आचार्य प्रशांत: गलत-सही का निर्धारण बस एक चीज़ से होता है — आप आंतरिक तौर पर हल्का अनुभव कर रहे हैं कि नहीं कर रहे हैं। इसी से समझ लीजिए न (पानी का गिलास उठाकर)। अगर इसकी आदत है अपने में जोड़ते ही रहने की, चिपकते ही रहने की, तो हर बीतते दिन के साथ ये कैसे होता जाएगा? भारी।
तो आंतरिक तौर पर आपकी प्रगति हो रही है या नहीं हो रही है, उसका एक अच्छा मापदंड होता है आंतरिक हल्कापन।
बहुत सारी पुरानी चीज़ें, वो सताती हैं कि नहीं; आगे का डर लगता है कि नहीं लगता है; एक काम को करते वक्त सौ तरीके से दाएँ-बाएँ सोचना पड़ता है कि नहीं सोचना पड़ता है — ये सब बातें। तो उसके अलावा कोई और उसमें, उसका लिटमस टेस्ट हो नहीं सकता।
प्रश्नकर्ता: यही हो रहा है।
आचार्य प्रशांत: और भी होते हैं लक्षण। पर अनुभव से ये लक्षण सबसे स्पष्ट लगता है, पता चल जाता है।
प्रश्नकर्ता: हमारे पास विकल्प हैं और चुनाव है। जो चुनाव हमें दिन-प्रतिदिन करने पड़ते हैं तो क्या उन चुनाव, यानी जो कर्म हम करते हैं उसके स्रोत को देखना, उसकी जाँच करना कि वो कहाँ से आ रहा है, क्या वो मुक्ति की तरफ़ ले जा रहा है या नहीं ले जा रहा, उसमें काफ़ी भ्रम हो जाता है?
आचार्य प्रशांत:




