
प्रश्नकर्ता: बहुत से लोग हैं जो फाउंटेनहेड पढ़कर जीवन में कोई बदलाव नहीं ला पाते हैं। और दूसरी तरफ़ बहुत ऐसे भी लोग हैं जो इस पुस्तक को पढ़ने के बाद विद्युतीकृत हो जाते हैं। आचार्य जी मैं दूसरे लोगों की श्रेणी में आने के लिए क्या कर सकता हूँ?…





आचार्य प्रशांत बताते हैं कि क्यों हम सही खान-पान, स्वास्थ्य और अपने ऊपर ज़रूरी खर्च से बचते हैं, लेकिन दिखावे और फ़ालतू सामाजिक परंपराओं पर पैसा बहा देते हैं। अधिकांश लोगों के लिए समस्या सिर्फ़ पैसों की कमी नहीं, बल्कि विवेक और सही प्राथमिकताओं की कमी भी है।






अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि ज्ञान से आनंद और मस्ती जन्म लेते हैं। सच्ची मित्रता, प्रेम और शांति किसी को पकड़ने से नहीं, बल्कि स्वतंत्रता देने से मिलते हैं। मन स्वयं चंचल नहीं होता; उसमें क्या भरा जाए, यह हमारी सजगता तय करती है। जीवन का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि ज्ञान से प्रेम करना, प्रश्न करना, आत्मावलोकन करना और अपने भ्रमों को पहचानकर भीतर की स्वतंत्रता की ओर बढ़ना है।




प्रश्नकर्ता: न आलस है, न उठा हुआ है, न सोया हुआ, कुछ ऐसा मतलब एक कंफ्यूजन (संशय) है कि क्या ये, ये क्या है? नींद भी है उसमें हल्की सी, जागृति भी है, अब जागृति का तो पता नहीं लेकिन कुछ है, विचार भी नहीं है लेकिन कुछ है। लेकिन…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा पहला प्रश्न ये है, हमनें चोट के बारे में बात कही, तो मैं अपने अनुभव में जो देखती हूँ मुझे ऐसा लगता है कि जब भी मुझे चोट लगती है उसके साथ एक और भाव जो साथ में ही उठता है वो होता है कि…
Man’s basic vice, the source of all his evils, is the act of unfocusing his mind, the suspension of his consciousness, which is not blindness, but the refusal to see, not ignorance, but the refusal to know. Irrationality is the rejection of man’s means of survival and, therefore, a commitment…
प्रेम की गहराई हमेशा प्रेमी की अपनी चेतना जितनी होती है — जो जैसा है, उसका प्रेम भी वैसा ही होगा, चाहे उसे कितना भी पावन या अनोखा क्यों न मान लिया जाए। जिस चेतना ने खुद को कभी गहराई से नहीं जाना, वह प्रेम में भी सतह से आगे नहीं जा सकती। जो कोई अपने प्रेम को गहराई से परखने से बचता है, वह असल में खुद को परखने से बच रहा होता है — और यही बचाव, प्रेम के नाम पर पाला गया एक और भ्रम है।
प्रेम का मार्ग सुरक्षा नहीं, बल्कि घायल होने का साहस माँगता है। जो चोट, हार, पीड़ा और ठगे जाने से डरता है, वह सत्य और प्रेम तक नहीं पहुँच सकता। अहंकार हर कीमत पर जीत चाहता है, जबकि प्रेम हारना, झुकना और दर्द को स्वीकारना सिखाता है। जो छोटी-छोटी हारों का अभ्यास करता है, वही अंततः अहंकार हारकर हरि को पा सकता है। सच्ची शक्ति दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि प्रेम के लिए स्वयं घायल होने में है।
सत्य के मार्ग पर चलने के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बाहरी समर्थन नहीं, बल्कि भीतर की निष्ठा और साहस की होती है। जब व्यक्ति स्वार्थ, भय और सामाजिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय का साथ देता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता जन्म लेती है। जीत या हार से अधिक महत्वपूर्ण है सत्य के प्रति अडिग रहना। इतिहास उन्हीं को याद रखता है जो अन्याय के सामने झुकने के बजाय अकेले खड़े होने का साहस रखते हैं।
समझ केवल जानकारी इकट्ठा करने या बातों को याद रखने से नहीं आती, बल्कि पूरी सजगता से वर्तमान में जीने और हर अनुभव को स्वयं देखने से आती है। जीवन हर दिन नए प्रश्न पूछता है, इसलिए रटी हुई बातें पर्याप्त नहीं होतीं। वास्तविक सीख तब होती है जब जिज्ञासा, प्रश्न और प्रत्यक्ष समझ विकसित होती है। स्मृति नहीं, बल्कि जागरूकता और समझ ही सही निर्णय, सीखने और जीवन को सार्थक दिशा देने का आधार बनती है।
आध्यात्मिक प्रगति अधिक गुरु, ग्रंथ या संस्थाएँ बदलने से नहीं, बल्कि एक सत्य को गहराई से जीने से होती है। सतही अध्ययन अहंकार को बढ़ाता है, जबकि वास्तविक अध्ययन स्वयं को बदल देता है। जो वास्तव में समझता है, उसे निरंतर नए उपाय नहीं चाहिए। विनम्रता से अपनी अधूरी समझ स्वीकार कर, एक प्रामाणिक स्रोत के साथ गहराई से जुड़े रहना ही आत्मज्ञान और आंतरिक परिवर्तन का मार्ग है।
डर और जड़ता से बाहर निकलने का रास्ता किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि एक छोटे-से सही कदम से शुरू होता है। अपनी समस्याओं का बार-बार विश्लेषण और वर्णन करने के बजाय उनसे दूर जाने का निर्णय आवश्यक है। सत्य के प्रति प्रेम जागने पर भय अपने-आप पीछे छूट जाता है और साहस जुटाना नहीं पड़ता। सही संगति, अनुकूल वातावरण और आत्मिक विकास के अवसरों को अपनाने से परिवर्तन सहज होने लगता है। अपनी कमजोरियों से मोह रखने के बजाय उनके प्रति वैराग्य विकसित करना ज़रूरी है। शिकायत, बहाने और आत्म-दया में उलझे रहने से कुछ नहीं बदलता; निर्णायक कर्म, सत्य के प्रति प्रेम और वर्तमान स्थिति के विरुद्ध विद्रोह ही ऊँचे जीवन की वास्तविक शुरुआत हैं.
ज्ञान ही डर को मस्ती में बदलता है। अज्ञान भय पैदा करता है, जबकि सही समझ भय दूर करता है। सच्चे मित्र बनाने की कोशिश करने के बजाय आत्म-अवलोकन अधिक आवश्यक है। कबीर साहब का संदेश है कि केवल किताबें पढ़ने से नहीं, बल्कि ज्ञान के प्रति प्रेम से जीवन बदलता है। मन स्वयं चंचल नहीं होता; हमारी इच्छाएँ और अस्थिरता उसे भटकाती हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी जुटाना नहीं, बल्कि अपनी मान्यताओं पर प्रश्न करना और सत्य की खोज करना है।
प्रेम कोई सामाजिक स्वीकृति, विवाह या रोमांटिक आकर्षण नहीं, बल्कि अहंकार के मिटने की प्रक्रिया है। सच्चा प्रेम अनुमति नहीं मांगता और न ही हार्मोन या परंपरा से पैदा होता है; वह सत्य और मुक्ति की ओर भीतर की यात्रा है। इसी तरह अहंकार सफलता पाने के लिए खुद को नहीं मिटा सकता — क्योंकि जब तक "मैं" बना हुआ है, तब तक हर त्याग, चाहे परिवार का हो, मित्रों का हो या स्वास्थ्य का, अहंकार का ही एक रूप रहता है। सही कर्म योजना बनाकर नहीं, बल्कि झूठे प्रभावों और बंधनों से मुक्त होकर स्वतः प्रकट होता है।
पढ़ना केवल पन्ने पूरे करना नहीं, बल्कि समझ विकसित करना है। जब किसी विषय को सचमुच समझा जाता है, तो जिज्ञासा स्वयं आगे पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। अधूरी किताबें अक्सर रुचि की कमी नहीं, बल्कि बिना समझे आगे बढ़ने का परिणाम होती हैं। इसलिए गति से अधिक महत्त्वपूर्ण है हर विचार को समझना, क्योंकि वास्तविक सीख वहीं से शुरू होती है।
डेटिंग ऐप, कुंडली मिलान और “मेरी पसंद” जैसी धारणाएँ अक्सर प्रेम नहीं, बल्कि डर, सामाजिक कंडीशनिंग और अहंकार से संचालित होती हैं। परंपरा के दबाव में किया गया चुनाव और केवल व्यक्तिगत पसंद पर आधारित चुनाव, दोनों ही भ्रमित हो सकते हैं। सच्चा प्रेम तब संभव होता है जब व्यक्ति स्वयं को जाने और ऐसा संबंध चुने जो उसके बंधनों, भय और अहंकार को चुनौती देकर उसे भीतर से मुक्त करे।

व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।

रिश्तों में प्रेम को अक्सर जन्म, परिवार या सामाजिक भूमिकाओं से जोड़ दिया जाता है, जबकि अधिकांश संबंध अपेक्षाओं, स्वामित्व और तयशुदा व्यवहारों पर टिके होते हैं। केवल माता-पिता या संतान का रिश्ता होने से प्रेम नहीं जन्मता। प्रेम कोई जैविक घटना नहीं, बल्कि सीखने और समझने की प्रक्रिया है। जहाँ “मेरा” और “मेरे लिए” का आग्रह घटता है, वहीं प्रेम सीमाओं को लाँघकर स्वतंत्रता, करुणा और वास्तविक संबंध का रूप लेता है।

रिश्तों में प्रेम अक्सर मान लिया जाता है, पर अधिकांश संबंध तय भूमिकाओं, अपेक्षाओं और सामाजिक ढाँचों पर चलते हैं। माता-पिता, पति-पत्नी या परिवार के रिश्ते भी कई बार समझ, स्वतंत्रता और संवेदनशीलता से नहीं, बल्कि आदत, अधिकार और “मेरापन” से संचालित होते हैं। सच्चा प्रेम सीमित नहीं होता; वह स्वामित्व नहीं, बल्कि समझ, स्वतंत्रता और विस्तार देता है। प्रेम जन्म से नहीं, जागरूकता से सीखा जाता है।

लोग ऋषिकेश शांति या आत्मबोध के लिए नहीं, बल्कि अपनी वही तनावपूर्ण और भ्रमित जीवनशैली को बनाए रखने के लिए आते हैं। महादेव का अर्थ अंत और अहंकार की समाप्ति है, पर तीर्थ भी मनोरंजन और पलायन का साधन बन गया है। दुख से मुक्त होने के बजाय लोग उसी दुख को बचाए रखने के उपाय खोजते रहते हैं।

क्या आपके विचार भी आपको सच जैसे लगते हैं? यही भ्रम है। विचार कभी सत्य नहीं होते, वे सिर्फ़ मन की गतिविधि हैं। जब तक “मैं हूँ” का भाव है, तब तक वस्तु, व्यक्ति और विचार रहेंगे ही। उनसे भागना नहीं, उन पर विवेक लगाना है। जो अहंकार को पोषित करे उसे छोड़ो, जो उससे टकराए वही सही दिशा है। यही चुनाव जीवन को बंधन या मुक्ति की ओर ले जाता है।

युद्ध, मुनाफाखोरी और हिंसा का मूल कारण अहंकार है, जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों ही नहीं, स्वयं को भी नष्ट कर सकता है। समाज अपनी बुराई को स्वीकार नहीं करता और खुद को अच्छा मानकर धोखे में जीता है। इसी अज्ञान से शोषण, युद्ध और अन्याय चलते रहते हैं। समाधान केवल आत्म-अवलोकन और भीतर की सच्चाई को ईमानदारी से देखने में है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले ओशो जी और जिद्दू कृष्णमूर्ति जी के रंग में रंगा हुआ था और अब आपके रंग में रंगा हुआ हूँ। मुझे ये समझ नहीं आता कि यह मेरी जिज्ञासा मात्र है, प्रेम है या पागलपन?
आचार्य प्रशांत: जैसे आपने कहा था कि मन में…

