठे हो। आ रहे हैं हम। दिखाओ।’

समझ में आ रही है बात?

मैं ये नहीं कह रहा हूँ की ये श्रेष्ठतम तरीक़ा है। श्रेष्ठतम तरीक़ा तो ये है कि संसार तुम्हें लुभा रहा हो, तुम्हें पता भी न चले कि लुभा रहा है। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है, ऐसे हम होते नहीं हैं। हमें तो जब दुनिया की रंग-बिरंगी झालरें बुलाती हैं तो हमारे भीतर भी कुछ रंग-बिरंगा सा होने लगता है। मिठाई उधर बन रही होती है, लड्डू अन्दर फूट रहे होते हैं। तो ऐसे में ज़रा उन मिठाइयों के निकट जाकर के बड़े निष्पक्ष तरीक़े से चख ही लेना चाहिए कि दिखाओ न ऐसा क्या हैं? तुम्हारी मिठाई में जिसके लिए दुनिया मरती है इन पर। चखने तक की आवश्यकता पड़ेगी नहीं, साफ़ दृष्टि से देख लोगे उतना ही बहुत होगा मुक्त होने के लिए।

मन तुम्हारा माॅंग रहा है, कृष्ण रस। और दुनिया तुमको दिखा रही है, मधु रस। तुम तृप्त हो कहाँ से जाओगे? डर क्यों रहे हो? क्यों तुमको बहुत बड़ा ख़तरा प्रतीत हो रहा है? कि अरे अरे अरे, दुनिया कहीं मुझे सत्य से उखाड़ न ले जाए। कैसे उखाड़ ले जाएगी? दुनिया के पास ऐसा कुछ है ही नहीं। लेकिन बहुत सारे आध्यात्मिक लोगों की आँखों में गहरा खौफ़ रहता है। उनको लगता है, वो बड़ी बेचारगी की हालत में हैं, दुनिया उन्हें कभी परास्त कर देगी। कैसे परास्त कर देगी? दुनिया के पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो तुम्हें आनन्द छोड़ दो सन्तुष्टि भी दे सके। वो तुम्हें कैसे जीत लेगी, बताओ न। उसकी तरफ़ तो बेखौफ़ होकर जाया करो, कुछ नहीं है उसके पास। और दो-चार बार उसकी उसके पास चले गये, लिप्त होने के लिए नहीं, जाॅंचने के लिए। जाकर अच्छे से जाॅंच लो नीयत साफ़ रखना बस। ये नहीं कि पास गये और जाॅंचने की जगह भोगने लग गये। नियत ईमानदारी की अच्छे से जाओ जाॅंच लो।

बहुत बार जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, दो-चार बार बहुत है। और फिर भीतर से कभी साल-दो साल बाद वृत्ति सक्रिय होने लगे तो फिर चले जाओ। बोलो, ‘कुछ नया लाये हो क्या? पिछले साल तुम आए थे हमें न्यौता दिया था, हमनें दावत कुबूली थी और दावत के नाम पर तुमने न जाने कहाँ का मल-मूत्र परोस दिया था! इस बार कुछ नया लाये हो क्या? बहुत जोर दे-देकर चिल्ला-चिल्लाकर बुला रहे हो। बड़ा आकर्षक आमन्त्रण पत्र भेजा है, चलो इतना बुला रहे हो तो हम फिर से आ जाते हैं।’

और तुम जाओगे और पाओगे कि नया तो है, बिलकुल नया है, निस्सन्देह, एक नये तरीक़े का मल-मूत्र परोसा गया है। जाओ चख तो आओ, इतना क्या खौफ़ में बैठे हुए हो? हवाइयाॅं उड़ रही हैं, जाओ चखो और मुॅंह पर भी पोत लेना, और वापस आ कर हमें भी दिखाना। कि काम को लेकर के भीतर से बड़ा विरोध उठता था। काम माने निष्काम कर्म। निष्काम कर्म को लेकर तो बड़ा विरोध उठता था, करा ही नहीं जाता था। दोनों टाँग फैलाकर सोने भर की इच्छा होती थी। हर समय लगता था, अरे-रे-रे-रे! जन्नत छूटी जा रही है। कहाँ फँस गये हैं यहाँ, कृष्ण के मार्ग में, असली सुख तो उधर है। किधर? जिधर को हमारे चोर दरवाज़े खुलते हैं, उधर। आज़मा ही लो।

समझ में आ रही है बात कुछ।

'आत्मवान हो जाओ अर्जुन, आत्मवान हो जाओ। प्रकृति और प्रकृति की ही बातें करने वाले ग्रन्थों में मत उलझे रहो'। और प्रकृति की ही बातें करने वाले ग्रन्थों-श्लोकों को लेकर आगे जो कहते हैं कृष्ण, वो आपको चौंका सकता है तो ध्यान से सुनिए। श्लोक क्रमांक छियालीस –

यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः।।

सब ओर धरती के जलमग्र होने पर जिस प्रकार कुएँ, पोखरे आदि छोटे-छोटे जलाशयों का मनुष्य के लिए कोई प्रयोजन नहीं रहता, उसी प्रकार आत्मज्ञ ब्रह्मण के लिए सारे वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। ~श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ४६)

'सब ओर धरती के जलमग्न होने पर जिस प्रकार कुऍं, पोखरें आदि छोटे-छोटे जलाशयों का मनुष्य के लिए कोई प्रयोजन नहीं रहता।' धरती में हर तरफ़ अगर पानी-पानी भर जाए तो कौन पानी से भरा गड्ढा तलाशेगा कि इसमें थोड़ा-सा पानी मिल जाए काश। कौन कुऑं तलाशेगा? काश इसमें थोड़ा पानी मिल जाए। कौन सरोवर या पोखर तलाशेगा? तलाशोगे क्या?

अगर चारों तरफ़ पानी-पानी हो जाए तो कोई कुऑं खोदेगा या तलाशेगा या तालाब तलाशेगा? कोई नहीं न। 'तो सब और धरती के जलमग्न हो जाने पर जिस प्रकार कुऍं, पोखरें और जलाशयों का कोई प्रयोजन नहीं बचता। उसी प्रकार आत्मज्ञ ब्रह्मण के लिए सारे वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है।' वहाँ तो बात किसकी हो रही है? प्रकृति की। और प्रकृति कहती है कि क्षुद्र के माध्यम से सन्तुष्टि दे देंगे। जैसे कुऑं कहता है कि इस क्षुद्र जगह पर जल की एक अल्प मात्रा मौजूद है, जो तुम्हें सन्तुष्टि दे देगी और कहीं नहीं है यहाँ मिलेगा, और कहीं नहीं है यहाँ मिलेगा।

प्रकृति के भीतर की सन्तुष्टि हमेशा ऐसी ही होती है। वो कहती है उधर नहीं इधर मिलेगा। और जो आत्मज्ञ हो गया, जो ब्रह्मण हो गया है। ब्रह्म को जानने वाले से आशय है यहाँ पर – ब्राह्मण वर्ण या जाति की बात नहीं हो रही है। ब्रह्मण कहा गया है। जो ब्राह्मण हो गया, जो ब्रह्मवेत्ता हो गया। उसके लिए सन्तुष्टि के किसी शुद्र स्रोत का कोई महत्व नहीं रह जाता। तो कुऍं का क्या करेगा? उसको तो सन्तुष्टि हर जगह है। जैसे कि पानी हर जगह है। अगर सम्पूर्ण धरती जलाप्लावित हो जाए। किसी एक तरफ़ को नहीं भागेगा कि मैं उस घर में जा रहा हूँ। उस घर में मुझे तृप्ति मिलती है। वो जहाॅं है, वही तृप्ति है। जैसे की अगर धरती पर हर तरफ़ पानी फैल जाए तो पानी कहाँ है? जहाँ तुम हो, वही पानी है। तुम जहाँ भी हो, वहीं पानी है।

हाँ, तो ब्रह्मवेता वही है, जो जहाँ भी है, वहीं सन्तुष्टि है, जो जहाँ भी है, वहीं सन्तुष्टि। क्यों? क्योंकि वो अपनी सन्तुष्टि अपने भीतर लेकर चल रहा है। उसे बाहर किसी पोखरे में जल नहीं तलाशना। वो अपनी सन्तुष्टि, अपने भीतर लेकर चल रहा है। उसका मन जानता है कि जो वो अधिकतम और उच्चतम कर सकता था, वही वो कर रहा है। अब असन्तुष्ट होने का कारण क्या? हम होते भी कौन हैं? अब असन्तुष्ट होने वाले। सब कुछ तो जो था अपने पास, सब लुटा दिया। अब असन्तुष्ट होने के लिए भी कौन बचा है, बाबा! कोई बचा?

