तुम्हारी समस्या यह नहीं है कि तुम्हें सही और गलत का ज्ञान नहीं है, बल्कि यह है कि सही राह सामने होने पर भी तुम उस पर दो कदम बढ़ाने का साहस नहीं करते। तुम्हें केवल अंतिम मंज़िल की उत्सुकता होती है, और आलस तुम पर हावी रहता है। जो सही और उचित प्रतीत होता है, वहां तक होशपूर्वक चलो और उसके प्रति निष्ठा रखो। जैसे-जैसे आगे बढ़ोगे, राह स्वयं खुलती जाएगी।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब कुछ समझ न आ रहा हो तो क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: देखो, स्थिति जब ऐसी हो कि तुम जितना समझते थे, उस पर पूरा अमल कर लिया है और अब सामने दीवार खड़ी है। समझ की रोशनी जहाँ तक जाती थी, उस पर तुम चल लिए हो और अब आगे अब अँधेरा है तब तो ये प्रश्न सार्थक है कि, "आगे कैसे समझें? और कैसे समझें?"
सवाल ये नहीं है कि सही और गलत में भेद कैसे करें, सवाल ये है कि जो भेद तुम जानते ही हो, तुमने उसपर अमल करा क्या? हज़ार चीज़ें हैं जहाँ हमें पता है कि उचित क्या है और अनुचित क्या है, लेकिन हम किसका पक्ष ले रहे हैं? अनुचित का।
तो अभी तो वो स्थिति आई ही नहीं है कि हमें पता ही न हो कि क्या उचित है और क्या अनुचित। हमारी तो ये हालत है कि हमें पता है कि क्या सही है और क्या गलत लेकिन हम उसपर अमल नहीं कर रहे।
आपको जितना पता है, आप उसपर अमल करो और अमल करने के कारण और पता चल जाएगा। समझे बात को?