थोड़ी जीवन में ठसक होनी चाहिए, एक्सक्लूसिविटी। एक शान, ऐरी-गहरी चीज़ों को भाव नहीं देना, ऐरे-गैरों को मुँह नहीं लगाना। “तू क्यों है ऐरा-गैरा?” मैं तेरा अपमान नहीं कर रहा हूँ। मैं तुझे प्रेरणा दे रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है तू भी वही संभावना रखता है, जो किसी ऊँचे-से-ऊँचे व्यक्ति में है। तू अपनी संभावना क्यों नहीं साकार कर रहा? और जिस दिन तक तू अपनी संभावना साकार नहीं करता, उस दिन तक मैं तुझे स्वीकार नहीं करता।

जिसको तुम कहते हो रोमांटिक लव, इसका बाज़ारवाद से बहुत सीधा ताल्लुक है। अच्छे कपड़े पहन लिए, तोहफ़े दे लिए और मज़े कर लिए, लेकिन कुछ पूरा नहीं पड़ रहा; एक अधूरापन, एक कसक रह जाती है। आपकी बेचैनी वैसी की वैसी है। प्रेम का मतलब है कि जिसके साथ हो, उसकी आँखें खोल दो; वो ख़ुद को जानने लगे, मन को समझने लगे, यही प्रेम है। लेकिन ये करना आसान नहीं होता। ये करने की क़ीमत चुकानी पड़ती है। ये करने के लिए तुम्हें अपना सर्वस्व भी निछावर करना पड़े, तो कर दो। यही है वैलेंटाइन डे।

शुरुआत होगी प्रेम से; प्रेम माने, संवेदनशीलता; संवेदनशीलता माने, दुख। दुख का उदय नहीं, दुख का अनुभव। दुख तो है ही, पर असंवेदन बनकर हम उस दुख से किसी तरह बच लेते हैं। किसी चीज़ का होना और उसका अनुभव होना, दो अलग-अलग बातें हैं। दुख है, पर हम उसके अनुभव से बच जाते हैं। कैसे? सुन्न पड़कर। असंवेदनशील होकर हम दुख के अनुभव से कन्नी काट लेते हैं।

मुझे बड़ा ताज्जुब होता है। एक से एक नमूने, ज़िंदगी में जिनको कुछ नहीं समझ में आता, कुछ नहीं जानते। 14 साल के होंगे, 16 साल के होंगे, तभी से एक लफ्ज़ वो जान जाते हैं, क्या? प्यार। और ऐसे कभी सामने पड़ें, मैं कहूँ कि तुझे गणित नहीं आती, तुझे भूगोल नहीं आता, तुझे यहाँ से लेकर वहाँ तक सीधे चलना नहीं आता, तुझे किसी आदमी से दो बात करना नहीं आता, तुझे अपना गुस्सा संभालना नहीं आता, तुझे कहीं पर समय से पहुँचना नहीं आता, तुझे इंसान बनना नहीं आता, तुझे प्रेम करना कहाँ से आ गया?

ये ऐसी सी बात है, कि “मैं क्या करूँ? मैं दस कदम आगे चलता हूँ। पीछे से वो कॉल करके पकड़ लेती है।” वो तुम्हें कॉल करके पकड़ रही है या पहले तुमने मोबाइल फोन पकड़ रखा है? वो तुम्हें पकड़ ले, इसका इंतजाम पहले से करके कौन बैठा है? तुम अगर चाहते ही होते कि वो तुम्हें न पकड़े, तो फोन पीछे नहीं छोड़ के आए होते।

जो जितना ज़्यादा दूसरों की नज़रों में अपनी झूठी छवि बनाकर रखना चाहता है, उस पर तानों का उतना ज़्यादा असर होता है। अगर तानों से बचना है, तो दूसरों की नज़रों में अपनी छवि की परवाह करना छोड़ो। आपको इसलिए बुरा नहीं लगता कि किसी ने आपको कुछ ग़लत बोल दिया, आपको इसलिए बुरा लगता है कि जो सच आपने छुपा रखा था, उसने वह खोल दिया। इतने बेहतर हो जाओ कि छुपाने के लिए कम-से-कम रहे। और बेहतर होने के बाद भी जो कमज़ोरियाँ बची रहें, उनको उद्घाटित रखो, प्रकट रखो।