असन्तुष्ट होने के लिए भी कुछ छोटा-मोटा बचना चाहिए न। जिसे और कोई काम नहीं तो क्या कर रहा है? असन्तुष्ट हो रहा है। जितनी ऊर्जा थी, जितनी शक्ति थी, जितनी बुद्धि थी, सब तो आहुति में डाल दी। सब लुट गये, पूरा लुटा दिया। सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, अब असन्तुष्ट हो जाए? माने कैसे होंगे? होंगे कैसे?

जैसे भीतर एक सेना हो, वो पूरी ही भिड़ जाए। सौ जने हैं मान लो उस सेना में भीतर की, अन्तकरण के सौ अवयव, या सौ शक्तियाॅं, या सौ खंड। वो भीतर सौ की सेना पूरी ही लड़ गयी है। अब बताओ रोने के लिए कौन बचा? सौ-के-सौ क्या कर रहे हैं? सौ-के-सौ क्या कर रहे हैं? वो युद्ध में जूझे हुए हैं, रोएगा कौन? रोने के लिए कोई है ही नहीं। अच्छा सौ-के-सौ मारे गये, अब इन सौ की मौत पर कौन रोएगा? कौन रोएगा?

अब असन्तुष्टि का क्या सवाल है? हम जहाँ हैं, वहीं सन्तुष्ट हैं। जहाँ हैं, वहीं सन्तुष्ट हैं। और हम ऐसा नहीं कि कहीं भी हैं। इस बात का विकृत अर्थ कर लेना भी बड़ा सरल है। कि कहीं भी रहो, वहीं सन्तुष्ट हो और इस तरह की बातें भी अध्यात्म के नाम पर आजकल खूब चलती हैं, 'जो कुछ भी कर रहे हो, बस उसी में सन्तुष्ट रहो।' न। अगर एक चीज़ है जिसकी गीता सख़्त मनाही करती है तो यही बात कि कुछ भी मत कर लेना। इस तरह की बातें आप आजकल के फूहड़ आध्यात्मिक साहित्य और चलते-फिरते गुरुओं से खूब सुनते होंगे। कि जो जहाँ है, वहीं सन्तुष्ट रहे, यही तो अध्यात्म है। तुम जहाँ हो वहीं आनन्दित रहो, यही तो समाधि है। बिलकुल नहीं, गीता इस बात को बिलकुल स्वीकार नहीं करती। अगर जो जहाँ है वहीं आनन्दित रहे। इसी में अध्यात्म है तो कृष्ण अर्जुन को कह देते न, कि हाँ तू भाग जा, जंगल चला जा, युद्ध क्यों करना? जंगल में आनन्दित रहना यही अध्यात्म है।

नहीं।

जो भी कर रहे हो, पूछो उसका उद्देश्य अहंकार है या कृष्ण। जो कर रहे हो अगर अपने लिए कर रहे हो तो मत करो। अपने करने की दिशा बदलो। और जो कुछ कर रहे हो, अगर कृष्ण हेतु कर रहे हो तो करते जाओ करते जाओ। फिर पूरी सन्तुष्टि रहेगी। सिर्फ़ उसी स्थिति के लिए कहा गया है कि जहाँ हो वहीं सन्तुष्ट रहो। यदि कृष्ण की तरफ़ बढ़ रहे हो तो फिर जैसी भी स्थिति है, उसमें सन्तुष्ट रहो। लेकिन तुम्हारा पूरा जीवन ही तुम्हारे व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बीत रहा है। और जब जीवन व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बीतेगा तो घोर असन्तुष्टि रहेगी भीतर। और तुम अपनेआप को समझाओ कि मुझे असन्तुष्ट नहीं होना चाहिए। मैं जहाँ हूँ, मैं वहीं सन्तुष्ट रहूँ। तो ये पागलपन की बात है।

शाश्वत सन्तुष्टि का अधिकार सबको नहीं है। तुम यूॅं ही कोई चलता फिरता काम करते हो, जिसमें कई तरह की प्रत्यक्ष, परोक्ष प्रकार की हिंसा सम्मिलित है, अज्ञानवश तुमने अपने काम का चुनाव करा है। और तुम कहो, 'मैं यही काम करते हुए सन्तुष्ट रहना चाहता हूँ।' तो तुम कृष्ण के विपरीत बात कर रहे हो। पहली चीज़ है, सही काम का चुनाव। यही गीता की आधारभूत सीख है — 'सही काम चुनो।'

घटिया और व्यर्थ का काम चुन करके उसमें सन्तुष्ट होने की आशा रखना बड़ी मूर्खता है। और अगर सही काम चुन लिया तो उसमें फिर कितनी भी विपदाऍं आऍं, कितने भी कष्ट झेलने पड़ें, जादू हो जाता है, मन तब भी सन्तुष्ट रहता है। ग़लत काम में तुम्हें सुख भी मिल गया, सफलता भी मिल गयी, तो भी सन्तुष्टि नहीं पाओगे। और सही काम में, कृष्ण कर्म में, निष्काम कर्म में सौ बार हारोगे तो भी पाओगे की भीतर से तृप्त हो आनन्दित हो।

दुनिया तुम्हारे लिए आनन्द से वैसी ही भरी हुई है जैसा इस श्लोक में वर्णित है कि जिधर देखो उधर पानी। दिन में पानी, रात में पानी, माने जीत में भी आनन्द और हार में भी आनन्द। स्थितियाॅं बदल रही हैं, भीतर जो आनन्द की बात है, वो नहीं बदल रही। क्यों नहीं बदल रही? क्योंकि वो किसी ऐसे के साथ जुड़ गयी है जो बदल नहीं सकता। उसी को तो सत्य, और ब्रह्म, और आत्मा, और कृष्ण कहते हैं। तुम किसी ऐसे के साथ जाकर जुड़ गये हो जो अपरिवर्तनीय है। इसीलिए तुम्हारा आनन्द भी अपरिवर्तनीय हो गया है, अक्षुण्ण हो गया है। बाहर की स्थितियाॅं अब तुम्हारे आनन्द पर प्रभाव नहीं डालती। आत्मस्थ हो गये।

बात आ रही है समझ में?

तदोपरान्त भगवद्गीता का कदाचित सबसे प्रसिद्ध श्लोक, सैंतालीसवाँ श्लोक —

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।२.४७।।

कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, कर्मफल में नहीं, क्योंकि वह तुम्हारे अधिकार से बाहर है; कर्मफल की आशा से कर्म मत करना पार्थ और कर्मत्याग में भी अपनी वृत्ति मत लगादेना।

~श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ४७)

'कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, कर्मफल में नहीं, क्योंकि वह तुम्हारे अधिकार से बाहर है; कर्मफल की आशा से कर्म मत करना पार्थ और कर्मत्याग में भी अपनी वृत्ति मत लगादेना।' न तुम्हें कर्म का फल भोगना है, न तुम्हें कर्म के फल का त्याग करना है। कर्म का फल आ गया तो आ गया, रास्ते में मिल गया। हवा चल रही थी। हमारे भी माथे का पसीना पोंछ गयी, ठीक। लेकिन हम व्याकुल नहीं हुए जा रहे थे कि कोई आये हमारे माथे को थोड़ा दुलरा जाए। हवा मिल गयी तो ठीक है।

न कर्म भोगना है, न कर्म का त्याग करना है — कर्म से आशय कर्म फल। न कर्म फल को भोगने की आकांक्षा है, न कर्म फल के त्याग का हठ है, हमें तो प्रेम भर है। किससे? सार्थक कर्म से। सार्थक कर्म कर रहे हैं, उसके फल के लिए कर ही नहीं रहे। उसके फल से हमें इतनी अनासक्ति है कि हम उसके फल को ग्रहण क्या करेंगे, हम तो उसके फल का त्याग तक नहीं कर रहे। हमें उससे इतनी अनासक्त है कि हम उसे ग्रहण क्या करेंगे, हम तो उसे अग्रहण तक नहीं कर रहे। सही काम करते चलो, कुछ नहीं मिला तो कुछ नहीं मिला, कुछ थोड़ा-बहुत मिल गया तो प्रसाद की तरह ले लो। और कुछ बहुत सारा मिल जाए तो वरदान की तरह ले लो। पर कुछ न मिले, चाहे बहुत कुछ मिल जाए उसका असर तुम्हारे लक्ष्य पर नहीं होना चाहिए।

मन्दिर गये थे क्योंकि कृष्ण से प्रेम था। बहुत बार होगा मन्दिर जाओगे घंटी बजाओगे, वापस आ जाओगे; बहुत अच्छी बात, कृष्ण से मुलाकात करने गये थे हो गयी। सन्तुष्टि सौ प्रतिशत। ठीक? एक दुसरे दिन मन्दिर गये, कृष्ण के लिए गये थे। उस दिन वहाँ पुजारी ने हाथ में तुम्हारे थोड़ा-सा प्रसाद रख दिया, ठीक है। सन्तुष्टि सौ प्रतिशत। एक तीसरे दिन गये, वहाँ किसी अमीर ने लंगर, भंडारा, दान लगवा रखा था। वहाँ तुमको रुपये भी दे दिये गए, कपड़े दे दिये गए, बहुत सारा खाना दे दिया गया। वो बँटवा रहा था, उससे होगी कोई खुशी। सन्तुष्टि, सौ प्रतिशत। जब कुछ नहीं मिला था तब भी सन्तुष्टि कितनी थी?

प्र: सौ प्रतिशत।

आचार्य: जब बहुत कुछ मिल गया तब भी कितनी है?

प्र: सौ प्रतिशत।

आचार्य: क्योंकि मन्दिर गये किसके लिए थे?

प्र: सौ प्रतिशत।

आचार्य: बाक़ी सबकुछ आकस्मिक है, सांयोगिक है। मिल गया तो मिल गया, नहीं मिला तो नहीं मिला। मिल भी गया तो हम कौन होते हैं, उसको स्वीकार करने वाले! हम कृष्ण के लिए गये हैं, साथ में लौटते हुए किसी ने कम्बल थमा दिया; दे दो भाई अच्छी बात है, मिल गया तो। हम कौनसा मन्दिर इसलिए आये थे कि कम्बल को अस्वीकार करेंगे! हम कम्बल को स्वीकार करने के लिए तो नहीं आये थे मन्दिर। बिलकुल सही बात है, पर क्या हम कम्बल को अस्वीकार करने के लिए गये थे? जब तुम घर से निकले थे तो क्या तुम्हारा लक्ष्य ये था कि जा रहे हैं और कम्बल को लात मारकर आएँगे? ये सोचकर गये थे? लक्ष्य क्या था? कृष्ण। लक्ष्य कृष्ण हैं, बाक़ी कुछ मिलता है तो मिलता है, नहीं मिलता है तो नहीं मिलता है। ये निष्काम कर्मयोगी का जीवन होता है।

अब समझ में आ रहा क्यों मीरा बाई गाती थी? क्या? “कोई दिन”, कोई दिन? “कोई दिन ख़ाजा कोई दिन लाडू और कोई दिन फाकमफाका रे।” सन्तुष्टि का स्तर, सौ प्रतिशत। खाजा मिल गया, सौ सन्तुष्ट। लड्डू भी मिल गया, सौ प्रतिशत। और फाके चल रहे हैं, कुछ भी नहीं मिला तो भी (सौ प्रतिशत) इस पर तो कुछ निर्भर ही नहीं करता भाई कि क्या मिला, कि क्या नहीं मिला, हम तो वहाँ किसी और उद्देश्य के लिए गये थे।

बात समझ में आ रही है? नहीं?

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ।।२.४८।।

अर्थ: हे धनंजय! दृढ़ रूप से योग में स्थित रह कर आसक्ति का त्याग करके तथा सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखते हुए तुम कर्म करो। इस प्रकार से समभाव युक्त बुद्धि को योग कहते हैं। ~ श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय २, श्लोक ४८)

अड़तालीसवाँ श्लोक है। 'हे धनंजय! दृढ़ रूप से योग में स्थित रहकर आसक्ति का त्याग करके तथा सिद्धि और असिद्धि में समान भाव रखते हुए तुम कर्म करो। इस प्रकार से समभाव युक्त बुद्धि को योग कहते हैं।' ये योग की वास्तविक परिभाषा है। योग वो सब नहीं है जो अब आजकल योग की दुकानों में होता देखते हैं। जीवन को उच्चतम आदर्श की सेवा में समर्पित कर देना ही योग है। मैं साधारण आदर्शों की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं काल्पनिक आदर्शों की बात नहीं कर रहा हूँ, जो उच्चतम आदर्श है उसकी बात कर रहे हैं। कम-से-कम जो ऊँचे-से-ऊँचा तुम्हारी शक्ति के भीतर तुम्हें प्रतीत होता हो, उसको ही जीवन समर्पित कर देने को योग कहते हैं, यही योग है।

आप आसन लगते हों, आप प्राणायाम करते हों, आप यम-नियम आदि का व्यवहार करते हों और आपका जीवन समर्पित किसको है? व्यक्तिगत स्वार्थ को। तो आप दूर-दूर तक कहीं से योगी नहीं हो। भगवत गीता बार-बार, बार-बार हमको बताएगी योग की वास्तविक परिभाषा।

बात समझ में आ रही है? प्रश्न बताइए?

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मैं ये पूछना चाहूँगा कि जैसे अभी प्रकृति की बात हो रही थी, 'प्रकृति में तीनों गुण हैं।' लेकिन उसमें ये नहीं बताया गया कि जो सतोगुण है वो रज से ऊपर है, या रज जो है वो तम से ऊपर है। अभी उन गुणों का जो अपेक्षाकृत वरीयता है वो नहीं बताया गया। सभी एक जैसा मानकर बोल दिया गया कि उसके पार चले जाओ। लेकिन जो तामसिक व्यक्ति है वो सीधा कैसे पार जाएगा?

आचार्य: देखो, बात के स्तर का अन्तर है। तुम जाते हो हवाई अड्डे पर वहाँ चेक-इन होता है, फिर सिक्योरिटी होती है। फिर तुम जाते हो हवाई जहाज़ के पास, जहाँ वो खड़ा होता है। यहाँ तुमको ऐसा लगेगा जैसे कि एक क्रमबद्धता है, एक प्रगतिशीलता है कि पहले दरवाज़ा था, जहाँ घुसे अपना आइडी वगैरह दिखाकर के। ठीक है? फिर तुमने अपना सामान वगैरह दिया, चेक-इन किया, फिर तुम्हारी सुरक्षा जाँच हुई, उसके बाद तुम बस में बैठकर के वहाँ पहुँचे, रनवे के पास। तो ये सब तुमको ऐसा लगेगा जैसे एक-एक, एक-एक करके तुम आगे बढ़ रहे हो, और बड़ी प्रगति की बात है। अब आसमान से अब नीचे देखोगे तो क्या दिखाई देगा?

प्र १: सब एक जैसा।

आचार्य: तो उस आसमान से ये तीनों गुण एक जैसे ही हैं। हाँ, जो नीचे बैठा है उसको ये अन्तर प्रतीत होते हैं और प्रतीत होने भी चाहिए। क्योंकि साहब आप हवाई जहाज में घुस ही नहीं पाएँगे, अगर आपने पहले बैग -वैग चेक-इन नहीं कराया है तो। तो वहाँ पर एक क्रमिकता है। कि पहले ये आता है, फिर ये आता है, फिर ये आता है। ठीक है? लेकिन जब गुणातीत होने की बात आती है तो उसमें सतोगुण का भी उल्लंघन करना पड़ता है; पूरी प्रकृति का ही उल्लंघन करना पड़ता है। तो फिर एक गुण को बाक़ी दोनों से उच्चतर क्यों बताया गया है? क्योंकि उल्लंघन करने में सतोगुण ज़्यादा प्रभावी, ज़्यादा सहायक होता है। बस ये बात है।

बाक़ी कोई फँसा हुआ है तमोगुण में, कोई फँसा हुआ है सतोगुण में, तात्विक दृष्टि से दोनों की स्थिति एक जैसी है। एक प्रमाद में उलझकर रह गया है और एक ज्ञान में उलझकर रह गया है। उलझे तो दोनों ही हुए हैं न। सतोगुण भला है अगर वो तुम्हें बाक़ी दोनों गुणों से तो मुक्ति दिला ही दे कि अब बाक़ी दोनों गुण पीछे छूट गये, अब हम सत्व में आ गये हैं, और फिर वो स्वयं से भी मुक्ति दिला दे। ठीक है?

तो किसी भी गुण को, या शक्ति को, या स्थिति को श्रेष्ठ तभी मानना जब वो दूसरों से तो मुक्त कराए ही स्वयं से भी मुक्त करा दे। ऐसा सतोगुण भी किसी काम का नहीं होगा, जिसने तुमको तामसिकता, राजसिकता से मुक्त कर दिया और ज्ञान से बाँध दिया। और ज्ञानी लोगों में ऐसा होने की सम्भावना काफ़ी ज़्यादा रहती है, तो सावधान रहना। किसी को देखो कि वो तमसा में बँधा हुआ है, तो स्वयं से भी पूछ लेना कि कहीं हम ज्ञान में तो नहीं बँध रहे हैं! बँधे तो बँधे हैं, भूलना नहीं कि तुम रनवे पर भी अगर खड़े हुए हो बिलकुल तो भी आकाश की दृष्टि से तुम बिलकुल उसी तल पर हो जिस तल पर एक साइकिल वाला है। तुम प्लेन के भीतर भी बैठ गये हो लेकिन उड़े नहीं, तो आकाश की दृष्टि से तुम अभी उसी ही तल पर हो, जिस तल पर एक पैदल इंसान है। तो ये ज़मीनी प्रगति मायने रखती भी है, और मायने नहीं भी रखती है। उड़ने में सहायक हो गयी तो मायने रखती है, उड़ने में सहायक नहीं हो पायी तो कोई अर्थ नहीं। ठीक है?

प्र १: ये आपने मेरी समस्या को पकड़ लिया वो ज्ञान वाला बात करके, पता नहीं कैसे लेकिन — धन्यवाद।

आचार्य: तो हमारा काम तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर देना थोड़े ही है। जहाँ समस्या है, वहाँ पकड़ना है न? चलो।

प्र १: धन्यवाद, आचार्य जी।

प्र २: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य, आपने श्रीमद्भगवत गीता किताब में पहले व्यक्तिगत अहंकार के बारे में बताया था – 'व्यक्तिगत अहंकार, अहम् वृत्ति और आत्मा।' तो मेरा प्रश्न व्यक्तिगत अहंकार से सम्बन्धित है। आपने बताया था कि व्यक्तिगत अहंकार जो होता है वो हमारे दुःख का कारण होता है। पर सन्तों ने, जिन्होंने भक्ति का मार्ग हमें बताया है, जैसे कि सन्त मीरा बाई श्री कृष्ण को अपना पति कहती है, सन्त कबीर जी अपनेआप को राम का कुत्ता बताते हैं। मेरा प्रश्न ग़लत अर्थों में नहीं था। सन्तों ने इन वाक्यों में जैसे अपने को बताया वो लग तो ऐसे रहा है कि वो व्यक्तिगत अहंकार के बारे में कह रहे हैं। लेकिन ये व्यक्तिगत अहंकार उन्हें आनन्द देता है।

आचार्य: तुम्हें कैसे पता कि ये व्यक्तिगत अहंकार की बात कर रहे हैं?

प्र २: क्योंकि वो जैसे आपने जब समझाया था ये व्यक्तिगत अहंकार के बारे में, तो आपने कहा था कि आप क्या हैं; अगर मैं पूछूँ, ‘आप क्या हैं?’ तो आप बोलते हैं कि मैं ये हूँ, मैं वो हूँ। तो विशिष्ट करके, इस तरह से।

आचार्य: हाँ, तो मीरा कौन हैं? मीरा आपके अनुसार कृष्ण की पत्नी हैं, ठीक? और इस चीज़ को आप ले रहे हैं, मीरा के व्यक्तिगत अहंकार के रूप में। कृष्ण कौन हैं?

प्र २: आत्मा।

आचार्य: हाँ तो आत्मा की पत्नी बन जाइए आप भी। इसमें व्यक्तिगत क्या है? आत्मा कोई व्यक्ति है क्या कि आत्मा की जो पत्नी होगी वो कोई व्यक्ति होगी? व्यक्ति की पत्नी दूसरा कोई दूसरी कोई व्यक्ति होती है, ठीक? आत्मा भी व्यक्ति है?

प्र २ : नहीं।

आचार्य: हाँ, तो आत्मा की कोई पत्नी अगर होगी भी तो वो कौन होगी?

प्र २ : आत्मा।

आचार्य: आत्मा होगी न तो व्यक्ति कहाँ है?

प्र २ : तो व्यक्ति मतलब अहंकार आत्मस्थ हो गया एक तरह से?

आचार्य: आपको जो बनाना है, सब बना लीजिए। आप अपनी पूरी सांसारिक भाषा का और शब्दकोष का प्रयोग कर सकते हैं। जोड़ लीजिए कृष्ण से अपनेआप को, दोस्त बना लीजिए कृष्ण को; पति बनाना हो, पति बना लीजिए, भाई बनाना है जो बनाना हो बना लीजिए। भई इनफिनिटी को, अनन्तता को लेकर आप कुछ भी प्लस-माइनस करिए, क्या आना है?

प्र २ : इनफिनिटी।

आचार्य: हाँ, तो उससे कोई भी रिश्ता बना लीजिए, इनफिनिटी प्लस फोर एक्स। अब आप कुछ बन गये है इनफिनिट , वो कृष्ण की पत्नी बन गयीं आप कुछ और बन जाइए। आपको क्या बनना है बताइए कृष्ण का, क्या? कुछ भी बन जाए उसके साथ आप कोई भी रिश्ता जोड़ सकते हैं। जवाब एक ही आएगा, 'इनफिनिटी'। तो जैसे ही आप वहाँ से एक रिश्ता रख लेंगे, आप भी अनन्त हो जाएँगे।

रिश्ता रखिए तो वहाँ से। रिश्ते तो सारे आप यहाँ से रखते हैं, वहाँ ऐसी कोई भी रिश्ता रखिए। यहाँ तक कि आप उनसे दुश्मनी का भी रिश्ता रख लीजिए तो भी आप अनन्त हो जाएँगे।

प्र २: इनफिनिटी वैसे वो कैसे?

आचार्य: बहुत रुचि जगी और तुरन्त एकदम, अचानक से। मैंने कहा, 'भाई बन जाओ, दोस्त बन जाओ, पति बन जाओ, पत्नी बन जाओ,' 'कौन बने।' मैंने कहा, 'दुश्मन बन जाओ,' 'वो कैसे? कैसे होता है?'

प्र २: दुश्मन तो हैं ही न हम, फिर कैसे होगा?

आचार्य: दुश्मन तो हैं नहीं, जो दुश्मन होता है उसमें इतनी भी ईमानदारी नहीं बचती कि वो साफ़-साफ़ बोले, 'दुश्मन हैं।' पूरी तरह हैं नहीं, आरोप हो जाने का बड़ा दिल कर रहा है।

प्र २: हम उनसे अलग हैं तो दुश्मन ही हैं न?

