
जनमानस में तो शिव और शंकर एक ही हैं, जिनके सहस्रों नाम हैं। सब नाम सुंदर हैं। पर अध्यात्म की सूक्ष्मताओं में जाकर अगर हम इन नामों का अभिप्राय समझें तो उनका सौंदर्य और बढ़ जाएगा। ‘शिव’ अर्थात आत्मा, सत्य मात्र। आप कहते हैं ‘शिवोहम्’, ठीक जैसे उपनिषद कहते हैं,…






आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।


















पानी को आप खौलाते हो, देखा है जब वो 100 डिग्री के आसपास पहुँचने लगता है, तो आवाज़ करने लगता है। वैसे ही आकर आपको कोई खौला देता है, तो आप भी आवाज़ करने लगते हो, “भाग यहाँ से, मार दूँगा, ऐसे कर दूँगा, भाग यहाँ से।” पानी में कोई जान होती है? पर आवाज़ करने लग गया न, क्योंकि किसी ने बाहर से उसमें आग लगा दी। आपके भी कोई आग लगा देता है, तो आप आवाज़ करने लग जाते हो कि नहीं? करने लग जाते हो। तो आवाज़ करने के लिए, बेटा, बोलने के लिए, *कॉन्शियस* होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है।





दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।





आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है।

आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।


जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।

हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ।










*भूले मन…भूखा हो तो भोजन पा ले..आगे हात न बनिया…!*
*भूले मन….प्यासा हो तो पानी पि ले..आगे घात न पनियां…*
*भूले मन….कहे कबीर सुनो भाई साधो..काल के हाथ कमनियां…*…
शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा।।
प्रश्न: सर, क्या यह पंक्तियाँ सही कह रही हैं?
उत्तर: विवेक,
छल रहित होना कभी कमज़ोरी नहीं होती।
निश्छलता आती है इस गहरी आश्वस्ति के साथ कि मुझे छल, धोखा, चालाकी की ज़रुरत…
प्रश्न: मनुष्य ‘स्वार्थी’ है या ‘मतलबी’?
उत्तर: तुमने ‘स्वार्थ, मतलब’ के बारे में जानना चाहा है।
अर्थ माने कुछ ऐसा जो तुम्हें लुभावना, प्रिय लगता हो।
(यहां पर) ‘स्व’ माने अहंकार।
स्वार्थ माने वो जो अहंकार को प्यारा लगे।और मतलब माने भी अर्थ।
सत्य मात्र ‘होता है’, और उसका ‘मतलब’…
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय।।
धागा क्या है? जिसके दो छोर हैं, दो सिरे हैं। दो दूरियों के मध्य जो है, सो धागा।
एक ही दूरी है जीवन में, बाकी सारी दूरियां इस एक दूरी से निकलती हैं। स्वयं…
भारत में जाति केवल सामाजिक या कानूनी समस्या नहीं, बल्कि धर्म से जुड़ चुकी मानसिक संरचना बन गई है। इसलिए संविधान, कानून और समाज-सुधार के प्रयास इसे समाप्त नहीं कर पाए। जन्म-आधारित जाति का आधार वैदिक दर्शन नहीं, बल्कि बाद की विकृत धार्मिक व्याख्याएँ हैं। जाति तभी समाप्त होगी जब धर्म अपने मूल वेदान्त और अद्वैत स्वरूप की ओर लौटे, जहाँ मनुष्य की पहचान जन्म से नहीं, सत्य से होती है।
मन पर बाहरी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन का संचालन उन प्रभावों से नहीं, अपने विवेक से होना चाहिए। जानकारी बाहर से आती है, पर उसे समझना, परखना और सही निर्णय लेना हमारी आंतरिक क्षमता है। जो व्यक्ति अपने विवेक को जागृत रखता है, वही विचारों का स्वामी बनता है; अन्यथा वह केवल परिस्थितियों और दूसरों की धारणाओं का अनुयायी बनकर रह जाता है।