जब ये सब उठे, तो कहो, “तू उठ, तेरा काम है उठना पर तू मैं नहीं है।” और प्रमाण इसका ये है कि मैं तुझे देख सकता हूँ, मैं तेरी हर गतिविधि पर नज़र रख सकता हूँ। यही प्रमाणित करता है कि तुझमें और मुझमें भेद है। तू दृश्य है, मैं दृष्टा हूँ। हम दोनों एक नहीं हैं। मैं साक्षी हूँ तेरा, तू अपना काम कर, मैं बैठा-बैठा देखूँगा। मैं बैठा-बैठा देखूँगा तो मेरे पाँव मेरे पाँव हैं, और मेरा हाथ मेरा हाथ है, और मेरी ऊर्जा मेरी ऊर्जा है; वो तुझे नहीं मिलेगी। मैं तुझसे कोई रिश्ता बनाऊँगा ही नहीं।

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रहकर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है; ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता, लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम…

हम आमतौर पर बस ऐसे ही छवि बना लेते हैं कि संघर्ष या दबाव सिर्फ़ व्यवसाय में या सांसारिक मसलों में ही है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। दबाव और संघर्ष अध्यात्म में भी उतने ही करने पड़ते हैं, जितने कि संसार में, बस उसकी श्रेणी, उसकी गुणवत्ता अलग है। बाहर तुम दबाव झेलते हो कुछ और अतिरिक्त हासिल कर लेने के लिए, और अध्यात्म में, जिसको तुमने नाहक पा लिया है, वह दबाव बनाता है कि मुझे मत छोड़ो। भीतर वाली लड़ाई जीत लो, बाहर की सब लड़ाइयाँ तुम पाओगे कि तुम्हारे लिए बहुत आसान हो गई हैं।

कभी स्कूल गए हो वहाँ कभी किसी तीसरी क्लास के लड़के को पहली क्लास के लड़के को धुनते देखा है? देखा है? तो वही है ये। तीसरी क्लास वाले ने पहली क्लास वाले को पकड़ के पटापट- पटापट- धुन दिया, और यही है। इसका कुछ नहीं है।

तुम कहीं गए, तुमने किसी की चरण स्पर्श कर लिए। यह कोई सम्मान है? यह आदर है। सम्मान दूसरी बात है। सम्मान का अर्थ होता है, ध्यान से समझना। जो अपने मन की समझ नहीं रख सकता, वह किसी और को कैसे समझ जाएगा? पर दावा हमारा यह है कि हम दूसरे का सम्मान करते हैं। दूसरे का सम्मान तो तब हो जब आत्म-सम्मान हो। आत्म-सम्मान मतलब खुद को समझना। पहले अपना सम्मान कर लो। अपना सम्मान मतलब, आत्म-ज्ञान! आत्म-ज्ञान ही आत्म-सम्मान है।

दार्शनिक बना नहीं जाता। ये कोई कैरियर थोड़ी होता है। ये तो ज़िंदगी बना देती है। पहले ज़िंदगी ऐसे जियो कि उसकी परतें उघड़ें कुछ, उसका नंगापन सामने आए। और उसके लिए ज़िंदगी के बहुत क़रीब आना पड़ता है। ज़िंदगी के क़रीब जाना माने झूठ अब टूटेगा। और झूठ साँस है, झूठ रीढ़ है, झूठ प्राण बन गया है हमारा। सब टूटेगा। ज़िंदगी को देखो। ज़िंदगी से लात खाओ फिर तुमसे जो कुछ भी अभिव्यक्त होगा, वह दर्शन होगा।

दो तरह का शोषण चलता आया है धर्म के नाम पर, एक, महिलाओं का; और एक, तथाकथित निचली जातियों और वर्णों का। और लोकधर्म की लगभग बुनियाद है ये शोषण। अब लोकधर्म अगर जात-पात, छुआ-छूत और स्त्री-शोषण, इनके बिना चल ही नहीं सकता; तो जहाँ कहीं भी स्त्रियों को उठाने की बात आएगी और जाति को हटाने की बात आएगी, लोकधर्म उससे बहुत ख़ौफ़ खाएगा। ख़ौफ़ खाएगा और उस बात को कह देगा? ये लेफ्टिस्ट बात है।

आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

आप कोई नहीं हैं, हर इंसान अपनी ही सहमति से सुधरेगा या गिरेगा। अब मेरा भी बीस वर्षों का अनुभव हुआ जा रहा है लोगों को समझाने का। बहुत-बहुत जान लगाई है लोगों पर, और धीरे-धीरे करके ये समझ में आया है कि एक अपराध होता है किसी ऐसे को समझाना, जो समझने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। भूल नहीं होती, अपराध होता है। और उनसे ये फिर सुनने को मिलता है, 'हमें हमारे हिसाब से जीने क्यों नहीं दे रहे हो?' एक सीमा के बाद, वो गलती मत करिए जो मैंने करी है बहुत; एक सीमा के बाद प्रयास मत करिए।

यह जो ‘मैं’ है, जिसे सेल्फ कहते हैं, यह अपने आप में बहुत तपती हुई और अशांत चीज़ है। यह निरुद्देश्य हो कैसे सकती है? जैसे किसी आदमी को एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो और वो कहे कि मैं डिज़ीज़लेस हूँ। एक-सौ-चार डिग्री बुखार हो तो आपके पास एक धधकता हुआ उद्देश्य होना चाहिए। क्या? बुखार उतारना है भाई! इसी तरह से जब तक ‘मैं’ है, उद्देश्य होना चाहिए। और वो उद्देश्य होगा उस ‘मैं’ की शांति।

धर्म होता है ख़ुद को समझने के लिए, ताकि आपकी चेतना उड़ान ले सके। समझ में आ रही है बात? और यही दो कोटियों के लोग होते हैं दुनिया में; एक, वो जो अपने पुराने ढर्रों पर चल रहे हैं इन्हें आप बोल सकते हैं अधार्मिक लोग। वह पुराने ढर्रे दो तरीक़ों के हो सकते हैं — ये बात बहुत रोचक लगेगी बहुत लोगों को। जो पुराने शारीरिक ढर्रे पर चल रहा है, वो तो अधार्मिक है ही। लेकिन जो पुराने सामाजिक ढर्रे पर भी चल रहा है, वो भी अधार्मिक है। धर्म किसी ढर्रे का नाम नहीं होता, धर्म जानने का नाम होता है।

आपको क्या लगता है, यह जो अलग-अलग तरह के स्पोर्ट्स हैं, यह क्यों इतने प्रचलित हो गए? क्योंकि स्पोर्ट्स होगा तभी तो ऐड होगा। वह विज्ञापन बेचने का ज़रिया है और विज्ञापनदाता ऐसे नए-नए ज़रिए खोजते रहेंगे। चाहे वह विज्ञापन हो, चाहे बाबा जी की PR हो, चाहे आपको धार्मिक आधार पर भड़काने वाला कोई WhatsApp फ़ॉरवर्ड हो, वह सब बहुत केयरफुली क्राफ्टेड होते हैं। बहुत सतर्क रहा करिए, बहुत सतर्क; सब कुछ सिर्फ़ इसलिए है ताकि कोई आपसे अपना स्वार्थ सिद्ध कर सके।

जो एक का नहीं होता, उसे सौ का होना पड़ता है। अपने आप को सौ जगह टुकड़ा-टुकड़ा करके उसको बाँटना भी पड़ता है। असली आदमी होता है, वो काम ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ, और साथी भी ऐसा चुनता है कि 24 घंटे कम पड़ जाएँ। तो जब दोनों को ही 24 घंटे कम पड़ रहे हैं, तो वो 48 से ज़्यादा घंटे कहाँ से लाएगा? क्या करेगा फिर वो? वो काम को ही साथी बना लेता है, या साथी को ही काम बना लेता है, या साथी ऐसा बनाता है जो काम में भी साथ हो।

हिमालय से ऋषि चलते थे और सीधे दक्षिण भारत तक पहुँच जाते थे। या वो कहते थे कि मैं हिमालय का हूँ, वही रहूँगा? कबीर साहब जीवन भर चलते रहे। नानक साहब अरब तक पहुँच गए, चीन से यात्री चलते थे और ज़्यादातर ज्ञान की खोज में होते थे, वह तिब्बत पार करके हिमालय लाँघ करके भारत आ जाते थे। आपको यात्रा करने से किसने रोका है? यात्रा ही बहुत कुछ सिखा देती है। विदेश न जाओ, भारत तो घूम लो। पृथ्वी पूरी तुम्हारी है, जहाँ जा सकते हो, जाओ।

