चाहते ही गए हमेशा, और चाहतों से बर्बाद हुए || आचार्य प्रशांत, दुर्गासप्तशती द्वितीय चरित्र (2023)

आचार्य प्रशांत: दुर्गा सप्तशती ले रहे हैं। उसका जो मध्यम चरित्र, दूसरा चरित्र है, तीन चरित्र हैं उसमें। तो जो दूसरा उसका चरित्र है, वो अध्याय दो-तीन-चार से आता है। इसमें प्रकृति माने देवी अपने रजोगुणी रूप में प्रकट होती हैं। ठीक है? यहाँ जो उनका नाम है, वो है महालक्ष्मी। और यहाँ जिस असुर का संहार है, उसका नाम है महिषासुर। महिषासुर प्रमुख असुर है। उसके अलावा कम-से-कम एक दर्जन नाम और आते हैं, वो सब जो छोटे-मोटे थे जिनका वध हुआ।
तो जो दूसरा चरित्र है, आज हम उसको, उसके सार को समझेंगे और चर्चा करेंगे। तो पहला चरित्र समाप्त हुआ था कि जो तमोगुणी महाकाली हैं, उन्हीं के प्रभाव से पहले तो मधु-कैटभ की उत्पत्ति होती है शरीर के मैल से। और फिर वही जब दोनों असुरों की मति फेर देती हैं तो उससे दोनों असुरों का संहार हो जाता है। ये पहले पाठ की कथा थी, पहले चरित्र की। पहले चरित्र में बस पहला ही अध्याय आता है। तो वहाँ पर जो हमारा पहला चरित्र समाप्त हुआ था कि तमोगुणी महाकाली द्वारा मधु-कैटभ का संहार श्री विष्णु के हाथों होता है। तो वहाँ समाप्त होता है। और फिर दूसरा अध्याय है वो आरंभ होता है, और दूसरा अध्याय ही दूसरे चरित्र का आरंभ है। और इसमें आरंभ में ही बड़ी भारी लड़ाई चल रही है। और वहाँ दिखाया था पहले चरित्र में कि जो लड़ाई थी विष्णु और मधु-कैटभ की, वो पाँच हज़ार साल चली थी।
तो ये एक शैली है। कथा में ये एक शैली होती है, अतिश्योक्ति। तो पाँच हज़ार वर्ष लड़ाई चली, यहाँ पर भी यही है कि एक-सौ साल लड़ाई चली। तो चाहे पाँच हज़ार वर्ष कहा जाए चाहे एक-सौ साल कहा जाए, इशारा ये है कि ये एक बहुत लंबी और बहुत प्राचीन लड़ाई है, बस इतना समझना है। सौ का अर्थ ये नहीं होता कि निन्यानवे नहीं या एक-सौ-एक नहीं। सौ से आशय है पुरानी और बहुत लंबी।
तो लंबी एक लड़ाई है देवताओं और दानवों के बीच में जो सौ साल से चल रही है। और देवताओं का नेतृत्व कर रहे हैं इंद्र और असुरों का नेतृत्व कर रहा है महिषासुर। तो वो इस दूसरे चरित्र में एक प्रमुख पात्र है महिषासुर, और सौ साल में ही देवताओं की हो जाती है पिटाई। वो झेल नहीं पाते, पाँव उखड़ जाते हैं। जब पाँव उखड़ जाते हैं तो हमें बताया जाता है कि जितने अधिकार थे देवताओं के, वो सब महिषासुर ने अपने हस्तगत कर लिए। हस्तगत माने? ले लिए, अपने हाथ के नीचे ले लिए। तो सूर्य का प्रकाश और सूर्य की यात्रा जो प्रकृति द्वारा निर्धारित होती थी, वो किसके द्वारा निर्धारित होने लगी? महिषासुर के द्वारा, क्योंकि सूर्यदेव का तो काम अब ले लिया महिषासुर ने अपने हाथ में। वरुण जिस तरीके से जल का और बादलों का संचालन करते थे, वो सब किसने ले लिया?