अध्यात्म यह नहीं सिखाता कि बाहरी प्रभावों से बचो, बल्कि यह सिखाता है कि उनके दास मत बनो। जानकारी, विचार और अनुभव बाहर से ही आते हैं, लेकिन उन्हें समझने और उनके आधार पर निर्णय लेने का अधिकार आपके विवेक का है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है जब जीवन बाहरी प्रभावों से नहीं, बल्कि अपने विवेक से संचालित हो। मन बाहरी प्रभावों पर आश्रित हो सकता है, लेकिन आप केवल मन नहीं हैं ।
सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।
समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।
तकनीक अपने-आप में समस्या नहीं है। असली प्रश्न यह है कि उसका उपयोग कौन और किस मानसिक अवस्था से कर रहा है। यदि भीतर भय, असुरक्षा और निर्भरता है, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय बैसाखी बन जाती है। तब संवाद कृत्रिम हो जाता है, ज्ञान सतही रह जाता है और शक्ति विनाश का साधन बनती है। बाहरी प्रगति तभी सार्थक है जब उसके साथ भीतर की परिपक्वता और विवेक भी विकसित हों; अन्यथा हर नई तकनीक हमारी कमज़ोरियों को ही और बढ़ा देती है।
आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
आध्यात्मिकता अहंकार को सांत्वना देने या स्वयं को विद्रोही घोषित करने का माध्यम नहीं, बल्कि अपने भीतर बैठी गहरी गुलामी को पहचानने का साहस है। हमारी अधिकांश इच्छाएँ, मान्यताएँ और पसंद वास्तव में सामाजिक संस्कारों से बनी होती हैं, इसलिए केवल बाहरी विद्रोह स्वतंत्रता नहीं देता। सच्चा धर्म भीतर के अहंकार से संघर्ष कर जीवन में सत्य के पक्ष में खड़े होने का आह्वान करता है, चाहे उसकी कीमत संघर्ष और घाव ही क्यों न हों।
पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।
जीवन की बाहरी समस्याओं का समाधान केवल तकनीक, नीतियों या आर्थिक प्रगति से नहीं हो सकता, क्योंकि उनके पीछे मनुष्य की आंतरिक अवस्था काम करती है। विज्ञान और तकनीक उपयोगी हैं, लेकिन यदि मनुष्य स्वयं को नहीं समझता, तो वही उपलब्धियाँ विनाश का कारण भी बन सकती हैं। जलवायु संकट, अत्यधिक उपभोग और सामाजिक चुनौतियों की जड़ मानव की अतृप्त इच्छाओं और अचेतन जीवन में है। स्थायी परिवर्तन तभी संभव है जब बाहरी प्रगति के साथ आत्मज्ञान, ईमानदारी और आत्मबोध भी विकसित हो।
व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।
अध्यात्म कोई अलग विषय या पुरानी परंपरा नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की सतत जागरूकता है। विज्ञान, चिकित्सा या एआई जैसे सभी क्षेत्र बाहरी ज्ञान से जुड़े हैं, जबकि अध्यात्म उस व्यक्ति को समझने की प्रक्रिया है जो इनका उपयोग करता है। यदि इंसान स्वयं को नहीं समझता, तो उसका ज्ञान दिशाहीन हो सकता है। सही समझ ही तकनीक और शक्ति को मानव कल्याण की दिशा देती है।
लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।
आप ‘अद्वैत’ को कोई सिद्धांत समझते हैं? जब तक ‘मैं’ है, तब तक दुनिया और दूसरा भी है, यही द्वैत है। अद्वैत तब होता है जब ‘मैं’ ही अपने मिथ्यात्व को देख ले। तब न कहने वाला बचता है, न कहने को कुछ। अद्वैत कोई विचार नहीं, अस्तित्व का अनुभव है। यह अहंकार के समाप्त होने का नाम है, जहाँ सिर्फ़ बोध शेष रह जाता है।
अंधविश्वास जीवन का ज़हर है। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया हो, नहीं हो सकता कि वो हिंसक न हो जाए। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उसके जीवन में प्रेम नहीं रह सकता। जिसके जीवन में अंधविश्वास आ गया, उम्मीद भी मत करना कि उसके पास साहस या ताक़त बचेगी। हाँ, क्रोध और प्रतिक्रिया दिखाई दे सकते हैं। अंधी प्रतिक्रिया वो कर सकता है। पर एक शांत, अदम्य साहस, अब उसमें नहीं दिखेगा।
ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।
जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।
प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…
हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।
तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।
ऑब्ज़रवेशन का हमेशा एक ऑब्जेक्ट होता है। अटेंशन थोड़ी-सी अलग चीज़ है, क्योंकि उसका कोई ऑब्जेक्ट नहीं होता। इट्स जस्ट अ स्टेट ऑफ माइंड, इन विच द माइंड नोज़, इन विच द माइंड इज़ फ़्री ऑफ डिस्टरबेंस इन व्हाटएवर इट डज़। इट डज़ नॉट हैव एन ऑब्जेक्ट ऑर अ सेंटर।
भारत में यह मान्यता रही है कि अध्यात्म बुढ़ापे का काम है। लेकिन जहाँ भी स्वामी विवेकानंद की मूर्ति खड़ी होगी, उस जवान आदमी का तेज गवाही देता होगा कि अध्यात्म बुढ़ापे का नहीं, जवानी का काम है। जवानी अगर, जो सबसे ऊँचा काम हो सकता है, उसको नहीं दी, तो और क्या काम आएगी? उन्होंने युवाओं से कहा, ज़रा चुनौती स्वीकार करना सीखो, प्रतिस्पर्धा करना सीखो। बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु है। उचित ही है कि युवा दिवस मनाया जाता है उन्हीं के नाम पर।
दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है।
आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।
आत्म-अवलोकन बस ये नहीं है कि बैठे-बैठे कह रहे हैं, 'मैं आत्म-अवलोकन कर रहा हूँ।' सक्रिय रूप से जाकर के पूछो। जैसे, आपने एक फ़िल्म देखी किसी के साथ। तो देखने के बाद आधे घंटे कहीं बैठ जाओ, और कहो, 'अच्छा, मैंने क्या देखा?' 'अच्छा, तुमने क्या देखा?' इससे पता चलता है कि कितने हम पक्षपाती हैं। फ़िल्म हो, समाज हो, घटना हो, जीवन हो, कुछ भी। जिन्हें स्वयं को बढ़ाना है, उनके लिए बहुत-बहुत ज़रूरी है कि वो दूसरों से बात ज़रूर करें। अपने पास सिर्फ़ अपना ही पक्ष नहीं, तीन-चार और पक्ष आने दें।
जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा, जन्म लिया तो मरेगा तू, जन्म लिया तो मरेगा। ये मृत्यु का नहीं, अमरता का गीत है। इसका मतलब है: अजन्मे रहो, अमर रहो। देह का ही तो कहते हो कि जन्म हुआ। तो अजन्मे रहने का अर्थ है: देह मत बनना, चेतना बनना, जानना। जानना, नहीं तो एक्शन-रिएक्शन के ही खेल में फँस जाओगे और फिर उसमें दुख आ जाता है ज़िंदगी में। तो दुख से बचने का गीत है ये। ये आशीर्वाद है; अजन्मे रहो, अमर रहो।
काम करना माने ये नहीं होता कि कोई महल बनाना है, कोई साम्राज्य खड़ा करना है, ये करना है, वो करना है। वास्तविक काम हमेशा नकारात्मक होगा। तो इसलिए उसको ढूँढना बहुत आसान है। आसपास अपने देखो, कहाँ कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए। सूँघो, कहाँ-कहाँ गंदगी फैली हुई है। हाथ में झाड़ू उठाओ, साफ़ कर दो; यही है काम। काम करके कुछ हासिल नहीं करना है। काम करके जो हासिल कर लिया है, उसको हटाना है।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी हमारी जो टीम है, वो ओलंपिक से वापस आई है, जो खिलाड़ी हैं। और उनको लेकर कुछ नेशनल न्यूज़, मीडिया में और सोशल मीडिया में कुछ बातें चल रही हैं। उनके कुछ हेडलाइंस (शीर्षक) मैं आपको पढ़कर के सुनाना चाहता हूँ — ‘मनु के…