तुम और क्या करोगे, भीतर परेशान हो तो दूसरों को परेशान करोगे। ‘आई लव यू’ भी बोलते हो, तो तुम्हारी आँखों में आशा रहती है। और फिर जब वो उम्मीद पूरी नहीं करेगा, तो कहोगे: ‘हर्ट।’ जो भी बात है, उसको थोड़ा खुला रखना सीखिए। देना सीखो और लो भी तो उसी से, जो बिना उम्मीद के दे रहा हो तुमको।

गिरोगे, मिट्टी लगेगी चेहरे पर, क्रोध भी आएगा, हारते हुए भी प्रतीत होओगे। ये सब अनुभव होंगे, और जब अनुभव हों तो ये मत सोच लेना कि प्रक्रिया टूट गई। होता है भाई। बल्कि हार रहे थे हारते-हारते जीत गए, तब तो और मज़ा है।

भारत के सारे जवान लोगों का अब यही नारा है: कुछ और न आता हो हमको, हमें प्यार निभाना आता है। प्रेम हल्की बात नहीं होती है, भाई! एक तरीके से प्रेमी बनने का अर्थ होता है चिकित्सक बनना; जिससे प्रेम करते हो, तुम्हारे ऊपर उसके सुधार और स्वास्थ्य की ज़िम्मेदारी आ जाती है। प्यार ऐसी चीज़ है, जिससे बच भी नहीं सकते, लेकिन बिना पात्रता के किया, तो फिर तुम्हें कोई बचा भी नहीं सकता। करना तो पड़ेगा ही, लेकिन बिना समझ-बूझ कर करा, तो फिर वो प्यार नहीं है, वो अत्याचार है।

काम करना माने ये नहीं होता कि कोई महल बनाना है, कोई साम्राज्य खड़ा करना है, ये करना है, वो करना है। वास्तविक काम हमेशा नकारात्मक होगा। तो इसलिए उसको ढूँढना बहुत आसान है। आसपास अपने देखो, कहाँ कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए। सूँघो, कहाँ-कहाँ गंदगी फैली हुई है। हाथ में झाड़ू उठाओ, साफ़ कर दो; यही है काम। काम करके कुछ हासिल नहीं करना है। काम करके जो हासिल कर लिया है, उसको हटाना है।

प्रेम ऐसी चीज़ है जो बोध के पहले भी चाहिए और बोध के बाद भी आती है। बोध से पहले कौन-सा प्रेम चाहिए? मैं जो उच्चतम और सुंदरतम हो सकता हूँ, वो मुझे होना है; ये है आंतरिक प्रेम, परम प्रेम। परम प्रेम कहता है, बोध होना चाहिए और जब बोध होता है, तो फिर उसके होने से आप जान जाते हो कि दुनिया में आपके प्यार के लायक कौन-सा विषय है। तो सबसे पहले परम प्रेम, फिर बोध और फिर साधारण सांसारिक प्रेम।

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। अभी हमारी जो टीम है, वो ओलंपिक से वापस आई है, जो खिलाड़ी हैं। और उनको लेकर कुछ नेशनल न्यूज़, मीडिया में और सोशल मीडिया में कुछ बातें चल रही हैं। उनके कुछ हेडलाइंस (शीर्षक) मैं आपको पढ़कर के सुनाना चाहता हूँ — ‘मनु के…

वो जो भीतर बैठ के ये भी कह रहा है कि "मैं बर्बाद हो गया," वो बस यही कह रहा है कि जो ऑब्जेक्ट मुझे अच्छा लगता था, मुझे वो नहीं मिला। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसके पास अब कोई ऑब्जेक्ट नहीं है। इसका मतलब ये है कि वो अभी भी कोई और ऑब्जेक्ट पकड़ कर बैठा ही हुआ है। तो सारे दुख की वजह ये नहीं होती कि ऑब्जेक्ट नहीं है। उसकी वजह होती है कि ईगो अभी भी है, डिज़ायर अभी भी है। और "मुझसे कुछ नहीं होगा" ये आईडिया अभी भी है।