आचार्य: आप अगर इतने ज्ञानी हैं कि आपको पता है कि आप दुश्मन हैं तो फिर तो आप कृष्ण ही हो गये।

प्र २: ये भी नहीं पता।

आचार्य: कुछ भी नहीं है, आसक्ति है और उस आसक्ति को किसी-न-किसी तरीक़े से वैध ठहराने की कोशिश। आसक्ति भी रखनी है तो कृष्ण से रख लीजिए। हमारी आसक्ति भी सारी किससे है?

प्र २: संसार से है।

आचार्य: हाँ, प्रकृति के भीतर जो कुछ है उससे है। तो ये जो भक्ति का रास्ता है, वो रास्ता है स्वयं को वहाँ से जोड़ लेने का। बाक़ी जोड़ना आपको जैसे है, आप जोड़ते रहिए लेकिन जोड़ लीजिए। अनन्त से कोई भी सम्बन्ध होगा आपको, दोहरा रहा हूँ, आपको अनन्तता की ही तरफ़ ले जाएगा। ठीक है?

हाँ, यदि आप जो सबसे सरल और सम्यक सम्बन्ध बनाये तो उससे अच्छा कुछ नहीं है। सबसे जो सरल सम्बन्ध है वो है अनुगामी का। ‘तुम आगे, हम पीछे। हमें तुम्हारी ओर आना है, तुम जिधर को भी जाओ हमें पीछे-पीछे चलते जाना है।’ ये सबसे अच्छा सम्बन्ध होता है। पर ये आपसे नहीं बनाया जा रहा तो आप कोई भी सम्बन्ध बना लीजिए। कोई भी जो आप दूसरा सम्बन्ध बनाएँगे, वो भी अन्ततः अनुगमन का ही सम्बन्ध हो जाएगा। क्योंकि सत्य के साथ अहंकार का और कोई सम्बन्ध चलेगा ही नहीं दूर तक। शुरुआत उस रिश्ते की किसी भी तरीक़े से हो अन्त में तो उस रिश्ते को साध्य और साधक का ही सम्बन्ध हो जाना है।

आप लेकिन रिश्ता वहाँ बनाइए तो, वहाँ रिश्ता बनाने के लिए ये ज़मीनी रिश्तों से थोड़ा समय निकालना पड़ेगा। अब सारा समय यहीं पचा जा रहा है, इन्हीं सम्बन्धों में, तो वहाँ के लिए कैसे आपके पास कुछ ऊर्जा बचेगी। नहीं, आप दुश्मन भी नहीं हैं कृष्ण के। कृष्ण से शत्रुता करने के लिए भी कृष्ण को चेतना में रखना पड़ता है न। हम उनको चेतना में रखते ही नहीं हैं, शत्रु की तरह भी नहीं रखते। हमने उनको बहिष्कृत कर रखा है। चेतना में हमारी और बहुत कुछ है जो ठसाठस भरा हुआ है। लफड़े-पचड़े दुनियाभर के यही सब चलता रहता है मन में, कृष्ण कहाँ हैं। आगे बताइए?

प्र ३: प्रणाम आचार्य जी, मुंडक उपनिषद् में शान्ति पाठ की व्याख्या करते समय आपने कहा था, गॉड्स रिफर टू द फोर्सेज इनसाइड द माइंड इटसेल्फ दैट ऑफर इट असेशन एंड अपर्ट प्रपल्शन एंड कन्वर्सली दानवास ऑर डेमंस रिफर टू द फोर्स विदिन द माइंड।

आचार्य: ठीक-ठीक, ठीक।

प्र ३: तो आपने और अभी थोड़ी देर पहले बताया कि वेद भौतिकता और कामना की पूर्ति की बात करते हैं, और वेदान्त वेदों का शिखर है। तो क्या ये बात मुंडक उपनिषद् में बतायी गयी बात कि मन की ऊॅंची और निचली अवस्था से जुड़ी हुई है? कि ये कहना सही होगा कि वेद मन के निचले तल, भौतिकतावादी को सम्बोधित करते हैं और वेदान्त मन के ही ऊँचे तल को सम्बोधित करते हैं?

आचार्य: हाँ, जीवन दुख से शुरू होता है। आम व्यक्ति लगभग हर समय दुख के ही प्रकट या अप्रकट अनुभव में होता है। तो उस दुख से ऊपर उठाने के लिए जो वेदों का कर्मकांड का भाग है, वो सुख का न्यौता देता है और जो ज्ञानखंड है, वो दुख से आपको बचाने के लिए आनन्द की ओर ले जाता है। उद्देश्य दोनों का एक है, बस एक आपको दुख से पूरी तरह से मुक्त करा देता है और दूसरा आपको दुख से बस कुछ आंशिक, तात्कालिक सी राहत देता है। जो ये जो पूरी ज्ञान निधि है, वेदों के रूप में, वो है तो इसीलिए कि जो आम व्यक्ति है उसका जीवन बेहतर हो पाए। उसके जीवन में जो ग्रन्थियाॅं हैं, दुख हैं, वो हटें। दुख हटाने का जो निचला मार्ग होता है वो होता है कामनाओं की पूर्ति।

आपको दुख इसलिए है क्योंकि आपकी इच्छाऍं हैं जो अधूरी पड़ी हैं वो अधूरी इच्छाऍं अगर पूरी हो जाऍं तो दुख मिटता है या कम हो जाता है या कम-से-कम ऐसा प्रतीत होता है जैसे दुख चला गया हो। तो जो काम्य-कर्म भाग है वेदों का, वो ये मार्ग लेता है, कामना पूर्ति का। और फिर जो ज्ञानखंड है, वो मुक्ति का रास्ता लेता है। कहता है कि दुख से अगर पूर्ण निवृत्ति चाहिए तो तुम्हें दुख-सुख यानि अहंकार से ही पूर्ण मुक्ति चाहिए। वो रास्ता उपनिषदों का है, वेदान्त का।

प्र ३: एक और प्रश्न था, आचार्य जी। आपने थोड़ी देर पहले जब निष्काम कर्म की आप बात कर रहे थे तो आपने कहा था, 'निष्काम कर्म करके सन्तुष्टि होती है।' तो जैसे अभी संस्था के साथ जुड़कर जो मैं काम कर रहा हूँ, वो एक तरह से मैं उसको ऐसा सोचने की कोशिश करता हूँ कि ये निष्काम कर्म की दिशा में एक प्रयास है। पहले मैं अपने एक स्वार्थ के लिए जो एक नौकरी करता था, वो छोड़ कर, अब मैं संस्था से जुड़ा हूँ। तो क्या ये सोचना कि अब मैं।

(आचार्य प्रश्नकर्ता को टोकते हुए) आचार्य: सोचने की बात ही नहीं है। आप थोड़ा-सा भटकी हुई दिशा ले रहे हैं। सोचने की बात ही नहीं है, हमने निष्काम कर्म की क्या व्याख्या करी? निष्काम कर्म क्या? हमने कहा, 'जो उच्चतम आदर्श आपके लिए सम्भव हो, उसकी दिशा में काम करने को कहते हैं, निष्काम कर्म।' तो सोच की क्या बात है? आप तथ्यों का अन्वेषण करिए न थोड़ा।

आप जो काम कर रहे हैं, उससे कोई उच्चतम लक्ष्य हासिल हो रहा है क्या? करके देखिए, पता करिए। आप जो काम कर रहे हैं, उससे कौनसी ऊँचाई उपलब्ध हो पा रही है? लोगों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? देखिए। उच्चतम हम किसको कहते हैं? निम्नतम क्या है? आदमी का दुख आदमी का बन्धन निम्नतम है। ठीक? उच्चतम क्या है? उच्चतम क्या है? जीवन में उच्चतम क्या है? मुक्ति।

आप जो काम कर रहे हैं, जाकर ज़मीन पर तथ्यों को जाॅंचिए। क्या उससे लोगों को मुक्ति मिल रही है? लोग अपने भ्रमों से, भयों से, पूर्वाग्रहों से, कुंठाओं से आज़ाद हो रहे हैं? अगर हो रहे हैं तो आप जो कर रहे हैं वो निष्काम कर्म है। निष्काम कर्म आपकी सोच पर नहीं निर्भर करता। निष्काम कर्म एक तथ्यात्मक बात है। ऊँची-से-ऊँची दिशा में काम करने को कहते हैं, निष्काम कर्म। क्योंकि निचली दिशा व्यक्तिगत होती है। आप जो काम कर रहे होते हो, उससे आपको कोई व्यक्तिगत सुख मात्र मिल रहा होता तो निष्काम कर्म नहीं हो सकता था। आपको ये देखना है कि लोगों पर, पूरी पृथ्वी पर, समस्त प्रकृति पर आपके काम का क्या असर पड़ रहा है।