उल्टी-पुल्टी मान्यताएँ पकड़े बैठे हो, अपने आप को कुछ मान रहे हो, ‘मैं लंकेश हूँ।’ ज्ञान होता तो अपने आप को कोई लंकेश थोड़ी बोलेगा, स्त्री का अपहरण थोड़ी करेगा। ज्ञान होता रावण को, तो वह अपने आप को और कुछ क्यों मान रहा होता? रावण ने तो ज्ञान को सिर्फ़ सूचना की तरह रखा है। अगर ज्ञानी होता, तो फिर श्रीराम के ख़िलाफ़ युद्ध में थोड़ी खड़ा हो जाता वो।
अगर जीवन में अनुशासन नहीं है, तो मतलब साफ़ है कि तुम जिस विषय के पास हो, उसमें इतनी जान ही नहीं है कि वह तुम्हें अनुशासित कर पाए। अधिकांशतः हमारे जीवन में एकाग्रचित्तता नहीं रहती, उसका कारण यह है कि हमने अपने लिए लक्ष्य ही मूल्यहीन चुन लिए होते हैं। स्वयं को अनुशासित करने की चेष्टा मत करो, उपयुक्त विषय ढूँढो। जब तुम सच के पास होते हो, तो अनुशासन अपने आप हो जाता है। तुम उसके निकट रहो, वो तुम में अनुशासन ला देगा।
बहुत-बहुत पुरानी गंदगी है, समय लगेगा। बहुत पुरानी गंदगी है, सोचो कितना पुराना हमारा देश है। कम से कम पिछले हज़ार सालों में तो बहुत गड़बड़ करी गई है। वो सब साफ़ करने में समय लगेगा, ये जो गाली गलौज कर रहे हैं, ये बेचारे तो शिकार हैं गंदगी के। इन्हें पता भी नहीं है कि इनके मुँह से कौन बोल रहा है, इनके मुँह से अतीत की सड़न बोल रही है। अभी इनमें इतनी आत्म-जागरूकता नहीं है कि ये जान पाएँ कि ये तो अभी हैं ही नहीं।
होश में आओ और फिर होश को जाने मत दो, पानी जैसे हो जाओ। किसी पथरीले पहाड़ पर पानी की एक धार छोड़ो, देखो, वो कैसे अपना रास्ता तय करती है। पहाड़ है पथरीला, ऊबड़-खाबड़ चट्टानों से भरा हुआ, कहीं गड्ढा, कहीं कुछ और तुमने धार छोड़ी है। धार कहीं रुककर के विचार नहीं करती कि कौन सा मार्ग मेरे लिए ठीक है, कौन सा नहीं। उसे पता है किधर को जाना है। वो समर्पित है उस जगह पहुँच जाने को, जिसके बाद गति की कोई आवश्यकता नहीं रहेगी। नीचे कोई तालाब होगा, एक बार धार वहाँ तक पहुँच गयी, क्या उसके बाद भी बहती है?
मैं होऊँगा वैसा, बात बताओ सही है या नहीं है? बोलो, बात सही है कि नहीं है? अगर सही है, तो बात ले लो। मैं तुमसे थोड़ी कह रहा हूँ, मुझे उठा के अपने घर बैठा लो। मुझे आना भी नहीं है तुम्हारे घर, बुलाओगे तो भी नहीं आऊँगा। मैंने एक बात कही है, बस उस बात का ही रिश्ता है हमारा और तुम्हारा। वो बात अगर तुम्हें ठीक लगती है, तो समझ लो। और इधर-उधर की फालतू तो मत बताओ, ये बाबा ऐसा है, कि बाबा वैसा है।
जो रोना-चिल्लाना हो रहा है, देख लो कि सब देह के कारण हैं। शरीर के हॉरमोन करवा रहे हैं। जान लो कि तुम उनके कर्ता नहीं हो — यह कर्मसंन्यास हो गया। दूसरा तरीका यह है कि यह सब किसी ऊँचे उद्देश्य को समर्पित कर दो; हँसेंगे तो उस ध्येय के लिए, रोएँगे तो उस ध्येय के लिए — यह कर्मयोग है। श्रीकृष्ण कहते हैं — इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। तुम्हारी चित्त की तमाम वृत्तियों के साथ रिश्ता बड़ा गहरा है। तुम्हारे लिए उनसे संबंध तोड़ना मुश्किल हो जाएगा, इसीलिए कर्मयोग ज़्यादा आसान तरीका है।
तुम्हें लग रहा है बहुत क़ाबिल नौजवान घूम रहे हैं हिंदुस्तान में और इनको ब्रेन वॉश कर- कर के आचार्य जी बुला रहे हैं और फिर इनसे अपने लिए काम कराएँगे। अरे, ये निहायती घटिया नस्ल है। नस्ल भी घटिया, फ़सल भी घटिया। इनको यहाँ बुलाता हूँ तो इन पर बड़ी मेहनत करनी पड़ती है किसी लायक बने, और आधे तो उतनी मेहनत झेल भी नहीं पाते। वे बाहर निकल जाते हैं और फिर बाहर जाकर वीडियो बनाते हैं, “हमसे काम कराया, हम मर गए हैं। अरे, हमसे हुआ नहीं।”