क्या सही, क्या गलत? (जो शेर की ज़िंदगी वो हिरण की मौत) || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी. रुड़की में (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य, हमारी लाइफ़ (जीवन) में काफ़ी ऐसी सिचुएशन (परिस्थिति) आती है जब हमें फल को या कारणों को देखकर कर्म का चयन करना होता है। लेकिन गीता में लिखा हुआ है कि हमें उन कर्मों को करना चाहिए जिनको करते हुए हमें फल की चिन्ता ही न हो। लेकिन सर यह तो दोनों चीज़ें तो आपस में अपोज़ (विरोध) कर रही हैं। ऐसे में हम कर्मों का चयन किस प्रकार करें?
आचार्य प्रशांत: देखो, गीता ने तो साफ़ बता दिया, काम इतना सही चुनो, इतना चुनौतीपूर्ण, इतना आवश्यक कि उसको करते समय तुम्हारे लिए सम्भव ही न रहे फल की परवाह करना। और सही काम की पहचान यही होती है। वो तुम्हें इतना अपनेआप में सोख लेता है कि तुम चाहो भी अगर कि परिणाम की चिन्ता करो, तुम कर नहीं पाओगे। तुम नहीं कर पाओगे। हो नहीं पाएगा। परिणाम की चिन्ता करने के लिए भी थोड़ा दिमाग खाली होना चाहिए न? परिणाम की चिन्ता करने में भी थोड़ा समय लगता है न?
सही काम की पहचान ये है कि वो पूरी ज़िन्दगी निगल लेता है। वो तुम्हारी पूरी आहुति माँग लेता है। इसीलिए निष्काम कर्म के लिए जो शब्द है गीता में वह है, यज्ञ। तुम्हें अपनेआप को होम करना पड़ेगा। जीवन में ऊँचा उद्देश्य बनाओ और उसको कहो, "आ, मुझे समूचा निगल जा। मैं अपनेआप की पूरी आहुति दे रहा हूँ तुझे।" अब बताओ कैसे याद रहेगा कि अन्जाम क्या होने वाला है।
जिसको अभी याद है कि अन्जाम क्या होने वाला है, वो काम ठीक कर नहीं रहा है।
पर तुम्हारे प्रश्न में पहले ही ये धारणा थी कि जीवन में कुछ काम ऐसे होते हैं, जिसमें फल की चिन्ता करके कुछ करना पड़ता है। अगर फल की चिन्ता कर ही रहे हो, तो फिर यही देख लो भाई कि इसके फल में मुझे शांति, मुक्ति, बोध कुछ मिल रहा है या नहीं मिल रहा है। लेकिन तुम फल की चिन्ता करो, इससे पहले कृष्ण तुमसे कह गए हैं, ‘फल की चिन्ता यदि करनी पड़ रही है, तो ग़लती पहले ही क़दम पर हो गई।’