अगर सबको आपका काम मुक्ति की ओर ले जा रहा है तो वो आपका काम निष्काम कर्म है, अन्यथा नहीं। आप पाऍं अगर कि सैकड़ों हज़ारों लोगों को मुक्ति की ओर ले जाने में या कम-से-कम उनका दुख कम करने में, आपका काम सहायक हो रहा है तो सम्भावना है कि आपका काम निष्काम है अन्यथा नहीं।

प्र ३: जी। धन्यवाद, आचार्य जी।

आचार्य: आप जो करते हैं, उसका फल भी चखा करिए। पुरानी कहानियों में राजाओं का उल्लेख होता है न, जो दिनभर काम करते थे और रात में कपड़े बदल करके राज्य की गलियों में निकल पड़ते थे। साधारण आदमी बनकर प्रजा के बीच, पता करने कि जो हमने करा दिनभर, उसका लोगों पर असर क्या हुआ। तो शिविर में आते हैं, लोगों से बात किया करिए। मत बताया करिए कि मैंने ही तो ये ऐप बनाई है। ऐसे ही पूछा करिए ये ऐप आयी है आपकी ज़िन्दगी में तो क्या बदलाव आया? या इतने लोग रहते हैं जो बोलते है, कोई बोलता है मैं किताब पढ़कर आया, ज़्यादातर बोलते है मैं यूट्यूब देखकर आया। उनसे पूछा करिए कि क्या-क्या, जीवन पहले कैसा था? अब कैसा है? पहले बताओ।

और जब आपको ये ज़मीनी यथार्थ पता चले कि आपका काम अनेक जीवों की मुक्ति में सहायक हो रहा है, तब आप विश्वास के साथ कह पाऍंगे कि मैं निष्काम कर्म योगी हूँ। मेरा काम मात्र मेरे लिए नहीं है, बहुतों के लिए है और उच्चतम दिशा में उनको ले जाने के लिए है।

प्र ४: प्रणाम, आचार्य जी। आचार्य जी श्रीकृष्ण, अर्जुन जी को बोलते हैं कि आप धर्म का पालन कीजिए। तो धर्म का अर्थ आपने बताया कि जो मुक्ति की ओर ले जाए वो कर्म धर्म होता है। आचार्य जी मेरा प्रश्न ये है कि आमतौर पर सुनने को आता है कि चार पुरुषार्थ होते हैं। जैसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, महाभारत में भी आते हैं। तो आचार्य जी धर्म का अर्थ ये है कि जो कर्म मुक्ति की तरफ़ ले जाए वो अगर धर्म है, तो मोक्ष का क्या अर्थ हुआ?

आचार्य: बस वही है। ये सब बहुत ऐसे ही हैं, साधारण क़िस्म की बातें हैं कि चार पुरुषर्थ होते हैं इत्यादि-इत्यादि। आप एक हो, आपके चार पुरुषार्थ क्या होंगे? और उन चार में भी एक बीच में डाल दिया गया है काम, एक डाल दिया गया है अर्थ, कि पहले पैसे कमाओ खूब, कामवासना पूरी करो ये सब है और फिर अन्त में रख दिया गया है मोक्ष।

अब न तो कभी पैसे पूरे पड़ने वाले हैं, न कामवासना पूरी होने वाली है। तो मोक्ष का तो कभी नम्बर ही नहीं लगना। तो इन सब बातों में नहीं पड़ते हैं, ये बहुत अनुपयोगी बातें हैं। ये बातें उन्हीं के लिए अच्छी हैं, जिन्हें कभी मोक्ष का सोचना ही नहीं हैं। तो उनके लिए इसमें जो धर्म शब्द का भी अर्थ है, वो यही है रीति-रिवाज, कर्मकांड वगैरह, कि वो सबकुछ कर लो धूपबत्ती कर दिया करो, दिया-आरती कर दिया करो। उसके बाद खूब पैसे कमाने निकल जाओ, अर्थ।

सुबह-सुबह क्या करना है?

प्र ४: पूजा-पाठ।

आचार्य: पूजा-पाठ कर दिया। फिर नम्बर किसका लगा?

प्र ४: अर्थ का।

आचार्य: अर्थ का। तो दिनभर जा कर बाजार में अपना खप गये और खूब पैसे-वैसे कमाए। फिर रात में घर आये। अब किसका नम्बर लगा?

प्र ४: काम का।

आचार्य: हाॅं, तो धूम मचाई। उसके बाद सो गये। मोक्ष का तो कभी आना ही नहीं है। मोक्ष कब आएगा? बताओ। फिर सुबह हो जाएगी। फिर पूजा-पाठ का आ गया। तो ये जो है, ये षड्यंत्र है। ये षड्यंत्र है ताकि मोक्ष कभी आपकी चेतना में एक सिद्धान्त के रूप में भी न उभरे। पुरुष यदि चेतना को कहा गया है तो चेतना को न कर्मकांड चाहिए, न और कोई सुख। उसको तो देखो मोक्ष ही चाहिए।

प्र ४: जी, धन्यवाद।

प्र ५: प्रणाम, आचार्य जी। आपने अभी एक उदाहरण दिया था, एक व्यक्ति का कि सुरंगों की जब बात चल रही थी, तो सुरंगों पर पर्दा यदि डालते रहें। तो फिर वो सुरंग, सुरंग रह जाते हैं और वो कामना फिर भी रहती है। तो इसमें और दमन करने में क्या अन्तर है? दमन करने को भी एक अच्छी विधि बताया है। कई बार दमन भी करना पड़ता है।

आचार्य: दमन की विधि तब उपयुक्त होती है, जब जान भी लिया उसके बाद भी भीतर कोई बैठा है जो फुदक रहा है, तब दमन करना होता है। लेकिन जाने बिना दमन तो मूर्खता भी है और अनुपयोगी भी है। पहली चीज़ तो ये है कि जो चीज़ बहुत आकर्षित करती हो, उसकी और निर्भीक होकर जाओ। उसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए। जाँच-पड़ताल कर लो, स्पष्ट हो जाए बिलकुल कि वो सुरंग अन्धी सुरंग है, कहीं को लेकर नहीं जाती। उसके बाद भी भीतर से आग्रह उठता रहे कि चलो सुरंग की ओर चलो सुरंग की ओर, तब दमन करा जाता है।

स्थूल अनुशासन को कहते हैं दमन। सूक्ष्म अनुशासन को कहते हैं शमन। इन्द्रिया भाग रही हों किसी और को उनको रोक देना, ये कहलाता है दमन। मन भाग रहा हो किसी दिशा में उसको रोक देना, ये कहलाता है शमन। लेकिन दमन-शमन ज्ञान से पहले नहीं आते। पहली बात तो यही है कि कुछ भी ऐसा है जो छुप-छुपकर तुमको रिझाता है। तुम उससे छुपा रहने ही मत दो, तुम उसे अनावृत कर दो।

वास्तव में तुम्हें आकर्षित करने का एक बड़ा प्रमाणित तरीक़ा होता है, छुप-छुपकर रिझाने का। जो कुछ भी तुम्हें आकर्षित करता हो, तुम उसे पूरा उघाड़ दो। सम्भावना यही है कि आकर्षण बहुत कम हो जाएगा। जब तक आधा-अधूरा कुछ दिख रहा होता है, अनुभव में आ रहा होता है। सिर्फ़ तभी तक कल्पना को मौका मिल पाता है। उसकी एक बड़ी लुभावनी तस्वीर खींचने का और स्वयं ही उस तस्वीर के मोह में पड़ जाने का। तुम बात पूरी ही समझ लो। निर्भीकता के साथ। बताओ पूरी बात क्या है? पूरी बात समझ लो। आकर्षण कम हो जाता है।

और पूरी बात समझने के बाद भी भीतर एक बैठा होता है मूर्ख। जो सब कुछ समझ गया है लेकिन अभी भी खुदका जा रहा है कि मुझे सुरंग में घुसना है। चूहा है, वो कह रहा है, ‘जाना है सुरंग में।’ जान गया है कि सुरंग में मृत्यु है, फिर भी कह रहा है जाना है। तब दमन और शमन लाभकारी होते हैं। लेकिन दमन ज्ञान से पहले मत कर लेना। जानते कुछ नहीं, दमन में लगे हुए हो। तो बड़ी दयनीय हालत हो जाएगी तुम्हारी। क्योंकि तुम्हें पता नहीं होगा कि तुम दमन कर किसका रहे हो। दमन कर रहे हो किसका ये नहीं जानते।

प्र ५: तो पूरी बात समझ में आने के बाद भी दमन करने की आवश्यकता पड़ रही है। तो क्या पूरी बात समझ में आयी नहीं है या कोई इसका कारण है?

आचार्य: समझ में पूरी तरह आने में ये भी सम्मिलित होता है कि दमन भी कर दो। पूरी तरह बात समझ में आने में ये भी सम्मिलित होता है कि समझो, पूरी तरह समझो, जितना समझ सकते हो समझो और उसके बाद भीतर जो चूहा बैठा रह जाये, जो अभी भी समझने से इनकार कर रहा है, फिर उसका अनुशासन पूर्वक दमन कर दो। लेकिन पहले तो उसको क्या करना है? समझाना है। समझा दोगे, समझा दोगे तो उसका बल बहुत कम हो जाएगा। बल कम होने के बाद उसमें जो प्राण शेष रह जाऍं, उनका फिर दमन कर दिया जाता है; और तब दमन आसान भी हो जाता है। नहीं तो देखा है कि लोग दमन में कितनी मार खाते हैं, वो कहते है कि मैं सप्रेस कर रहा हूँ। और कर रहे हैं कर रहे हैं और उस चक्कर में एक दिन विस्फोट हो जाता है, वो दमन कर ही नहीं पाते। क्यों नहीं कर पाते? क्योंकि उस दमन में क्या सम्मिलित नहीं था? ज्ञान।

पता ही नहीं करा था। बस एक झूठा अपने ऊपर अनुशासन डाल लिया था। नैतिकता की रस्सियों से खुद को बाँध लिया था। बिना ये जाने कि तुम्हें चीज़ खींच क्या रही है? जो कुछ भी तुम्हें खींच रहा है। निडर रहो बिलकुल और आश्वस्त रहो बिलकुल। जो भी कुछ तुम्हें खींच रहा है सच्चाई से दूर, कृष्ण से दूर उसमें कोई दम नहीं हो सकता। वो कितनी भी मिठास दिखा रहा हो, वो बहुत कड़वा होगा। तो ये डरो ही मत कि उसकी ओर चले गये तो कहीं कृष्ण को खो न दें, नहीं खोओगे। उसकी ओर जाओगे तो कृष्ण के और पास आ जाओगे। और उससे दूर रहे आओगे, उसको ठोक-बजाकर आजमाओगे ही नहीं तो भीतर लगातार एक सन्देह कुलबुलाता रहेगा। क्या? ‘कहीं ऐसा तो नहीं कि वो चीज़ जो हमें बुला रही है, आकर्षित कर रही है, उस चीज़ में कोई ख़ास स्वाद हो, कोई विशेष रस हो, कोई बड़ा मूल्य हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि उधर कोई बड़ा भारी खजाना छुपा हो?’

अब उधर जो कुछ है, उसमें कोई दम नहीं है। लेकिन उसकी छान-बीन न करके तुमने उसको बड़ा मूल्यवान बना दिया है। जो चीज़ तुमको बुला रही थी, वो चीज़ थी दो कौड़ी की लेकिन तुमने कभी जाकर उसको जाॅंचा ही नहीं। तो दो कौड़ी की चीज़ तुम्हारे मन में तुम्हारी कल्पना में क्या बन जाएगी? वो कौड़ी से करोड़ की हो जाएगी। तो चले जाओ उधर और उसको आजमा ही लो। आजमाने के बाद पाओगे कि बड़े आत्मविश्वास से भर गये हो। बिलकुल दिखाई दे गया है कि डरने की कोई बात ही नहीं, ये जो कुछ भी मुझे विकल्प के तौर पर रिझाता है, इसमें कोई मूल्य नहीं है। अब मैं सन्तुष्ट होकर, आश्वस्त होकर अपने काम में पूरी तरह डूब सकता हूँ। निर्विकल्प होकर।

कहीं-न-कहीं हमें ये सन्देह है कि कृष्ण के विपरीत या कृष्ण से अलग भी जो है, उसमें बड़ा मूल्य है। तो हम डर जाते हैं। हमें लगता है कहीं वो हमें खींच न ले। अरे उसमें कोई दम होगा, वो तब न तुम्हें खींचेगा। कोई दम नहीं है उसमें। उसकी जाॅंच-पड़ताल न करके तुमने उसको दमदार बना दिया है, अन्यथा उसमें कोई दम नहीं है। तुमने आजमाया तो होता उसको। जाओ आजमा लो। कोई दम नहीं मिलेगा वहाँ। जाओ आजमाओ।

और जितनी बार आजमाओगे, उतनी बार आजमाने की खुजली भी कम पड़ती जाएगी। तुम कहोगे, ‘कितना तो आजमा लिया, इसमें कुछ दम नहीं है। हम ऊब गये’, अब ये विरक्ति है। हम इसको आजमाने से भी ऊब गये। ये तो छोड़ दो कि हमें इसकी लालसा है। ये तो छोड़ दो कि हम अपनी ओर से भाग रहे हैं कि क्या है, क्या है, लाओ। हममें इसको लेकर इतना आग्रह भी नहीं बचा है कि हम प्रयोग भी करें। हम प्रयोग भी करके ऊब चुके हैं। हमने दो बार, चार बार, छः बार प्रयोग करके देख लिया, जितनी बार प्रयोग किया उतनी बार अमृत की जगह घासलेट पाया। अब क्या बार-बार मुॅंह ख़राब करें! मिट्टी का तेल। वहाँ लिखा रहता है, अमृत कलश है। और दिल बड़ा खिंचता है उसकी तरफ़, अमृत कलश है। अमृत कलश है। और जाते हैं और अमृत कलश की दो-चार बूँदें हम भी चखते हैं कि हमें भी अमृत मिल जाए; घासलेट!

और वही घासलेट, जब तक तुमने जाॅंच-पड़ताल नहीं की, तुम्हारे लिए क्या बना रहता है? अमृत। अब तुम एकदम कहाॅं कृष्ण के मन्दिर में फँस गये, अमृत से चूके जा रहे हैं। अमृत तो उधर रखा है।

प्र ६: प्रणाम, आचार्य जी। आज आपने समझाया कि गीता में कितने स्पष्ट रूप में लिखा हुआ है कि कर्मकांड क्या है? और वेदान्त क्या है? तो पहले तो सुनते हुए मुझे ये बात का आभास हुआ कि भारत की दुर्गति में इन मतलब एक तरफ़ तो वेदान्त नहीं मिला। तो आन्तरिक रूप से दुर्बलता आयी और जो कर्मकांड मिला तो हमने भौतिक रूप से भी कोई तरक्क़ी नहीं की। तो ये दो चीज़ें इतनी मतलब स्पष्ट-सी लग रही थी।

दूसरा ये लगा कि मतलब भगवद्गीता और और वेद दोनों ही काफ़ी प्रचलित हैं, ख़ासकर भारत में। और इतने साफ़ और स्पष्ट शब्दों में भगवद्गीता बोल रही है कर्मकांड के बारे में। तो फिर इतने सालों से कैसे भगवद्गीता प्रचलित भी है? दोनों को ही एक जैसा ही समान सम्मान मिलना चाहिए।

आचार्य: नहीं, वेद लोगों ने पढ़े नहीं हैं न। भगवद्गीता के तो फिर भी दो-चार श्लोक सुन लेते हैं, वेद पढ़े नहीं हैं। और भगवद्गीता को भी सुन लिया है, गुना नहीं है। देखो सबकुछ स्पष्ट लिखा रहता है लेकिन स्वयं ही कृष्ण क्या बोल रहे हैं? कि जिसके मन में कामनाओं का डेरा है, वहाँ ज्ञान अगर पहुँचा भी दो, तो वहाँ टिकटता नहीं है।

अभी भी सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं, हमारे साथ ठीक इस समय लाइव, वो सब सुन रहे हैं। लेकिन जितनी बातें उनसे कही गयी हैं, उनमें से आधी भी उनमें टिकेंगी थोड़े ही। क्योंकि वहाँ पहले ही कामनाऍं टिकी हुई हैं न। जहाँ कामनाऍं गहराई से टिकी हों, जहाँ लालस ही यही हो किसी तरीक़े से सुख मिल जाए, वहाँ मुक्तिदायक ज्ञान का क्या काम।

प्र ६: और अभी आचार्य जी, आपने एक उत्तर में बताया था उत्तर देते हुए कि जो कर्मकांड है वो निचली कामनाओं को पूरी करने के लिए है। पर क्या जिस तरह से वो कर रहे हैं कि वो कह रहे हैं कि अगर आपको मकान बनाना है तो आप ये करिए। उससे अच्छा ज़्यादा अच्छा ये नहीं है कि हम जैसे जो बाक़ी पश्चिम में हुआ कि उन्होंने वास्तव में...।

आचार्य: बिलकुल बेहतर है, बिलकुल बेहतर है। भारत की दुर्गति के बड़े-से-बड़े कारणों में ये कर्मकांड है। अभी भी आज भी था, किसी ने हमें सन्देश लिखकर भेजा है, कि आप यज्ञ आदि का समर्थन क्यों नहीं करते? क्योंकि जब उसमें घी डाला जाता है तो उससे ऑक्सीजन निकालता है। और जब भोपाल गैसकांड हुआ था तो दो परिवार बच गये थे क्योंकि वो दोनों रात में हवन कर रहे थे। तो उस कारण उनकी हवा शुद्ध थी। तो ज़हरीली गैस उन पर असर नहीं डाल पायी। अब इस तरह के लोगों का क्या करोगे?

इन्हें ये समझ में नहीं आ रहा है कि कुछ भी जब जलता है तो वो ऑक्सिजन से जलता है, वो ऑक्सीजन पैदा कैसे कर देगा? जलने को ऑक्सिडेशन बोलते हैं। कुछ भी जलाने के लिए ऑक्सीजन चाहिए। उससे ऑक्सीजन पैदा नहीं होता, उससे ऑक्सीजन खर्च होता है।

आप ये गिलास ले लो (एक गिलास उठाते हुए), इसमें आप एक मोमबत्ती रख दीजिए, इसके अन्दर एक मोमबत्ती रख दीजिए। पानी नहीं है इसमें, सिर्फ़ एक मोमबत्ती रख दीजिए और ऐसे कर दीजिए (गिलास को ढक्कन से ढँकते हुए)। क्या होगा थोड़ी देर में?

प्र ६: बुझ जाएगी।

आचार्य: क्यों बुझ जाएगी? ऑक्सीजन ख़त्म हो गया। कुछ भी जब जलता है तो वो ऑक्सीजन को सोखता है, वो ऑक्सीजन पैदा नहीं करता। लेकिन हमारे लोग, और ये सब वो लोग हैं जो बार-बार वेदों की बात करते कहते हैं। कहते हैं, 'वेदों में वर्णित हैं न, यज्ञ हवन ये वो।' कहते हैं, 'ऑक्सीजन पैदा होता है।' तो जितना ये प्रदूषण है आजकल, इसका उपचार क्या है? लकड़ी जलाओ, लकड़ी चलाओ, हवन करो, इससे प्रदूषण कम हो जाएगा। वो ऑर्गेनिक मटीरियल है वो कार्बन है, उसको जलाओगे तो क्या बनेगा? ऑक्सीजन बनेगा या कार्बन डायऑक्साइड बनेगी? और कार्बन डायऑक्साइड से क्या होगा? समझ में नहीं आती बात। ये होता है कर्मकांड से।

हिन्दू धर्म तो ख़ासकर पूरी तरह से कर्मकांड का धर्म बन गया है। ‘इस दिन दाढ़ी नहीं बनानी है, बच्चा इतने साल का हो जाए तो उसके बाल घुटा देने हैं।’ और ग़लत से ग़लत काम ये हो रहा है कि इन कर्मकांडों को वैज्ञानिक बताने की आजकल चेष्टा की जा रही है। कि आप जो कुछ भी करते हो उल्टा-पुल्टा, संस्कृति के नाम पर, दिखाओ कि किस तरह से उस चीज़ का एक वैज्ञानिक आधार है। हर चीज़ का वैज्ञानिक आधार स्थापित करो, जहाँ कोई आधार है ही नहीं।

गोबर पोत लो उससे न्यूक्लियर रेडिएशन घर में नहीं आएगा। और ये सब बातें आज ही नहीं हो रही होंगी। वो कृष्ण के समय में भी हो रही थीं। इसलिए कृष्ण को इतना साफ़-साफ़ अर्जुन को बताना पड़ा, कि तुम मोह और आसक्ति में फँसे हुए हो। और मोह और आसक्ति से सम्बन्धित जो वेदों का भी हिस्सा है, तुम्हें उसका भी अतिक्रमण कर देना हैं। तुम्हें उससे भी आगे निकल जाना हैं। वो अर्जुन से इतना ही नहीं बोल रहे है कि तुम अपनी व्यक्तिगत कामनाऍं छोड़ दो। वो अर्जुन से कह रहे हैं, ‘वेदों में भी जो भाग कामना की पूर्ति के लिए हैं, तुम वेदों के भी उन भागों को छोड़ दो। व्यक्तिगत कामना तो छोड़ो ही, वेदोक्त कामना भी छोड़ दो।’

बिलकुल ठीक पकड़ा तुमने कि भारत की दुर्दशा के एक तरीक़े से यही दो कारण बताए जा सकते हैं। पहला तो ये कि वेदान्त से वंचित रह गया क्योंकि वेदों का अर्थ समझ लिया कर्मकांड। अब वेदों में उपनिषद् भी हैं, पर उपनिषदों पर ध्यान ही नहीं गया किसी का। कुछ ज्ञानी लोग थे, जिन्होंने उपनिषदों को सम्मान दिया। आम जनता का उपनिषदों पर कोई ध्यान ही नहीं है। आम जनता के लिए वेदों का मतलब भी वही रह गया। इस देवता की ऐसे करनी है, वैसे करनी है। पूजा ऐसे करो। ऐसे सन्तुष्ट करो। ऐसा करने से ये देवी प्रसन्न हो जाती हैं, ये सब ये।

एक तो वेदान्त की ओर ध्यान नहीं गया और दूसरी ओर भौतिक तल पर भी मारे गये। क्योंकि भौतिक तल पर सफलता मिलनी थी विज्ञान से, कर्मकांड से थोड़े ही। अध्यात्म से भी वंचित रह गये क्योंकि वेदान्त की ओर ध्यान नहीं गया। और विज्ञान से भी वंचित रह गये क्योंकि सोच लिया कि भौतिक समृद्धि आ जाएगी कर्मकांड से। भौतिक समृद्धि कर्मकांड से नहीं विज्ञान से आती है। विज्ञान से भी वंचित रह गये, अध्यात्म से ही वंचित रह गये। नतीजा कुल वो है जो आज भारत की स्थिति है। दयनीय।

ये बात बिलकुल साफ़-साफ़ समझ लीजिए। सनातन धर्म का अर्थ वेदान्त के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। बाक़ी जितनी भी बातें हों इधर-उधर की, उनको बिलकुल त्याग दीजिए पूरे तरीक़े से।

और कुछ? चलिए।

YouTube Link: https://www.youtube.com/watch?v=Nkp4lqe6E1E

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